-मुस्ताअली बोहराअधिवक्ता एवं लेखकभोपाल मध्यप्रदेश एक बार फिर देश-दुनिया में इज्तिमे का गवाह बनने जा रहा है। यहां हर साल की तरह ही इस साल भी 14 नवंबर से आलमी तबलीगी इज्तिमे का आयोजन हो रहा है जो चार दिनों तक चलेगा। मध्यप्रदेश की राजधानी और बेगमों के शहर भोपाल को अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब, सांस्कृतिक विरासत, नवाबी परंपरा, अपने अलहदा अंदाज, अपनी शान-ओ-शौकत के लिए जाना जाता है। यहां का बड़ा तालाब और एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद ताजुल मसाजिद दुनिया भर में मशहूर है तो भोपाल में होने वाला आलमी तबलीगी इज्तिमा में दुनिया भर के मुसलमान जुटते हैं। ये सिर्फ मध्यप्रदेश ही नहीं, बल्कि एशिया और दुनिया के सबसे बड़े इस्लामी धार्मिक आयोजनों में से एक है। चार दिन के सालाना धार्मिक जलसे में देश दुनिया से हज़ारों जमातें और जायरीन यहां आते हैं। इज्तिमें का आगाज़ नमाज़ और कुरान की तिलावत से होता है। इसके बाद इसमें उलेमाओं की तकरीरें होती हैं, इज्तिमाई निकाह होते हैं और अमन चैन की दुआ के साथ इसका समापन होता है। भोपाल के ईंटखेड़ी स्थित घासीपुरा में करीब पांच सौ एकड़ में पूरा शहर ही बसा दिया जाता है। चार लोगों की पहल और फिर चैदह लोगों से शुरू हुए आलमी तब्लीगी इज्तिमे में अब दुनिया भर से जायरीन शिरकत करते हैं। खास बात ये भी है कि इज्तिमा अपने मजहबी स्वरूप में शुरू हुआ था और इसका मकसद भी दीनी था लेकिन अब इसके जरिए सामाजिक संदेश भी दिया जाने लगा है। इज्तिमे में होने वाले सामूहिक निकाह के जरिए शादियों में फिजूलखर्ची रोकने का संदेश दिया जाता है तो हर साल अलग अलग वैश्विक मुद्दों पर भी ध्यान आकर्षित किया जाता है। इससे पहले ग्रीन और क्लीन थीम के साथ पाॅलिथिनमुक्त इज्तिमे का आयोजन कर दुनिया को जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का मैसेज दिया चुका है। साथ ही इज्तिमा में मांसाहारी खाना प्रतिबंधित किया गया था और सिर्फ शाकाहारी खाना ही परोसा गया था। इस संगठन से कई नामी चेहरे जुड़े रहे हैं जैसे पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन, मौलाना तारिक जमील, पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद अफरीदी और सईद अनवर शामिल हैं। तबलीगी जमात की कुछ किताबें हैं। फजाइल-ए-आमाल जिसका मतलब हुआ अच्छे कामों के फायदे या खासियतें। फजाइल-ए-सदाकत यानि सदका या दान देने के फायदे। दोनों किताबों के लेखक मौलाना मुहम्मद ज़कारिया हैं। मस्जिदों में इन किताबों को पढ़ा जाता है। नमाज के बाद कोई एक व्यक्ति इस किताब को पढ़ता है और बाकी जमाती इससे गौर से सुनते हैं। View this post on Instagram तबलीगी, जमात, मरकज और इज्तिमा ये अलग-अलग हैं। तबलीगी का मतलब होता है, अल्लाह के संदेशों का प्रचार करना, जमात का मतलब लोगों का समूह और मरकज का अर्थ होता है सेंटर या केन्द्र। तब्लीगी जमात के लोग पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। बड़े-बड़े शहरों में इनका एक सेंटर है जहां जमात के लोग जमा होते हैं, इसी सेंटर या केन्द्र को उर्दू में मरकज कहा जाता है। तबलीगी जमात से जुड़े लोग पारंपरिक इस्लाम को मानते हैं। भारत में इसका मुख्यालय या मरकज़ दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में स्थित है। जब भी तबलीग से जुड़े लोग भारत आते हैं तो वे एक बार इस मरकज में जरूर जाते हैं। पाकिस्तान के रायवंड में मदनी मस्जिद में तब्लीगी जमात का मरकज है। करांची की मक्की मस्जिद से भी जमातियों को अलग-अलग प्रांतों में भेजा जाता है। बांग्लादेश में भी जमात का बड़ा मरकज है। इसके अलावा दुनिया भर में इसके कई मरकज हैं। इन मरकजों का इस्तेमाल छात्रावास और तब्लीगी लोगों के आवास के रूप में होता है। इन मरकज़ों से ही जमातों को निर्देश दिए जाते हैं। तबलीग जमात को दुनिया का सबसे बड़ा गैरराजनीतिक संगठन माना जाता है। एक दावे के मुताबिक तबलीग जमात के दुनिया भर में 15-20 करोड़ सदस्य हैं। तबलीग जमात की मुहिम को भोपाल में बड़ा मुकाम मिला। देवबंदी विचारधारा से प्रभावित मुसलमानों ने मौलाना इलियास की मुहिम को आगे बढ़ाया। तब्लीगी जमात को अभियान बनाने में मोहम्मद इमरान खान और मौलाना याकूब बड़े पीर साहब की भी अहम भूमिका रही। तब्लीग जमात को सुन्नी इस्लामी धर्म प्रचार या धर्म सुधार आंदोलन के रूप में भी देखा जाता है। ये मुसलमानों को मूल इस्लामी परंपराओं की तरफ बुलाता है। तब्लीगी जमात का जन्म 1926-27 के दौरान भारत में हुआ था। मौलाना मोहम्मद इलियास ने इस काम की नींव रखी। मौलाना मोहम्मद इलियास ने मुसलमानों को इस्लामिक तौर तरीके समझाने का काम दिल्ली से सटे मेवात से शुरू किया। चंद लोगों से शुरू हुई ये मुहिम आज दुनिया भर में फैल चुकी है। सन 1950 से यह न सिर्फ भारत बल्कि विदेशों में भी तबलीग जमात ने अपनी पैठ जमाना शुरू कर दी। सन 1970 के दशक में गैर-मुस्लिम क्षेत्रों में भी जमात का काम फैल गया। तबलीग जमात सऊदी वहाबियों और दक्षिण एशियाई देवबंदियों के बीच तक जा पहुंचा। बीसवीं शताब्दी के अंत में सबसे प्रभावशाली वहाबी धर्मगुरु अब्द अल-अजीज इब्न बाज ने तब्लीगीयों के अच्छे काम को मान्यता दी और वहाबी मुसलमानों को उनके साथ जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। ऐसा भी कहा जाता है कि तब्लीगी जमात देवबंदी आंदोलन का ही एक हिस्सा हैं। दो दशकों में यह संगठन भारत के अलावा दुनिया के कई हिस्सों में फैल गया। इस जमात के मुख्य उद्देश्य छ उसूल क्रमशः कलमा, नमाज, इल्म, इक्राम-ए-मुस्लिम, इखलास-ए-नियत, दावत-ओ-तबलीग हैं। जहां तक देवबंद मुहिम का सवाल है तो देवबंद अभियान की शुरुआत 1866-67 में सहारनपुर जिले (संयुक्त प्रांत, अब उत्तर प्रदेश) में हाजी आबिद हुसैन, मोहम्मद कासिम नानौतवी और रशीद अहमद गंगोही ने की थी। इसका मकसद मुसलमानों के बीच कुरान और हदीस में बताई गई बातों, इस्लामिक प्रथाओं का प्रसार और ब्रिटिश उपनिवेशवाद का विरोध करना था। दारूल उलूम देवबंद को इस्लाम की सुन्नी शाखा (हनफी) का हिस्सा माना जाता है। इज्तिमे को लेकर ये भी कहा जाता है कि इसमें सिर्फ मुसलमान शामिल होते हैं। हालांकि, गैर मुसलमानों के इसमें प्रतिबंध जैसा कुछ नहीं होता। देश-विदेश में होने वाले इज्तिमों में से कई जगह अलग-अलग धर्मों के लोग भी शामिल होते हैं, वे इस्लाम को समझने के मकसद से इसमें आते हैं। भोपाल में आयोजित इज्तिमा में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान भी शामिल हो चुके हैं। कुल मिलाकर, इज्तिमा खालिस मज़हबी जलसा होता है। यहां सियासत से जुड़ी बातें नहीं की जाती। —- मौलाना इलियास से लेकर मौलाना साद तक तबलीगी जमात का काम मौलाना इलियास ने सन 1926 में शुरू किया था। तब्लीगी जमात के संस्थापक मोहम्मद इलियास कांधलवी एक ऐसा अभियान चलाना चाहते थे, जो अल्लाह के फरमान और कुरान के अनुसार लोगों को नेकी की राह दिखाए और बुरे कामों से बचाए। मौलाना इलियास के शिक्षक रशीद अहमद गंगोही का भी यही ख्वाब था। बताया ये भी जाता है कि मौलाना इलियास को इसकी प्रेरणा सन 1926 में हज यात्रा के दौरान मिली। इसके बाद उन्होंने शुरू में मेवाती मुसलमानों को इस्लामी रीति रिवाजों और परंपराओं के बारे में बताया। मुहम्मद इलियास ने सहारनपुर के मदरसा मजाहिर उलूम में अपने शिक्षक पद को त्याग दिया और मुसलमानों को जागृत करने में लग गए। वह दिल्ली के पास निजामुद्दीन पहुंचे और सन 1926 में मेवात, दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में तबलीग का काम शुरू किया। सन 1944 में उनके इंतकाल के बाद उनके पुत्र मौलाना यूसुफ ने इसकी बागडोर संभाली। उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया, जिससे तबलीगी जमाअतों का आना-जाना शुरू हो गया। सन 1965 में उनके इंतकाल के बाद मौलाना इनामुल हसन के कांधों पर इस काम की जवाबदेही आ गई। वर्ष 1995 में उनके इंतकाल के बाद से इस तबलीगी काम की जिम्मेदारी को मौलाना साद अंजाम दे रहे हैं। मौलाना साद कांधलवी जमात के संस्थापक के पोते हैं। समूह में एक शूरा परिषद भी है, जो मुख्य रूप से विभिन्न राष्ट्रीय इकाइयों और मुख्यालयों वाली एक सलाहकार परिषद है। यहां बता दें कि मोहम्मद इलियास का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के कांधला गांव में हुआ था। सन 1303 हिजरी यानी 1885 में उनका जन्म हुआ था। कांधला गांव में जन्म होने की वजह से ही उनके नाम में कांधलवी जुड़ा हुआ है। उनके पिता मोहम्मद इस्माईल थे और माता का नाम सफिया था। एक स्थानीय मदरसे में उन्होंने कुरान के कुछ हिस्सों को कंठस्थ किया था। आपने अपने पिता के मार्गदर्शन में दिल्ली के निजामुद्दीन में कुरान को पूरा याद किया। उसके बाद अरबी और फारसी की किबातें पढ़ी। बाद में वह रशीद अहमद गंगोही के साथ रहने लगे। सन 1905 में रशीद गंगोही का इंतकाल हो गया। सन 1908 में मोहम्मद इलियास ने दारुल उलूम में दाखिला लिया। – इज्तिमे का इतिहास हज़रत आदम से ज़माने से ……….इज्तिमे का इतिहास कितना पुराना है इसको लेकर इस्लामिक विद्वानों में एक राय नहीं है। कुछ इसे मौलाना इलियास की पहल से जोड़ते हैं तो कुछ का कहना है कि ये तो हज़रत आदम के वक्त से होता आ रहा है। हजरत आदम ने अपने बेटे काबिल और हाबिल को शादी करने से पहले एक जगह जमा करके दीनी बातें बताई। उन्हें हक और नाहक समझाया, अल्लाह की इबादत करने, दुआ करने का तरीका बताया। इसके बाद दोनों बेटों ने अल्लाह की राह में तबर्रुकात पेश किए। हाबिल की दुआ कबूल हुई। कुछ इस्लामिक विद्वानों का मानना है कि सभी नबियों ने भी सफर या यात्रा करते हुए इस्लाम का प्रचार-प्रसार किया। आखरी नबी पैगंबर साहब के वक्त इस्लाम मुकम्मल हुआ। पैगंबर मोहम्मद साहब सअव भी हिजरत करते थे और तब्लीग के जरिए अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुंचाते थे। हजरत इब्राहीम ने इराक से मिस्र, फिलिस्तीन फिर अरब आदि मुल्कों में जाकर तब्लीग के जरिए इस्लाम का प्रचार किया। हजरत इब्राहीम ने सारा से शादी की। आपके बाद सारा भी ईमान ले आईं। हजरत लूत आपके भतीजे है। आप इराक से हिजरत करके मिस्र गए, वहाँ हाजरा आपके साथ शामिल हो गई। हजरत इब्राहीम,हजरत लूत, सारा और हाजरा के बाद ईमान वालों का काफिला बढ़ता गया। इन्होंने फिलिस्तीन जाकर आप इज्तिमा किया और लोग जुड़ने लगे। हज़तर इब्राहिम ने अल्लाह से दुआ की जो कुबूल हुई। हजरत इब्राहीम ने तब्लीग और इज्तिमे के जरिए अल्लाह का संदेश फैलाया और यही वजह है कि आपको हबीबुल्लाह भी कहा जाता है यानि अल्लाह का हबीब या दोस्त। हबीबुल्लाह हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को मुसलमानों के अलावा ईसाई और यहूदी भी अपना नबी मानते है। अल्लाह के रसूल ने भी कई मर्तबा तब्लीग की। नबूवत के बाद आपने ताईफ शहर का सफर किया। इसके बाद अराफात के मैदान में दस हिजरी में पैगंबर मोहम्मद साहब ने इज्तिमा किया। अपने आखरी खुत्बे में फतेह मक्का के मौके पर इज्तिमा करके मक्का वालों की तब्लीग की। नबी साहब ने यहां तकरीर की, दीनी बातें बताई और अल्लाह से दुआ की। इस इज्तिमे में सवा लाख मुसलमान जमा थे। जो लोग इज्तिमे को सदियों पुराना या हजरत आदम के ज़माने का मानते हैं वो हज की मिसाल देते हैं। उनका तर्क है कि हज के दौरान हाजी अराफात के मैदान में इकट्ठा होते हैं। साथ में नमाज के बाद इज्तिमाई दुआ की जाती है। दुनिया के हर कोने से लोग हज करने पहुंचते हैं। हजरत इब्राहिम अलैह. के जमाने से लेकर आज तक अराफात के मैदान में इज्तिमा हो रहा है। इसके अलावा हजरत अब्दुल्लाह शाह गाजी, शाह चंगाल धार, मदार शाह मकनपुर या ख्वाजा गरीब नवाज और फिर और कोई सूफी संत हो इन सभी ने देश-दुनिया में सफर तय करके दीनी तब्लीगी की। हालांकि, मुसलमानों का ही दिगर तबका इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता। उनका मानना है कि नबी साहब या हज के मजमे को तबलीग से जोड़ना ठीक नहीं है। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन धर्मेंद्र की सेहत में सुधार, मौत की अफवाहें पूरी तरह झूठी: हेमा मालिनी और ईशा देओल ने दी जानकारी राज्यपाल ने गुजरात के बिरसा मुंडा जनजातीय विश्वविद्यालय राजपीपला का किया भ्रमण