(टिप्पणी : बादल सरोज)

अक्सर जो भान होता है, वह जरूरी नहीं कि असली प्रकाश या दीप्ति या उसका प्रत्यावर्तन हो। वह योजना के साथ बनाया, दिखाया, बताया ‘उजाला’ भी हो सकता है। ।इन दिनों खासकर संचार क्रांति के बाद से इस तरह के निर्मित, नियंत्रित, निराधार और पूरी तरह आभासीय अहसास – परसेप्सन – बनाने की विधा और जनमानस को उसके अनुकूल ढालने के लिए उन पर बरसाए और बरपाये जाने की सुविधा बाकायदा टूल्स और टेक्नॉलोजी के साथ आ चुकी है। नतीजे में काम काफी आसान हो गया है। हाल के दौर में तो इस तरह के गढ़े अहसासों के नकली कुहासों की कारपेट बॉम्बिंग-सी कर रखी है।

इसका यह अर्थ कतई न लगाया जाए कि इससे पहले ऐसा कभी नहीं रहा। रहा है, समाज के वर्ग समाज में बदलने के बाद से हमेशा रहा है। हर काल के हुक्मरनों ने जनमानस के सोच को ढालने का काम किया ; समय के साथ इसकी विधायें और अदायें बदलती रही, मगर यह काम जारी रहा। ऐसा करना सत्तासीनो के लिए जीवन-मरण का सवाल जो था। क्योंकि वे, सत्ता मे बैठे वर्ग, हमेशा अल्पमत मे रहे।

उन्हें अच्छी तरह पता था कि कुछ हजार या कुछ लाख सैनिकों की बन्दूकों, कुछ लाख पुलिसियों वर्दी की दम पर करोड़ों इंसानों पर वे अपनी हुकूमत नहीं चला सकते, क्योंकि इसमें एक बड़ा लोचा था – ये बन्दूक वाले सैनिक और पुलिसियों की वर्दी के नीचे भी कोई गरीब किसान या मजदूर था। वे भी मूलतः उन्ही वर्गों से आते थे, जिन वर्गों को कुचल कर रखना था। लिहाजा दिल पर काबू और दिमाग पर कब्जा ही एकमात्र रास्ता था। इस वर्चस्व, जिसके लिए ज्यादा उपयुक्त शब्द ‘हेजेमोनी’ है, की व्याख्या समय-समय पर मार्क्स सहित अनेक विचारकों ने की। पिछली सदी मे इसकी सटीक जांच-पड़ताल एंटोनियो ग्राम्सी कर चुके हैं, वे इसका निदान ही नहीं, समाधान भी सुझा चुके हैं। वे उत्ते जटिल भी नहीं हैँ कि पढ़े न जा सकें।

बहरहाल लुब्बोलुबाब यह है कि जो जैसा दिख रहा है या दिखाया जा रहा है, जरूरी नहीं कि वह वैसा हो ही!! वह ‘अच्छे दिनों’ और ‘भक्तों के ब्रह्मा’ की तरह टांय-टांय फुस्स टाइप का फुलाया गया गुब्बारा भी हो सकता है।

इस धारणा की पुष्टि पिछले महीने भगत सिंह शहादत से जुड़े आयोजनों में उत्तरप्रदेश के तीन जिलों जौनपुर, सुल्तानपुर और अयोध्या-फैज़ाबाद में, ग्रामीण इलाकों में घूमते-घामते, अलीगढ़ और बुलंदशहर को छूते, लांघते में लोगों के मिजाज़ को सूंघते, भाँपते, देखते, सुनते, समझते हासिल जमीनी अनुभवों से हुई। और वह यह है
कि कहीं कुछ ख़त्म नहीं हुआ है, कि अभी भी अन्धेरा विजयी, सर्वग्रासी और मुकम्मल नहीं हुआ है, कि हजार कोशिशों के बावजूद विवेक शून्य नहीं हुआ है, कि कुछ हजार साल में बनी-संवरी साझी परम्पराएं, विकसित हुई सभ्यतायें विलुप्त नहीं हुई है।

गाँव-कस्बों चौराहों की चाय दुकानों पर बैठे, बतियाते लोग कुहासे के पार देख रहे है, उसके सूत्रधारों को चीन्ह रहे हैं, अपनी हालात की वजहों को जान रहे हैं और उनके दोषी मुजरिमों की शिनाख्त कर रहे हैं। ध्यान रहे, ये तब की बात है जब होली और जुमे की नमाज पर भाई लोगों का गला फाड़, छाती पीट उन्मादी क्रंदन गुजरा ही था।

कुल मिलाकऱ यह कि सिर्फ उम्मीद ही नहीं, संभावनाएं भी कायम हैं। इस यात्रा के अंत में घटी एक घटना रूपक की तरह बाकी बात भी पूरी कर देती है!!

हुआ यह कि 23 मार्च को फैजाबाद – जिसे अब नया नाम अयोध्या दे दिया गया है – के गाँव कुम्भिया के राजकरण इंटर कॉलेज में हुए शहीद दिवस के खुले सेमीनार और कवि सम्मेलन के आयोजन में अपना काम पूरा करके बिना सहभोज में हिस्सा लिए, बुलंदशहर बरास्ते अलीगढ़ की ट्रेन पकड़ने अयोध्या कैंट रेलवे स्टेशन आ गये। भूख लग रही थी, सो स्टेशन के बाहर बनी टपरी पर बाटी चोखा का भोग लगाने बैठ गए। हाथ में प्लेट पकड़ी ही थी कि न जाने कहाँ से बिजली की गति से एक ललमुहां बन्दर आया और हमारी प्लेट से बाटी उठाकर उसी तेज रफ़्तार से वापस लौट गया। दुकानदार ने बाटी की क्षतिपूर्ति तो नहीं की, ज्ञान की आपूर्ति जरूर कर दी और कहा कि ‘बाबू, ये हमारे यहाँ के बन्दर नहीं हैं, ये कहीं बाहर से आ गए हैं ; हमारी अयोध्या के बन्दर ऐसी हरकते नहीं करते।‘

चोखा भर हाथ में लिए बैठे हमारे अपरिग्रही मन में आया कि उनसे कहें कि यह बात सिर्फ बाटीउड़ाऊ बंदर के बारे में ही सच नहीं है, अजुध्या और देश के आज के बारे में भी सच है। सावधानी हटी और अमीर खुसरो की कही ‘खीर पकाई जतन से / चरखा दिया जलाय / आया कुत्ता खा गया / तू बैठी ढोल बजाय’ की त्रासदी घटी।

इसलिए : कि जैसा दिखाया जाता है वह भले आज धरा का यथार्थ न हो, मगर उसे यदि ढंग से काउंटर न किया जाए, कुहासा और अंधेरा दिमाग में जड़ जमाकर बैठ जाता है और एक भौतिक शक्ति की तरह आचरण करने लगता है। ऐसा न हो पाए, अंधेरा और कुहासा दिमाग तक न पहुँच पाए, इसके लिए रौशनी करनी होती है।

ऐसी रोशनियाँ की जा रही हैँ। इसी यात्रा में इनकी तैयारियां भी दिखीं। 23 मार्च से 14 अप्रैल तक हर गाँव-बस्ती तक जाकर संघर्ष का सन्देश पहुँचाने का सुल्तानपुर जिला समिति का अभियान इसी तरह के काउन्टर का एक रूप है!!

ऐसे सारे रूप अपना कर, आजमा कर और अमल में लाकर, खुद मोर्चे पर डटते हुए बाकियों को जगाकर यह काम कैसे किया जा सकता है, यह बात एक पार्टी जानती है। यह पार्टी – सी पी आई (एम) का आज 2 अप्रैल से मदुरै में राष्ट्रीय महाधिवेशन – पार्टी कांग्रेस – शुरू हो चुका है। इसमें इस रूप को और तरोताजा किया जाएगा, और धारदार और कारगर बनाया जायेगा।

कुहासे छंटेंगे, अँधेरे सिकुड़ेंगे : इतिहास जन और अवाम की सरगर्मियों से फूटे उजालों ने ही लिखे हैँ।

(टिप्पणीकार ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)

NEWS NATIONAL WORLD's avatar

By NEWS NATIONAL WORLD

NNW NEWS NATIONAL WORLD MP/CG NEWS, समाचार, क्राइम, जन समस्या, पॉलिटिक्स, बॉलीवुड, सामाजिक,इत्यादि। मीडिया समूह का ऑनलाइन हिंदी समाचार पोर्टल है, जो की राजनीति, खेल, मनोरंजन, व्यवसाय, जीवन शैली, कला संस्कृति, पर्यटन से जुड़ी खबरों को हिंदी भाषा में एक ही स्थान पर लेटेस्ट ब्रेकिंग न्यूज के साथ प्रदान करता है। अंकुल प्रताप सिंह,बघेल +91 8516870370 सब एडिटर गौरव जैन इंदौर +91 98276 74717 सह संपादक आमिर खान इंदौर +91 9009911100, प्रदीप चौधरी, संभाग ब्यूरो चीफ इंदौर +919522447447, रीवा जिला ब्यूरो चीफ कुशमेन्द्र सिंह +91 94247 01399.

Leave a Reply

You missed

Discover more from NNWORLD

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Discover more from NNWORLD

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading