(आलेख : जसविंदर सिंह)

ट्रम्प और अमेरिका की विदेश नीति चीन को केंद्र में रखकर ही निर्धारित होती है l इसलिए ट्रम्प का चीन राग उसकी व्यक्तिगत सनक की वज़ह से नहीं है, बल्कि साम्राज्यवाद को समाजवाद से मिल रही चुनौती की वज़ह से है I उल्लेखनीय है कि करीब तीन दशक पहले जब सोवियत संघ का विघटन हुआ था और समाजवाद को धक्का लगा था, तब जब पूंजीवाद के पंडित समाजवाद की मौत पर मर्सिया पढ़ रहे थे, उस वक्त भी सिर्फ सीपीआई (एम) ने ही कहा था कि भले ही समाजवादी व्यवस्था को अस्थाई धक्का लगा है, दुनिया कुछ समय के लिए एकध्रुवीय हो रही है, लेकिन फिर भी दुनिया का मुख्य अंतर्विरोध साम्राज्यवाद और समाजवाद के बीच ही रहेगा।

और अब जब चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया और उसके विश्व की नंबर एक अर्थव्यवस्था बनने की भविष्यवाणियों को अर्थशास्त्रियों को ही बार-बार बदलना पड़ रहा है। पहले यह भविष्यवाणी हुई कि चीन 2045 में अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। फिर यह कहा गया कि नहीं, चीन की बिना संकट और बिना अवरोध के तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था 2035 में ही अमेरिका को पछाड़ देगी। अब कहा जा रहा है कि नहीं, चीन 2028 में ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पीछे धकेल कर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल कर सकता है। समाजवादी व्यवस्था का विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाना सिर्फ अमेरिका के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे साम्राज्यवादी देशों का सबसे बड़ा सिर दर्द बन गया है। इसलिए ट्रम्प से पहले जिओ बाईडेन के समय से चीन को घेरने की चिंता, अमेरिका की सारी चिंताओं में केंद्रीय चिंता रही है।

ट्रम्प के सनकीपन ने इस चिंता की और भी मुखर अभिव्यक्ति की हैI उसने आते ही चीन पर 200 पर्सेन्ट टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। अपनी आदत के मुताबिक बाद में यह टैरिफ 100 पर्सेन्ट लगाने की घोषणा हुई। मगर सच्चाई यह है कि जब भारत पर 50 फीसद टैरिफ थोप दिए गए हैं, तब चीन पर अभी तक मात्र 10 पर्सेन्ट टैरिफ ही लगाए हैं। सच बात तो यह है कि चीन की जवाबी कार्रवाई से अमेरिका और ट्रम्प दोनों ही घबराए हुए हैं। चीन द्वारा अमेरिका का सोयाबीन, मक्का और दूसरे कृषि उत्पाद खरीदने बंद कर देने या उनकी मात्रा घटा देने मात्र से ही अमेरिका का कृषि क्षेत्र का घाटा दो साल में 10.7 बिलियन डॉलर से बढ़कर 31.8 बिलियन डॉलर हो गया है। यही वज़ह है कि ट्रम्प भारत को धमकी दे रहा है। टैरिफ को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत करने की धमकियां देता है। रूस से सस्ता तेल खरीदने की बजाय अमेरिका से महंगा तेल खरीदने के लिए बाध्य कर रहा है। मोदी सरकार ट्रम्प के दबाव में आकर पर्दे के पीछे समझौते के प्रयास भी कर रही है। दूसरी ओर वह अपने मुख्य दुश्मन चीन के साथ संवाद स्थापित कर रहा है। सितंबर के शुरुआत में दक्षिण कोरिया में ट्रम्प और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग की मुलाकात के बाद अमेरिका ने नवम्बर तक कोई कार्यवाही करने को स्थगित कर दिया था। अब जब नवंबर भी बीतने वाला है, ट्रम्प ने अगले साल अप्रैल में चीन जाने की घोषणा की है। मतलब यह कि ट्रम्प दूसरे देशों को धमकाएगा, लेकिन जिस चीन को घेरने के लिए बेताब है, उससे संवाद स्थापित कर रहा है। और यह संवाद भी पर्दे के पीछे नहीं, बल्कि दुनिया के सामने हो रहा है। चीन को कोई बीच का रास्ता निकालने की फ़रियाद करने के लिए ट्रम्प खुद बीजिंग जा रहा है।

प्रश्न यही है कि आखिर चीन ने अमरीका की कौन सी नस दबा रखी है कि वह पुतिन, मोदी और जिनपिंग की मुलाकात पर तो बौखला जाता है। ट्रम्प बयान जारी करता है कि रूस और भारत को चीन से अलग करना अमेरिका की कोशिश है। इधर वह खुद ही चीन के साथ वार्ता करने चीन जा रहा है। कारण साफ है, चीन ने अपनी कुर्सी के पायों के नीचे अमेरिका सहित दुनिया के सारे देशों के हाथ दबा रखे हैं। दुनिया के 217 देशों मे से 179 देशों ने 2000 से 2023 के बीच चीन से कम से कम एक बार कर्ज लिया है। मतलब यह कि दुनिया के 80 प्रतिशत देशों ने पिछले बीस सालों में चीन से कभी न कभी कर्ज लिया है। चीन इस समय दुनिया का सबसे बड़ा साहूकार है। इस समय भी दुनिया के 84 देशों पर चीन का 2 ट्रिलियन डॉलर कर्ज है। (उल्लेखनीय है कि 10 लाख का एक मिलियन होता है, 1000 मिलियन का एक बिलियन होता है और 1000 बिलियन का एक ट्रिलियन होता है।) इन 84 देशों में दुनिया भर को हैंकड़ी दिखाने वाला अमेरिका भी शामिल है।

अमेरिका चीन का सबसे बड़ा कर्जदार है। उसने चीन की सरकारी बैंकों से 200 बिलियन डॉलर कर्ज ले रखा है। इस कर्ज से अमेरिका अपनी 2500 परियोजनाओं को पूरा कर रहा है। कर्ज की किश्त रुक जाए, तो इन परियोजनाओं की सांसे थम जाएं। यह कर्ज लगातार बढ़ रहा है। अब परियोजनाएं पूरी करनी हैं तो साहूकार को आंखें कैसे दिखाएं? वार्ताएं कर बीच के रास्ते तलाशे जा रहे हैं, या ज्यों कहो कि इज़्ज़त बचाने की कोशिश की जा रही है। चीन ने विश्व मे जितना कर्ज दिया है, उसका 9 प्रतिशत से अधिक सिर्फ अमेरिका को दिया है।

जानकारी के अनुसार, विश्व के जिन 20 देशों ने सबसे अधिक कर्ज लिया है, उनमे से 6 देश उच्च आय वाले विकसित देश हैं। यह कर्ज चीन द्वारा दूसरे देशों को दिए गए कर्ज का 20 प्रतिशत है और आंकड़ों के अनुसार यह राशि 943 बिलियन डॉलर इन उच्च आय वाले देशों को दिया गया है।

दुनिया का कोई भी बड़ा देश नहीं, जो चीन का कर्जदार न हो | अमेरिका के बाद रूस चीन का सबसे ज्यादा कर्जदार है। उसने 2023 तक चीन से 172 बिलियन डॉलर कर्ज ले रखा है l इसके बाद तीसरे नंबर पर ऑस्ट्रेलिया है, जिसने चीन से 130 बिलियन डॉलर कर्ज लिया है।

27 देशों के संघ, यूरोपियन यूनियन ने भी चीन से 161 बिलियन डॉलर कर्ज लिया है l इन देशों की 1800 परियोजनाओं का पूरा होना चीन से आ रही कर्ज की किश्तों पर निर्भर है। क्या इन देशों से उम्मीद की जा सकती है कि वह अमेरिका के इशारे पर चीन का साथ छोड़ दें?

भारत भी चीन के कर्ज से मुक्त नहीं है। अपनी अंध-राष्ट्रवादी राजनीति चलाने के लिए भले ही मोदी सरकार कभी चीनी समान पर प्रतिबंध लगाती हो, कभी दिवाली पर चीनी झालर और पटाखों के बहिष्कार की बात करती हो, लेकिन मोदी खुद चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग को झुला झुलाते हैं, क्योंकि भारत भी चीन से कर्ज लेता है l वर्ष 2023 तक भारत ने चीन से 11.1 बिलियन डॉलर कर्ज ले रखा है। भारत की ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र की अधिकांश परियोजनाएं चीनी कर्ज के सहारे ही चल रही हैं। बस यहीं आकर मोदी की बोलती बंद हो जाती है। आज भारत पर 747.2 बिलियन डॉलर विदेशी कर्ज है I दूसरी ओर चीन ने भारत सहित अनेक देशों को जो कर्ज दे रखा है, उसका ब्याज ही कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं से ज्यादा है। वर्ष 2023 में चीन ने 140 बिलियन डॉलर ब्याज दुनिया भर के देशों से वसूला है I

(लेखक मध्यप्रदेश माकपा के सचिव हैं।)

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