तेरी अदा इतनी कातिल भी न थी, कि हम तुझ पर फिदा हुआ जाए।नहीं वो बात की शैदा हुआ जाए,मैं बेवफा नहीं हूँ कि परिवार की,रस्मों-रिवाजों से जुदा हुआ जाए।मैंने माना कुछ बात तो है तुझमें,वरना कहां किसी पर जाता है ध्यान!हाँ, नहीं होते हैं सभी के पूरे अरमान।खाने की टेबल पे कैसे सुनता है कान,देखा हमने सहेली पर तू थी मेहरबान!तेरी बातों में है खूब अकड़ आलिशान।ये जिंदगी की शामें बहुत कठिन है,इस आकर्षण को ऐसे ना रवाँ करना! तू तनहा है किसी से भी प्यार करना।यूँ भी खुद से पहले वो इकरार करना,नजरें झुकाना किसी पे ऐतबार करना!क्योंकि प्यार ऐसे ही नहीं हो जाता है।यूँ तेरी अदाएं अभी-भी कातिल नहीं,कि तुझ पर कोई भी फिदा हो जाए।ये सच हैं तू ख़ुद में पैदा कर वो बात,कि तुझ पर कभी कोई शैदा हो जाए।संजय एम. तराणेकर(कवि, लेखक व समीक्षक)इन्दौर-452011 (मध्यप्रदेश)98260-25986 Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन कराहते बुन्देलखण्ड में उन्माद भड़काने की मुहिम परिवहन विभाग ने शा.औद्योगिक प्रशिक्षण संस्था रीवा में लगाया लर्निंग लाइसेंस शिविर