भोपाल- मुस्ताअली बोहरा…  कब खत्म होगा सांप्रदायिक माहौल देश में.

अयोध्या के बाद मथुरा, काशी और संभल सहित कुछेक और मस्जिदों के मंदिर होने के दावे बीच अब अजमेर दरगार में मंदिर होने को लेकर नया विवाद सामने आ गया है। हिंदु सेना की ओर से राजस्थान की अजमेर शरीफ दरगाह में मंदिर होने को लेकर याचिका स्थानीय अदालत में दायर की गई थी। अदालत ने ये याचिका स्वीकार कर ली। अजमेर दरगार के इस मामले को लेकर सियासी उबाल आ गया है। कई राजनीतिक नेताओं ने खुलकर इसकी आलोचना करते हुए कहा है कि हर मस्जिद में मंदिर ढूंढें जाने की प्रथा पर रोक लगना चाहिए। आल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल के चेयरमैन और दरगाह दीवान के उत्तराधिकारी सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती का कहना है कि दरगाह करीब 850 साल पुरानी है और इसे 100 साल पुरानी किताब से खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने जो सबसे अच्छी बात कही वो ये कि, भारत ग्लोबल शक्ति बनने जा रहा है और हम कब तक मंदिर-मस्जिद के विवाद में फंसे रहेंगे। हम आने वाली पीढ़ियों को क्या मंदिर-मस्जिद विवाद देकर जांएगे। नई परिपाटी देश में बनाई जा रही है कि आए दिन कभी किसी मस्जिद में मंदिर का दावा किया जा रहा है तो कभी किसी दरगाह में। चिश्ती का कहना है कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती 1195 में हिन्दुस्तान आए थे और 1236 ईसवी में ख्वाजा साहब का इंतकाल हुआ, तब दरगाह बनी थी। दरगाह में अंग्रेजी हुकूमत और मुगलों के साथ ही हिंदुस्तान के कई राजाओं ने हाजरी दी। भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के मुस्लिम, हिंदु, सिख, इसाई सबकी आस्था दरगाह से जुड़ी हुई है। यहां चांदी का कटोरा जयपुर महाराज ने चढ़ाया था। चिश्ती ने आरएसएस चीफ मोहन भागवत की बयान का हवाला देते हुए ये भी कहा है कि मोहन भागवत ने 2022 में कहा था कि क्या जरूरत है कि हर मस्जिद में शिवालय ढूंढा जाए। जहां तक अजमेर दरगाह की बात है तो इस पर 1955 में जब ख्वाजा दरगाह साहब एक्ट बनाया जा रहा था उससे पहले एक जांच समिति बनाई गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस गुलाम हसन ने इसकी पूरी जांच की थी। इसमें किसी मंदिर या अन्य धार्मिक स्थल का कोई जिक्र नहीं है। गरीब नवाज पर कई गैर मुस्लिम लेखकों ने भी किताबें लिखीं हैं उनमें कहीं ऐसा कोई उल्लेख नहीं है।  


  मालूम हो कि अजमेर ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह को हिंदू संकट मोचन मंदिर तोड़कर बनाने का दावा अजमेर सिविल न्यायालय पश्चिम ने स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने एएसआई दरगाह कमेटी और अल्पसंख्यक मामला विभाग को नोटिस भेजा है। मामले की अगली सुनवाई 20 दिसंबर को होगी। हिंदू सेना की राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता द्वारा 25 सितंबर को अजमेर न्यायालय में अजमेर ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह को शिव मंदिर होने का दावा करते हुए वाद दायर किया था। याचिका में कहा गया है कि अजमेर शरीफ दरगाह को भगवान श्री संकटमोचन महादेव विराजमान मंदिर घोषित किया जाए। साथ ही दरगाह समिति के अनाधिकृत अवैध कब्जे को हटाया जाए। यह वाद पहले अलग न्यायालय में पेश कर दिया गया जिसके चलते मुख्य न्यायालय में स्थानांतरण अर्जी लगाई गई। अब सिविल न्यायालय पश्चिम में केस ट्रांसफर किया गया। वादी ने 1910 में हरविलास शारदा की किताब की बुनियाद पर दावा किया है। इस मामले में वादी विष्णु गुप्ता के वकील रामनिवास विश्नोई और ईश्वर सिंह द्वारा अपना पक्ष रखते हुए तमाम साक्षी और जानकारियां साझा की हैं। बताया गया कि दरगाह को बने 800 साल से अधिक हुए हैं, इससे पहले यहां शिव मंदिर था और उसे तोड़कर दरगाह का निर्माण किया गया है। जस्टिस मनमोहन चंदेल ने इस दावे को स्वीकार करते हुए नोटिस जारी करने की आदेश दिए। यह नोटिस अजमेर दरगाह कमेटी के साथ ही अल्पसंख्यक मामला विभाग और एएसआई भारतीय पुरातत्व विभाग के नाम जारी किए गए हैं।
इधर, समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव ने याचिका स्वीकार किए जाने को लेकर दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। राज्यसभा सांसद और सीनियर एडव्होकेट कपिल सिब्बल ने कहा है कि आखिर हम देश को कहां लेकर जा रहे हैं। अंजुमन कमेटी के सचिव सरवर चिश्ती का कहना है कि ये दरगाह सामाजिक सदभाव और भाईचारे का प्रतीक है।
यहां ये बताना लाजमी होगा कि अजमेर की दरगाह देश-विदेश में प्रख्यात है। यहां पीएमओ तक से चादर भेजी जाती रही है। इसके अलावा केन्द्र सरकार के मंत्री, मुख्यमंत्री, दूसरे देशों के राजनेता से लेकर फिल्मी सितारे तक यहां मन्नत मांगने और मन्नत पूरी होने पर आभार जताने तक यहां आते हैं। इसके अलावा अजमेर दरगाह की देग भी दुनिया भर में मशहूर है। इस विशाल देग को बादशाह अकबर ने यहां भेंट किया था। ये एक ऐसी देग है जिसमें एक समय में करीब 4500 किलो तक खाना बनाया जा सकता है। यह कढ़ाहीनुमा देग इतनी गहरी है कि इसमें सीढ़ी लगाकर खादिम उतरते हैं और फिर इसमें से लंगर निकाला जाता हैं। इस देग में खास तरह के चावल पकाए जाते हैं जिन्हें जर्दा कहा जाता है। साथ ही दाल भी बड़े स्तर पर पकाई जाती है। जिस जगह देग रखी गई है वहां इंधन का इंतजाम करने का भी अलग ही तरीका है। साल में कई खास आयोजनों में देग में खाना बनता है जिसे प्रसाद के तौर पर वितरित किया जाता है। हाल ही में पीएम के जन्मदिन पर भी इसी देग में चावल बनाए गए थे और उन्हें बांटा गया था।
बहरहाल, अयोध्या विवाद और मंदिर निर्माण को लेकर हुआ उन्माद सब देख चुके हैं। ये तसल्लीजनक है कि यहां श्रीराम जी का मंदिर आकर ले चुका है और इसका पूरा निर्माण मार्च 2025 तक हो जाएगा। अयोध्या के बाद मथुरा, काशी और संभल के विवाद अदालतों में हैं। इन्हीं सर्वे की आड़ लेकर ताजमहल और कुतुबमीनार को भी निशाना बनाने की कोशिशें होते आई हैं, लेकिन अदालतों ने ऐसे ऐतिहासिक खिलवाड़ को खारिज कर दिया। अब कहा तो ये भी जा रहा है कि 900 मस्जिदें ऐसी हैं जो मंदिरों को तोड़कर बनाईं गईं हैं। तो क्या इन मस्जिदों के भी सर्वे कराए जाएंगे? जांच या वैज्ञानिक परीक्षण कराए जाते रहेंगे? यदि सर्वे किए जाएंगे, तो जाहिर है कि इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में बवाल होगा। सर्वे के आदेश और उसके परिणाम हमारे सामने हैं। यूपी के संभल की आंच भी ठंडी नहीं पड़ी है। इसी तरह मणिपुर का भी उदाहरण हमारे सामने है। उच्च न्यायालय ने एक समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के आशय से राज्य सरकार को सर्वे कराने का आदेश दिया था। इस आदेश के बाद जो उन्माद भड़का उसे अब तक केन्द्र और राज्य सरकार नहीं थाम सकी है। इधर, मुस्लिम पक्ष का आरोप है कि उपासना स्थल कानून, 1991 का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है, जबकि 2022 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली न्यायिक पीठ ने फैसला सुनाया था और उपासना स्थल कानून की धाराओं की व्याख्या भी की थी कि सर्वे, जांच या वैज्ञानिक परीक्षण से पूजास्थल का चरित्र नहीं बदलता लेकिन जहां भी अदालत ने सर्वे या वैज्ञानिक जांच के आदेश दिए हैं, वहां बखेड़ा हुआ ही है। तो क्या ये जरूरी है कि अतीत को कुरेदा जाए। हालांकि इस सच को भी नहीं झुठलाया जा सकता कि सालों पहले कुछ मुगल बादशाहों ने हिंदू मंदिरों को खंडित किया और वहां मस्जिदों का निर्माण कराया। लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्होंने सिर्फ मंदिरों को ही खंडित किया बल्कि दरगाहों को भी तोड़ा इसके प्रमाण भी इतिहास में मिलते हैं। खैर, आखिर मंदिर-मस्जिद की कानूनी लड़ाई कब तक चलते रहेगी, कब तक पुराने जख्मों को कुरेदा जाएगा और इन सब से हासिल क्या होगा? जो भी हो, हिन्दुवादी राजनीति और वोट बैंक की लड़ाई में मंदिर-मस्जिद से ज्यादा जरूरी देश का विकास और सामाजिक सदभाव है।

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