भोपाल– मुस्ताअली बोहरा ।। पिछले कई दशकों में भले ही दुनिया के दिगर देशों की तरह ही भारत ने भी कई उतार चढाव देखे लेकिन भारतीय गणतंत्र की चमक आज भी बरकरार है। हालांकि, व्यवस्थाएं बदली, कई कानून खत्म हो गए और कई बने, पडोसी देशों के साथ संबंध भी बदले यहां तक कि जन प्राथमिकताएं भी बदली लेकिन नहीं बदली तो भारतीय गणतंत्र की ताकत। इसकी वजह ये रही कि भारतीय संविधान में अनेक संशोधन हुए, लेकिन मूल विचारधारा, सिद्धांत और प्राथमिकताओं में कोई रददोबदल नहीं हुआ। कतिपय पडोसी देशों के हमलों, कोरोना जैसी महामारी, आतंकवादी हमलों और कुछेक जगहों पर सांप्रदायिक हिंसा, किसान आंदोलन सहित कुछेक भीतरी गतिरोधों के बावजूद लोकतंत्र की मजबूती कायम है। गणतंत्र दिवस पर जब देश की राजधानी दिल्ली में परेड होती है तो भारत की सैन्य ताकत के साथ यहां की विविधता में एकता, अखंडता और सामाजिक सदभाव की झलक पूरी दुनिया देखती है। भारतीय लोकतंत्र पर प्रश्नचिन्ह लगाने से पहले हमंे उन देशों की हालत देख लेनी चाहिए जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था के बजाय राष्ट्रपति प्रणाली या सैन्य सत्ता है, वहां की स्थिति काफी बदतर है। भारत की आर्थिक, ओद्योगिक, शैक्षिक, चिकित्सा, परमाणु ऊर्जा, तकनीकि कौशल आदि सब भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक शक्ति की देन हैं।
ये थीं संविधान सभा की समितियां
संविधान सभा की समितियों के बारे में शायद कम ही लोगों को जानकारी होगी। संविधान सभा की संघ शक्ति समिति के अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू, संघ संविधान समिति के अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू, संचालन समिति के अध्यक्ष डाॅ राजेन्द्र प्रसार, प्रारूप समिति के अध्यक्ष डाॅ भीमराव अम्बेडकर, मौलिक अधिकार हेतू सलाहकार समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलिक अधिकार हेतु उपसमिति के अध्यक्ष जेबी कृपलानी, प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल, राज्यों के लिए समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, कार्य संचालन समिति के अध्यक्ष केएम मुंशी, अल्पसंख्यक उपसमिति  के अध्यक्ष एचसी मुखर्जी, राष्ट्रीय ध्वज संबंधी समिति के अध्यक्ष डाॅ राजेन्द्र प्रसार, प्रारूप समिति की जांच के लिए विशेष समिति के अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू, नागरिकता पर तदर्थ समिति के अध्यक्ष एस वरदाचारी और संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष डाॅ राजेन्द्र प्रसाद थे।
इन महिलाओं को किया गया था नियुक्त
संविधान सभा में 15 महिलाएं भी चुनी गईं थी। इनमें राजकुमारी अमृत कौर, दुर्गाबाई देशमुख, सुचेता कृपलानी, हंसा मेहता, विजय लक्ष्मी पंडित, बेगम एजाज रसूल, अम्मू स्वामीनाथन, रेणुका रे, पूर्णिमा बनर्जी, एनी मस्कारिन, कमला चैधरी, दक्षयानी वेलायुधान, मलाती चैधरी, सरोजनी नायडू और लीला राय शामिल थीं।
बाबा साहब के साथ ये थे प्रारूप समिति में
प्रारूप समिति जिसके अध्यक्ष डाॅ भीमराव अम्बेडकर थे उनमें अध्यक्ष सहित 7 सदस्य थे। सदस्यों में एन गोपास्वामी अल्ला आयंगर, अल्लादी कृष्ण स्वामी अय्यर, केएम मुंशी, सैय्यद मोहम्मद सादुल्ला शामिल थे। समिति के सदस्य बीएल मित्र के त्यागपत्र देने पर उनकी जगह एन माधव राव को नियुक्त किया गया था। इसी तरह डीपी खेतान की मृत्यु होने पर उनके स्थान पर टीटी कृष्णामचारी को नियुक्ति किया गया था।
लागू होने से पहले भी हुए कई संशोधन
  बाबा साहब ने कहा था कि सच है कि हमने संविधान को तैयार करने अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के सभाओं के मुकाबले अधिक समय और कनाडा व ऑस्ट्रेलिया की तुलना में कम समय लिया। लेकिन संविधान को तैयार करते समय दो बातों का ध्यान रखना जरूरी रहा पहला अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के संविधान हमारे संविधान के मुकाबले काफी छोटे आकार के हैं। भारतीय संविधान में 395 अनुच्छेद है, वहीं अमेरिकी संविधान में केवल 7 अनुच्छेद हैं। इसके अलावा कनाडा के संविधान में 147, आस्ट्रेलियाई संविधान में 128 और दक्षिण अफ्रीकी में 153 धाराएं शामिल की गई हैं। दूसरी सबसे ज्यादा ध्यान रखने वाली बात यह है कि अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के संविधान निर्माताओं को इससे जुड़े बदलाव का सामना नहीं करना पड़ा। उन्होंने जैसा बनाया, वह वैसे ही पास हो गया। भारत में ऐसा नहीं हुआ, संविधान सभा में इसके लिए 2,473 संशोधन करने पड़े यह आसान नहीं रहा। उन्होंने कहा एक संविधान चाहें जितना भी बुरा हो वह अच्छा भी साबित हो सकता है, अगर उसका पालन करने वाले लोग अच्छे हों। संविधान की प्रभावशीलता पूरी तरह से उसकी प्रकृति पर निर्भर नहीं है। संविधान केवल विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का प्रावधान तय कर सकता है। राज्य के इन अंगों का प्रचालन जिन तत्वों पर निर्भर है, वे हैं जनता और उनकी आकांक्षाओं को संतुष्ट राजनीतिक दल। भारतीय संविधान को दो भाषाओं में लिखा गया हिंदी और इंग्लिश। संविधान सभा के हर सदस्य ने इन दोनों की कॉपियों पर साइन किया।

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