सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों पर क्या कहा?

प्रदीप चौधरी । सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार से यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 में संशोधन पर विचार करने का आग्रह किया है, ताकि किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा सके। कोर्ट ने इस मामले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं और सरकार को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां:

  1. किशोरों के लिए सुरक्षा, न कि सजा: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट का मूल उद्देश्य नाबालिगों को यौन शोषण से बचाना है, न कि किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने रोमांटिक या यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में लाना। कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में किशोरों को अपराधी मानने के बजाय उन्हें मार्गदर्शन और शिक्षा की आवश्यकता है।
  2. विशेषज्ञ समिति का गठन: कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इस मुद्दे का अध्ययन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करे और 25 जुलाई 2025 तक अपनी रिपोर्ट सौंपे। कोर्ट ने कहा कि वह इस रिपोर्ट की समीक्षा के बाद आगे के निर्देश जारी करेगा।
  3. यौन और प्रजनन स्वास्थ्य शिक्षा नीति: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से स्कूलों में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य शिक्षा के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने का सुझाव दिया। इसका उद्देश्य किशोरों को उनके अधिकारों, कानून, और सहमति की सीमाओं के बारे में जागरूक करना है, ताकि अनजाने में कानूनी उलझनों को रोका जा सके।
  4. कानून के दुरुपयोग पर चिंता: कोर्ट ने POCSO एक्ट के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई, विशेष रूप से उन मामलों में जहां माता-पिता किशोरों के सहमति से बने संबंधों को स्वीकार नहीं करते और कानून का उपयोग हथियार के रूप में करते हैं।
  5. न्यायिक विवेक और संतुलन: कोर्ट ने जोर दिया कि किशोरों की स्वायत्तता और उनकी सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। ऐसे मामलों में सावधानीपूर्वक न्यायिक विचार की आवश्यकता है, ताकि सहमति से बने संबंधों को अनुचित रूप से अपराध न माना जाए।

कोर्ट के सुझाव और टिप्पणियां:

हाल के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले:

सुप्रीम कोर्ट ने 23 मई 2025 को एक ऐतिहासिक फैसले में अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए एक POCSO मामले में आरोपी को सजा से राहत दी, क्योंकि पीड़िता ने घटना को अपराध नहीं माना और वह आरोपी के साथ वैवाहिक जीवन जी रही थी। कोर्ट ने कहा कि सजा देने से पीड़िता के जीवन और रिश्ते पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

निष्कर्ष क्या होगा….?

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। कोर्ट ने सरकार से इस दिशा में कानूनी सुधार, विशेषज्ञ समिति का गठन, और यौन शिक्षा नीति लागू करने का आग्रह किया है। यह कदम किशोरों की स्वायत्तता और उनकी सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। हालांकि, विधि आयोग ने सहमति की उम्र 18 से कम करने का विरोध किया है, क्योंकि इससे बाल विवाह और तस्करी जैसे मुद्दों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

कानून में बदलाव का अंतिम निर्णय सरकार और विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर निर्भर करेगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह रुख किशोरों के प्रति अधिक संवेदनशील और व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।

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