— मुस्ताअली बोहराअधिवक्ता एवं लेखकभोपाल शब-ए-कद्र रमजान की पाक रात है। मान्यता है कि इस रात कुरान की आयतों का जिबरील नाम के फरिशते के जरिए पैगम्बर मुहम्मद साहब पर अवतरण (नाजिल) होना शुरू हुआ था। माना जाता है कि इस रात खुदा ताअला नेक व जायज तमन्नाओं को पूरी फरमाता है। तरावीह पढ़ाने वाले इसी शब में कुरआन मुकम्मल करते हैं, जो तरावीह की नमाज अदा करने वालों को सुनाया जाता ह। इसके साथ घरों में कुरआन की तिलावत करने वाली मुस्लिम महिलाएं भी कुरआन मुकम्मल करती हैं। शबे कद्र को रात इबादत के बाद लोग कब्रस्तान जाते हैं और अपने मरहूमांे की कब्रों पर फातिहा पढ़कर उनकी मगफिरत के लिए दुआएं करते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि शब-ए-कद्र की रात इबादत करने पर गुनाह बक्श दिए जाते हैं। ——– इन्हें छूट है रोजा रखने की …… ——————-मुस्लिमों का धर्मग्रंथ कुरान भी इसी महीने में नाजिल (दुनिया में आया) हुआ था। ये महीना नेकियों का महीना है जिसमें मुस्लिम रोजा रखने के अलावा कुरान की तिलावत करते हैं। जब रमजान का महीना शुरू होता है तो जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। इसी महीने में लैलतुल कद्र आती है जिसे साल की सबसे पाक रात माना जाता है। माना जाता है कि रमजान के आखिरी दस दिनों के दौरान एक विषम संख्या वाली रात होती है। दाऊदी बोहरा समाज का मानना है कि शब-ए-कद्र रमजान के 23वीं रात है। रमजान के महीने में रोजा रखने और अल्लाह की इबादत करने के साथ ही जकात देने, गरीब, लाचार और जरूरतमंदों की मदद करने से आम दिनों के मुकाबले सत्तर गुना अधिक सवाब मिलता है। रमजान के 30 रोजे फर्ज किए गए हैं लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें रोजा न रखने की छूट होती है। कुरान और हदीस में कहा गया है कि हर तंदुरुस्त बालिग मर्द और औरत पर रमजान का रोजा रखने का फर्ज है लेकिन जो लोग बीमार हैं, बहुत वृद्ध हैं, शरीर में रोजा रखने की क्षमता नहीं है, मानसिक रूप से बीमार हैं, बहुत छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाओं को रोजा न रखने की छूट होती है। मासिक धर्म के दौरान भी महिलाओं को रोजा न रखने की छूट होती है लेकिन मासिक धर्म में जितने दिनों का रोजा छूट जाता है, उतने ही रोजे बाद में रखकर इसे पूरा किया जाता है। कोई व्यक्ति अगर यात्रा में है और उसे रोजा रखने में परेशानी हो तो सफर खत्म होने के बाद वह रोजा रख सकता है। गर्भवती महिलाओं को रोजे रखने से छूट दी गई है। 30 दिन रोजे के बदले 60 गरीबों को दोनों वक्त का खाना खिलाने या 60 गरीबों को पौने दो किलो गेहूं या इसके बराबर बाजार की कीमत पर रकम अदा करने की बात कही गई है। ये भी बताया जाता है कि अगर किसी वजह से कोई मुसलमान इन दिनो के छूटे रोजे नहीं रख सकता, तो वो एक इंसान के एक दिन के रोजे के बदले में एक किलो छह सौ तैतीस ग्राम गेंहू या इसकी कीमत किसी जरूरतमंद को सद्का (दान) करके एक रोजे का बदल दे सकता है।———– तराबीह में पढ़ा जाता है कुरान ————————— रमजान में रोजेदार को रात के तीसरे पहर में अजान से पहले उठकर सहरी करते हैं। इसके बाद रोजे की नियत की जाती है और फिर सुबह की नमाज अदा की जाती है। रोजाना की तरह दिनभर काम-काज करते हुए जौहर व असर की नमाज अदा की जाती है। शाम में अजान होने के बाद इफ्तार करने यानी रोजा खोलने के बाद तुरंत मगरिब की नमाज अदा की जाती है। रात में ईशा की नमाज के बाद तरावीह होती है, तरावीह में कुरान पढ़ा जाता है। इस महीने के गुजरने के बाद शव्वाल (इस्लामी पंचांग का दसवां महीना) की पहली तारीख को ईद उल-फित्र या ईद मनाई जाती है। इबादत का महीना रमजान चांद नजर आते ही शुरू हो जाता है। रमजान में तराबीह का भी खासा महत्व है। तराबीह भी एक नमाज है, जिसमें इमाम साहब नमाज की हालत में कुरआन पढ़ते है। ऐसा माना जाता है कि कुरआन को सुनने से भी पुण्य मिलता है। जो लोग किसी वजह से कुरआन नहीं पढ़ पाते वे तराबीह में शामिल होकर इसका सवाब या पुण्य हासिल कर लेते हैं। तराबीह को रात की आखरी यानि इशां की नमाज के बाद पढ़ा जाता है। पूरा कुरआन एक दिन में नहीं पढ़ा जा सकता इसलिए कुरआन को तराबीह में पढ़ने और सुनने के लिए रमजान के दिनों में से कुछ दिन तय कर लिए जाते हैं। इसमें हर मस्जिद अपनी सहूलत के मुताबिक रमजान के तीस दिनों में से तराबीह पढ़े जाने के दिन तय कर लेती है और उन्हीं दिनों में कुरआन को पूरा पढ़ते और सुनते हैं। आमतौर पर तराबीह की नमाज में डेढ़ से दो घंटों का वक्त लग जाता है। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन टीआई के ड्रायवर की वकीलों ने की पिटाई..टीआई जितेंद्र सिंह यादव से भी की हाथापाई… परदेशीपुरा में पुलिसकर्मी और वरिष्ठ अधिवक्ता के बीच मारपीट के मामले में वकीलों ने दिया हाईकोर्ट के सामने धरना