(आलेख : राजेंद्र शर्मा) इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि करीब पांच दर्जन सांसदों तथा कूटनीतिज्ञों के सात दलों के 33 देशों के दौरे से भी, कम से कम विदेश नीति के मामले में मोदी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया लगता है। यह तब है, जब जैसा कि आम तौर पर सभी जानते भी हैं और मानते भी हैं, 7 से 10 मई के बीच भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सैन्य झड़पों की पृष्ठभूमि में मोदी सरकार को, जो राजनीति में उभयपक्षीयता के विचार से सिर्फ कोसों दूर ही नहीं है, एक प्रकार से इस तरह की परंपराओं की शत्रु ही बनी रही है, दुनिया भर में इन बहुदलीय प्रतिनिधिमंडलों को भेजने की जरूरत इसीलिए महसूस हुई थी कि, उक्त टकराव के संदर्भ में भारत की विदेश नीति पूरी तरह से विफल रही थी। जैसा कि सभी ने दर्ज किया था, मोदी राज की विदेश नीति के 11 साल का हासिल यही था कि छोटे से बड़ा तक और विकसित से पिछड़ा तक, दुनिया का एक भी देश इस टकराव में स्पष्ट रूप से भारत का पक्ष लेने के लिए सामने नहीं आया था। और तो औैर, रूस जैसा भारत का सदाबहार मददगार और समर्थक तक, दुविधाग्रस्त नजर आ रहा था। बाकी सारी दुनिया को छोड़ भी दें, तो हमारा एक भी पड़ौसी देश, दक्षिण एशिया का कोई भी देश, भारत के साथ खड़ा नहीं हुआ था। अलबत्ता, अफगानिस्तान ही इस मामले में अपवाद साबित हुआ था, जहां की तालिबान सरकार के साथ बढ़ती नजदीकियों के बावजूद, भारत अब तक उसे कूटनीतिक मान्यता देने की हिकमत नहीं जुटा पाया है। इस कूटनीतिक आउटरीच कार्यक्रम के बाद, इन बहुदलीय प्रतिनिधिमंडलों के सदस्यों से प्रधानमंत्री मोदी ने बहु-प्रचारित मुलाकात भी की थी। इस मुलाकात के संबंध में प्रेस में आए कुछ ब्यौरों में, प्रतिनिधिमंडलों के सदस्यों द्वारा इन दौरों में बने अपने इंप्रैशन बेलाग तरीके से प्रधानमंत्री से साझा किए जाने के जोर-शोर से दावे किए गए हैं, हालांकि विवरणों पर प्राय: चुप्पी साध ली गयी है। फिर भी यह मानने का कोई कारण नहीं है कि कम से कम राजनीतिक राय के इंद्रधनुष के अधिकांश रंगों का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसदों ने सारे संकोच के बावजूद, इन विदेश दौरों के अपने वास्तविक इंप्रैशन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, कम से कम इशारतन, प्रधानमंत्री से साझा नहीं किए होंगे। इनमें इसे समझने के लिए कुछ-न-कुछ संकेत भी जरूर रहे होंगे कि आंतकवाद जैसे मुद्दे पर भी भारत आज दुनिया में इतना अलग-थलग क्यों है? लेकिन, प्रधानमंत्री की उक्त बैठक के बाद का मोदी सरकार का प्रकट कूटनीतिक आचरण यही दिखाता है कि यह सरकार कुछ भी न सीखने को तैयार है और न ही रत्तीभर बदलने को। उक्त प्रतिनिधिमंडलों की स्वदेश वापसी के फौरन बाद, मोदी सरकार की कूटनीति की महत्वपूर्ण परीक्षा एक नहीं, दो अलग-अलग, किन्तु परस्पर जुड़े हुए मामलों में हुई। इनमें से पहला मामला इजरायली नरसंहार की शिकार गज़ा की जनता की प्राण रक्षा के लिए, तुरंत युद्घ विराम कराने के संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव का था। गज़ा पर दो साल से ज्यादा से जारी इजरायली हमलों में साठ हजार से ज्यादा असैनिक मारे जा चुके हैं, जिनमें बहुमत बच्चों और महिलाओं का ही है। इस नरसंहारकारी युद्घ में इजरायल सिर्फ हवाई हमलों से लेकर जमीनी चढ़ाई तक, सैन्य हथियारों का ही इस्तेमाल नहीं कर रहा है, बल्कि घेरेबंद गज़ा में न्यूनतम आपूर्तियां तक पहुंचने के रास्ते बंद करने के जरिए, भूख को समान रूप से घातक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है और गजा़वासियों को सामूहिक दंड के रूप में भुखमरी में धकेल रहा है। हैरानी की बात नहीं है कि विश्व न्यायिक मंचों ने इस मामले में इजरायल को युद्घ अपराधों का दोषी तक करार दिया है। View this post on Instagram स्वाभाविक रूप से संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रचंड बहुमत से गज़ा के खिलाफ जंग बंद किए जाने का प्रस्ताव स्वीकार किया। 149 देशों ने प्रस्ताव के समर्थन में वोट किया, जबकि इजरायल तथा अमेरिका समेत कुल 12 देशों ने प्रस्ताव खिलाफ वोट किया। लेकिन पूरी तरह से अप्रत्याशित न होते हुए भी, बहुतों को हैरान करते हुए, भारत ने उन 18 अन्य देशों के साथ वोट किया, जिन्होंने खुद को इस प्रस्ताव पर मतदान से अलग रखे जाने के लिए मतदान किया था। भारत का यह रुख इसलिए और भी हैरान करने वाला था कि इससे पहले भारत ने, दो साल पहले इसी तरह के जंगबंदी के संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया था। यह समझना वाकई तर्क से परे था कि संयुक्त राष्ट्र संघ के पिछले और इस ताजातरीन प्रस्ताव के बीच ऐसा क्या बदल गया था, जो मोदी का भारत जंगबंदी की मांग का समर्थन करना छोड़कर, इस मांग पर तटस्थता का रुख अपनाने पर आ गया था! बेशक, गज़ा के खिलाफ इजरायली सैन्य कार्रवाइयों की शुरूआत से ही मोदी सरकार, फिलिस्तीन के समर्थन के भारत के परंपरागत रुख के विपरीत, जिसकी जड़ें भारत के अपने साम्राज्यवादविरोधी स्वतंत्रता संग्राम में थीं, आमतौर पर इजरायलपरस्त रुख ही अपनाए रही है। लेकिन, गज़ा में नरसंंहार रोके जाने पर भी तटस्थ हो जाने की हद तक इजरायलपरस्ती तो, मोदी सरकार के मानकों के हिसाब से भी नयी ही है। कहने की जरूरत नहीं है कि अपनी इस पल्टी से भारत ने खुद को दुनिया भर से, जिसमें जाहिर है कि सबसे बड़ी संख्या विकासशील देशों की ही है, अलग ही कर लिया। यहां तक कि भूटान जैसे देश ने भी भारत से भिन्न रुख अपनाते हुए, प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। इसके फौरन बाद, मोदी राज की विदेश नीति की दूसरी परीक्षा भी हो गयी। इस परीक्षा का भी संबंध इजरायली आक्रामकता से था, जिसका प्रदर्शन इजरायल पश्चिमी विकसित दुनिया के पूरे-पूरे समर्थन के बल पर ही करता आया है। गजा़ के खिलाफ अपने नरसंहारकारी हमले के बीच, इजरायल ने अचानक ईरान पर सैकड़ों जंगी जहाजों, ड्रोनों और मिसाइलों से हमला कर दिया। इस हमले में ईरानी सेना के कुछ शीर्ष नेताओं तथा देश के कई प्रमुख नाभिकीय वैज्ञानिकों समेत सैकड़ों लोग मारे गए। इनमें से अनेक की टार्गेट कर के हत्याएं की गयी थीं, जिसमें इजरायल को खास महारत हासिल है। स्वाभाविक रूप से, ईरान ने इस हमले का जवाब देने का ऐलान किया है और इससे दोनों के बीच व्यापक लड़ाई छिड़ सकती है। इजरायल ने यह हमला इसके नाम पर किया है कि वह ईरान को नाभिकीय हथियार बनाने से रोकना चाहता है और इसलिए उसके नाभिकीय प्रतिष्ठान पर हमला किया गया है। लेकिन, इजरायल को जो पश्चिम की कृपा से नाभिकीय हथियार लिए बैठा है, इसके नाम पर हमला करने का अधिकार किसने दिया है? फिर यह बहाना भी कितना झूठा है, इसका अंदाजा एक इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि यह हमला, ठीक ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम के प्रश्न पर ही, अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ताओं के बीच में किया गया है, जब दोनों के बीच पांच दौर की वार्ता हो चुकी थी और छठे दौर की वार्ता अगले ही दिन होनी थी। इस हमले में ईरानी पक्ष के वार्ताकारों की चुन-चुनकर हत्या कर दी गयी। हैरानी की बात नहीं है कि इस हमले की व्यापक रूप से निंदा हो रही है। लेकिन, शंघाई सहयोग संगठन ने, जिसका भारत पूर्ण सदस्य है, जब इस इजरायली हमले की निंदा के एक प्रस्ताव पर विचार करने के लिए बैठक बुलाई, मोदी के भारत ने इस बैठक से ही खुद को अलग कर लिया। इस सबके बाद, ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील दुनिया का ‘प्रवक्ता’ होने के भारत के दावे, एक भद्दा मजाक ही लगते हैं। बेशक, यह महज इजरायल प्रेम का ही मामला नहीं है। मोदी राज के इजरायल प्रेम का सीधा संबंध, इजरायल की पीठ पर अमेरिका समेत समूची साम्राज्यवादी दुनिया का हाथ होने से है। मोदी राज की विदेश नीति की मुख्य पहचान, जो उसे भारत की स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और आजादी के बाद के पांच दशक से ज्यादा की भारत की विदेश नीति से बुनियादी तौर पर अलग करती है, उसका भारत को साम्राज्यवादी मंसूबों का जूनियर पार्टनर बना देना है। यह दूसरी बात है कि मोदी राज में इजरायल प्रेम में, अमेरिका समेत साम्राज्यवादी ताकतों के प्रेम के अलावा एक तत्व और भी शामिल है, जो इस विदेश नीति को उसकी घरेलू नीति का प्रत्यक्ष विस्तार बनाता है। यह तत्व है, मुस्लिमविरोध, जो संघ-भाजपा के मुस्लिम विरोध का दोस्ताना, इजरायली यहूदीवादियों के इस्लामविरोध से जोड़ता है। इसी सब के चलते, मोदी राज के 11 साल में, खासतौर पर विकासशील दुनिया में, भारत की नैतिक प्रतिष्ठा ध्वस्त हो गयी है। जो भारत कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से विकाशील दुनिया की सबसे भरोसेमंद आवाज हुआ करता था, अब अपने मुंह से विकासशील दुनिया की ओर से बोलने के दावे भले ही करे, विकासशील देश उस पर रत्तीभर विश्वास नहीं करते हैं। दूसरी ओर, पश्चिम की पंगत में किसी तरह शामिल होने के लालच में विकासशील दुनिया के हितों की ओर से मुंह मोड़ने के ईनाम के तौर पर उसे निचली मेजों के न्यौते जरूर मिल रहे हैं, लेकिन वहीं तक, जहां तक सामराजी मंसूबों के लिए उसका उपयोग है। दूसरी ओर, मोदी राज में देश में जो कुछ हो रहा है और खासतौर पर धर्मनिरपेक्षता समेत सभी प्रमुख पहलुओं से जिस तरह जनतंत्र का त्याग किया जा रहा है, वह विकासशील दुनिया के साथ-साथ, पश्चिम की इस बारात में भी उसकी उपस्थिति को असहज और असामान्य बनाता है, और जिसका पता अनेकानेक सूचकांकों पर भारत के खराब प्रदर्शन से चलता है। नतीजा यह कि विश्व समुदाय में भारत का कद घटता जा रहा है और उसके मित्रों का दायरा तेजी से सिकुड़ता जा रहा है। जैसे-तैसे कर के जी-7 के आउटरीच कार्यक्रम का न्यौता हासिल करने और शर्तों पर न्यौता हासिल करने के बाद, नरेंद्र मोदी जिस तरह लपक कर कनाडा समेत तीन देशों की पांच दिन की यात्रा पर रवाना हुए हैं, वह यही दिखाता है कि वर्तमान शासन में विदेश नीति, विदेश में नरेंद्र मोदी की छवि चमकाने का औजार भर बनकर रह गयी है, ताकि विश्व नेता की इस छवि के प्रतिबिंबन से, देश के लोगों को चकाचौंध किया जा सके। ऐसी विदेश नीति से ज्यादा समय तक तो विदेश में राष्ट्रीय गोदी पूंजीपति के हितों तक को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है, भारत जैसे विशाल देश के हितों को आगे बढ़ाने का तो सवाल ही कहां उठता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।) Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन ट्रम्प से इतना भय क्यों खा रहे हो, क्या डर है जो छुपा रहे हो? 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