(आलेख : एम ए बेबी, अनुवाद : संजय पराते)

राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों से जुड़े राष्ट्रपति के संदर्भ पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जो परामर्शपूर्ण दृष्टिकोण व्यक्त किया है, भारतीय लोकतंत्र और संघवाद के लिए बहुत परेशान करने वाला पल है। चुनी हुई विधानसभाओं की सर्वोच्चता को मज़बूत करने और राज्यपाल के तेज़ी से बढ़ते पक्षपातपूर्ण शासन को रोकने के बजाय, कोर्ट का जवाब अमूर्तता की ओर जाता है और उन्हीं तरीकों को और मज़बूत करता है, जिनसे यह संकट शुरू हुआ था।

एक के बाद एक, राज्यों में केंद्र सरकार के बनाये राज्यपाल, राज्य विधानसभाओं से पारित हुए विधेयकों पर महीनों, यहाँ तक कि सालों तक कुंडली मारकर बैठे रहे हैं, जिससे एक संवैधानिक दफ्तर असल में लोकप्रिय जनादेश के खिलाफ़ एक वीटो पॉइंट बन गया है। विधानसभा से पास होकर राजभवन भेजे गए बिलों के साथ ऐसा बर्ताव किया गया है, जैसे उन्हें किसी ब्लैक होल में भेज दिया गया हो, और उन पर मंज़ूरी, वापसी या रोक का कोई संकेत तक नहीं था, जो अनुच्छेद-200 के इस प्रावधान का सीधा उल्लंघन है कि ‘जितनी जल्दी हो सके’ कार्रवाई की जाए।

यह कोई प्रशासनिक गलती नहीं है, बल्कि एक राजनैतिक बदले की कार्यवाही का पैटर्न है। राज्यपालों की खुलेआम बाधाएं लगभग पूरी तरह से उन सरकारों के खिलाफ होती हैं, जो केंद्र में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, जबकि भाजपा या उसके सहयोगियों द्वारा चलाई जा रही राज्य सरकारों को अपने विधायी एजेंडे पर वैसी बाधा का सामना नहीं करना पड़ता। इस तरह राज्यपाल के दफ्तर को पक्षपातपूर्ण नियंत्रण के एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया है, जो संविधान में उल्लेखित संघीय संतुलन को कमजोर करता है और इस आधारभूत सिद्धांत को खत्म करता है कि चुने हुए विधानमंडल लोगों की संप्रभु इच्छा को अभिव्यक्त करते हैं।

संवैधानिक तोड़-फोड़ की इसी असाधारण स्थिति की वजह से राज्य सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था, ताकि विधेयकों को जानबूझकर रोकने के खिलाफ़ कोई उपाय खोजा जा सके। दो न्यायाधीशों की पीठ के 8 अप्रैल के फैसले ने एक असाधारण संकट का जवाब समुचित ढंग से हिम्मत से दिया था। उन्होंने यह माना था कि राज्यपालों की तरफ़ से अनिश्चित काल की देरी करना ‘गैर-कानूनी’ है और संवैधानिक योजना के खिलाफ़ है, और इस बात पर ज़ोर दिया गया कि विधेयक पेश होने पर संवैधानिक प्राधिकारी एक तय समय-सीमा के अंदर काम करें। उस फैसले ने कार्यकारी बाधा के खिलाफ़ प्रातिनिधिक लोकतंत्र की रक्षा करने की तैयारी करने का संकेत दिया था।

पीठ ने यह साफ किया कि राज्यपाल के पास अनुच्छेद-200 के तहत सिर्फ़ तीन विकल्प हैं — मंज़ूरी, रोककर रखना और वापस करना, या राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखना – और विधानमंडल द्वारा दोबारा पारित किए गए विधेयकों को मंज़ूरी मिलनी चाहिए। कोर्ट ने सारांश में, राज्यों में कानून-निर्माण की प्रक्रिया को बहाल करने में समझदारी दिखाई। इससे यह उम्मीद जगी कि संविधान की चुप्पी को न्यायपालिका राज्य की स्वायत्तता और लोकप्रिय संप्रभुता के ख़िलाफ़ हथियार नहीं बनने देगी।

संविधान सभा की बहस के दौरान राज्यपाल के दफ्तर के गलत इस्तेमाल की संभावना के बारे में चिंता जताई गई थी और लोकतांत्रिक राजनीति में गैर-निर्वाचित राज्य-प्रमुखों की निष्पक्षता पर शक जताया गया था। 31 मई, 1949 को अंबेडकर ने कहा था, “मसौदा समिति ने महसूस किया, जैसा कि इस सदन में हर कोई जानता है, कि राज्यपाल के पास कोई भी काम नहीं होना चाहिए। एक जानी-पहचानी कहावत का इस्तेमाल करते हुए, “उसे अपनी समझ या अपने निजी फैसले से कोई भी काम करने की ज़रूरत नहीं है”। नए संविधान के सिद्धांतों के अनुसार, उसे सभी मामलों में अपने मंत्रालय की सलाह माननी होगी। उन्होंने आगे साफ-साफ कहा, जैसा कि मैंने कहा, यह कार्यकारी पूरी तरह से दिखावटी कार्यकारी होगा। बहस में हिस्सा लेने वालों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि राज्यपाल स्थानीय राजनीति से अलग, ऊंचे दर्जे के होने चाहिए, जिनकी समझ और अनुभव एक दिशा देने वाली ताकत बनें, न कि झगड़े की वजह। संक्षेप में, उनमें बेदाग ईमानदारी होनी चाहिए।

बहरहाल, संविधान सभा में जताई गई चिंताएँ आज पूरी तरह सही साबित हो रही हैं। राज्यपाल केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के राजनैतिक एजेंट के तौर पर बढ़-चढ़कर काम कर रहे हैं, रोज़ाना के शासन में दखल दे रहे हैं, विधेयकों को रोक रहे हैं या देरी कर रहे हैं, और ऐसे सार्वजनिक बयान जारी कर रहे हैं, जो उन्हें सीधे पक्षपातपूर्ण क्षेत्र में खड़ा कर देते हैं। उनके चयन या नियुक्ति में कोई लोकतांत्रिक तत्व नहीं है। वे अपने पद के लिए पूरी तरह से केंद्रीय कार्यकारी के ऋणी हैं, और उनका व्यवहार इस निर्भरता को दिखाता है। राज्य का संवैधानिक रूप से सोचा गया निष्पक्ष मुखिया, केंद्रीय राजनीति के नियंत्रण के लिए एक आसान आवरण के तौर पर सामने आ गया है।

इसके विपरीत, राष्ट्रपति के दफ्तर से इसका फर्क उल्लेखनीय है। राज्यपाल के उलट, राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है, जिसमें संसद और राज्य विधानमंडल दोनों निर्वाचक होते हैं, जिससे यह दफ्तर कम-से-कम औपचारिक रूप से एक बड़े लोकतांत्रिक वोट बैंक के प्रति जवाबदेह होता है। यहां तक कि जिस राष्ट्रपति का चुनाव शासक गठजोड़ के कारण होता है, वे भी ऐतिहासिक रूप से संसदीय कानून को अनिश्चित काल के लिए मंज़ूरी न देकर या राष्ट्रपति के दफ्तर को नियमित टकराव की जगह न बनाकर संघीय सरकार को खुले तौर पर शर्मिंदा करने से बचते रहे हैं।

फिर भी, संविधान पीठ ने अब दोनों दफ्तरों को ऐसा मानने का फैसला किया है, जैसे उन्हें एक जैसी छूट मिली हुई है और जैसे उनके विधायी कामों पर किसी भी गंभीर न्यायिक निगरानी से शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का ज़रूरी तौर पर उल्लंघन होगा। असल में, एक नामांकित और राजनैतिक रूप से निर्भर राज्यपाल ठीक उसी समय प्रभावी न्यायिक जांच के दायरे में आ जाता हैं, जब उसके दफ्तर का इस्तेमाल राज्यों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ध्वस्त करने के लिए किया जाता है।

गलत इस्तेमाल की इस ठोस मिसालों को देखते हुए, संविधान पीठ ने शक्तियों के बंटवारे, संस्थागत सौहार्द्र और न्यायिक नियंत्रण की एक ऊँची सोच वाली दार्शनिक खोज ढूंढने का रास्ता अपनाया है। इसने यह नतीजा निकाला है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद-200 और 201 के तहत अपनी शक्तियों का ऐसा इस्तेमाल करना न्यायपूर्ण नहीं है। कोर्ट ने एक स्पष्ट समय सीमा तय करने की अपनी ही पहले की कोशिश को ‘न्यायिक अतिक्रमण’ कहकर खारिज कर दिया और संवैधानिक पक्षाघात को रोकने की जिम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ लिया।

पीठ ने सुझाव दिया है कि न्यायालय संवैधानिक प्राधिकारियों को सिर्फ़ ‘सही’ समय में काम करने के लिए ‘सीमित निर्देश’ दे सकता हैं, बिना यह बताए कि क्या सही माना जाएगा या अकारण देरी के जो प्रभाव होंगे, उन पर ज़ोर दिए बिना। बिना ठोस समय सीमा के या प्रवर्तनीय मानदंडों के, ‘सही होना’ (रीजनेबलनेस) एक खोखला शब्द बन जाता है। इससे राज्यपाल विधेयकों को रोककर बैठे रह सकते हैं, इस भरोसे के साथ कि जब तक वे औपचारिक विवेक का दिखावा करते रहेंगे, न्यायपालिका असरदार उपाय नहीं करेगी।

संविधान पीठ की यह कातरता एस. आर. बोम्मई फैसले जैसे ऐतिहासिक हस्तक्षेप से बिल्कुल अलग है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि सरकार के बहुमत का परीक्षण सदन में होना चाहिए, न कि राज्यपाल की अपनी मनमानी संतुष्टि से तय होना चाहिए। उस फैसले ने अनुच्छेद-356 के गलत राजनैतिक इस्तेमाल के खिलाफ एक दृढ़ न्यायिक रुख दिखाया था और केंद्र की मनमानी के खास तौर पर एक विचित्र रूप को रोकने में मदद की थी।

आज, जब राज्यपाल एक बार फिर से संघीय तनाव के केंद्र में हैं – इस बार सरकारों को हटाने के बजाय विधायी बाधाओं के ज़रिए – कोर्ट ने संवैधानिक संघवाद के मज़बूत बचाव के बोम्मई के रास्ते पर न चलने का फ़ैसला किया है। इस बात पर ज़ोर देने के बजाय कि चुने हुये विधानमंडल की मर्ज़ी ही मानी जानी चाहिए, जब तक कि वह साफ़ तौर पर असंवैधानिक न हो, परामर्शीय दृष्टिकोण राज्यपाल की चुप्पी को एक ऐसे संवैधानिक व्यवहार में बदल देती है, जिसकी समीक्षा नहीं की जा सकती, जिससे और ज़्यादा शरारत को बढ़ावा मिलता है।

मोदी सरकार के पिछले साढ़े ग्यारह सालों में, भारत का संघीय ढांचा लगातार दबाव में रहा है। केंद्र-राज्य संबंधों को कमजोर करने की सुनियोजित कोशिश की गई है : शक्तियों के केंद्रीकरण करने, वित्तीय स्वायत्तता को कमज़ोर करने और संस्थागत कब्ज़े करने और वित्तीय दबाव डालकर राजनैतिक विरोधियों को कमज़ोर करने के जरिए। केंद्र प्रायोजित योजनाओं की डिज़ाइन से लेकर मनमाने ढंग से फ़ंड जारी करने या रोकने तक, केंद्र ने अपने राजनीतिक और आर्थिक एजेंडे को मानने के लिए लगातार अपने वित्तीय वर्चस्व का इस्तेमाल किया है। यहां तक ​​कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए राज्य सरकारों को दिए जाने वाले फंड भी राजनीतिक बदले की भावना से रोक दिए गए हैं।

इस माहौल में, राज्यपाल को गैर-भाजपा शासित राज्यों पर नियंत्रण के एक अतिरिक्त उत्तोलक (लीवर) के तौर पर तैनात किया जाता है। विधायी पहलें, जिसमें वैकल्पिक नीतियों का चयन शामिल हैं – चाहे वह कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य या सामाजिक न्याय के क्षेत्र में हो – उन्हें संवैधानिक आधार पर नहीं, बल्कि इसलिए रोका जाता है या उन पर सवाल उठाया जाता है, क्योंकि वे शासक पार्टी की विचारधारात्मक लाइन से अलग हैं। संदेश साफ है : संघीय समझौते का सम्मान तभी किया जाएगा, जब राज्य सरकारें केंद्र के आदेशों का पालन करेंगी।

ज़बरदस्ती लादे जाने वाले संघवाद और आक्रामक केंद्रीकरण के इन हालातों में, सुप्रीम कोर्ट का कर्तव्य शक्तियों के पृथक्करण के संकुचित पठन के साथ उसके पीछे छिपना नहीं है, बल्कि संविधान की इस तरह से व्याख्या करना है, जिससे लोकतांत्रिक चयन मज़बूत हो और राज्य की स्वायत्तता सुरक्षित रहे। संवैधानिक प्रावधान मृत अक्षर नहीं हैं ; उन्हें समय की ज़रूरत के हिसाब से, गतिशीलता में पढ़ा जाना चाहिए और लोगों की संप्रभुता के प्रति, जो चुनी हुई सरकारों के ज़रिए ज़ाहिर होता है, साफ़ झुकाव के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

अनुच्छेद-200 और 201 की मौलिक प्रगतिशील व्याख्या यही हो सकती है कि संवैधानिक चुप्पी का इस्तेमाल प्रातिनिधिक लोकतंत्र को हराने के लिए नहीं किया जा सकता। यह इस बात पर ज़ोर देता है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को एक निश्चित प्रवर्तनीय समय सीमा के अंदर काम करना चाहिए और ऐसा न करना एक संवैधानिक गलती होगी, जिसके लिए न्यायालय प्रभावी उपाय खोज सकते हैं। कार्यकारी शक्तियों पर कब्ज़ा करने के बजाय, यह दृष्टिकोण इस मुख्य लोकतांत्रिक सिद्धांत को स्थापित करता है कि गैर-निर्वाचित प्राधिकारी लोगों की इच्छा की अवहेलना नहीं कर सकते।

सुप्रीम कोर्ट का परामर्शीय दृष्टिकोण मौजूदा राजनीतिक हालात से पैदा हुई चुनौती का सामना करने में नाकाम रहा है : समय सीमा तय करने से मना करने और इस मामले में राज्यपाल की कारगुज़ारियों को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर बताने के कारण। इसने शक्तियों के पृथक्करण के एक औपचारिक सिद्धांत की वेदी पर असली लोकतंत्र की बलि दे दी है, और ऐसा करके, इसने उन लोगों की हिम्मत बढ़ा दी है, जो पहले से ही संवैधानिक संस्थाओं को अपने फायदे के लिए तोड़-मरोड़ रहे हैं।

अब यह काम जनवादी आंदोलन, प्रगतिशील राजनैतिक ताकतों, स्वतंत्र मीडिया और व्यापक रूप से आम लोगों पर है कि वे मांग करें कि राज्यपाल समेत सभी संवैधानिक दफ्तरों को जनता की इच्छा के प्रति जवाबदेही के दायरे में लाया जाए। संविधान लोगों का है, गैर-निर्वाचित पक्षधर लोगों का नहीं। इस मनोभाव को वापस पाने के लिए राजनैतिक संघर्ष करने और इस बात पर नए सिरे से ज़ोर देने की ज़रूरत है कि उच्च न्यायपालिका समेत राज्य का हर अंग अपनी व्याख्या और व्यवहार को लोकतंत्र, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के साथ जोड़े।

(लेखक माकपा महासचिव और राज्यसभा के पूर्व-सदस्य हैं।)

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