-मुस्ताअली बोहराअधिवक्ता एवं लेखकभोपाल, मप्रदीपावली महज सनातन धर्मावलम्बियों का ही त्यौहार हो ऐसा नहीं है। बल्कि जैन धर्म, सिख और बौद्ध धर्म में भी दीपावली का खासा महत्व है। यही भारत की खूबसूरती है कि यहां हर त्यौहार-पर्व आपसी सदभाव और भाई चारे के साथ मनाया जाता है फिर चाहे वह दीपावली हो या ईद या होली या फिर कोई अन्य त्यौहार या पर्व।–महावीर स्वामी प्रज्ञाते नमःजैन धर्म में दीवाली का अपना महत्व है। माना जाता है दीपावली के दिन, भगवान महावीर (युग के अंतिम जैन तीर्थंकर) ने 15 अक्टूबर 527 ईसा पूर्व को पावापुरी में कार्तिक के महीने (अमावस्या की सुबह के दौरान) की चतुर्दशी पर निर्वाण प्राप्त किया था। कल्पसूत्र (आचार्य भद्रबाहु द्वारा रचित) के अनुसार, ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में वहां अंधेरे को प्रकाशित करने के लिए कई देवता थे। यही कारण है कि दीवाली जैन धर्म में महावीर स्वामी के मोक्ष प्राप्ती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसके साथ ही दीवाली के चैथे दिन या दीवाली प्रतिप्रदा को नये वर्ष की शुरूआत होती है। जैन धर्म में भगवान से प्रार्थना करने के लिये दीवाली पर पावा-पुरी की यात्रा करने का भी महत्व है। व्यवसायी धन की पूजा के साथ ही लेखा बहियों की पूजा करके धनतेरस मनाते हैं। काली चैदस पर विशेषतः महिलाओं द्वारा दो दिन का उपवास रखने की परंपरा है। अमावस्या के दिन भगवान की पूजा की जाती है। जैन धर्मावलम्बी महावीर स्वामी प्रज्ञाते नमः का जाप करते है। नए साल के दूसरे दिन महावीर स्वामी की मूर्ति की शोभायात्रा भी निकाली जाती है। जैन मतावलंबियों के अनुसार चैबीसवें तीर्थंकर, महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन उनके प्रथम शिष्य, गौतम गणधर को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था। जैन समाज द्वारा दीपावली, महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है। महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को इसी दिन (कार्तिक अमावस्या) को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन संध्याकाल में उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। —स्वर्ण मंदिर का हुआ था शिलान्याससिखों के लिए दीवाली का अपना महत्व है। इसी दिन ही अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। इसके अलावा 1619 में दीपावली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था। सन् 1619 में सिक्ख गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में 52 राजाओं के साथ मुक्त किया जाना भी इस दिन की प्रमुख ऐतिहासिक घटना रही है। इन राजाओं और हरगोबिंद सिंह जी को बादशाह जहांगीर ने नजरबंद किया हुआ था। जेल से मुक्त होने के बाद हर गोबिंद जी अमृतसर के स्वर्ण मंदिर गए थे। लोगों ने उत्साह के साथ पूरे शहर को सजाकर और दीए जलाकर अपने गुरु की आजादी का जश्न मनाया। उस दिन से गुरु हरगोबिंद जी बंदी-छोर अर्थात् मुक्तिदाता के रूप में जाने जाने लगे। सिख धर्मावलम्बी अपने गुरु की मुक्ति दिवस के रूप में दीवाली मनाते हैं यही कारण है कि यह बंदी छोड दिवस के रूप में भी जाना जाता है। सिखों के दीवाली मनाने का एक और महत्व साल 1737 में भाई मणि सिंह जी की शहादत है। दीपावली के दिन पर उन्होंने खालसा की आध्यात्मिक बैठक में कर का भुगतान करने से इंकार कर दिया, जो मुगल सम्राट द्वारा लगाया गया था। भाई मणि सिंह जी की शहादत को याद कर बंदी छोर दिवस के रूप में दीवाली मनाई जाती है।–बौद्ध धर्म: अशोक विजयादशमी तथागत बुद्ध ने करीब ढाई हजार वर्ष पहले कहा था अत्त दीपो भव यानि खुद दीप बनो। इस दिन पर सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया था। इस वजह से बौद्ध समुदाय द्वारा दीवाली मनाई जाती है। यही कारण है कि वे अशोक विजयादशमी के रूप में दीवाली मनाते है। वे मंत्र जाप के साथ ही सम्राट अशोक को याद कर इसे मनाते हैं।—प्रतिपदा पड़वा का महत्वदीवाली का चैथा दिन वर्ष प्रतिपदा और प्रतिपदा के नाम से जाना जाता है जिसके मनाने का अपना महत्व है। यह हिन्दू कलैण्डर के अनुसार कार्तिक महीने में पहले दिन पडता है। वर्ष प्रतिपदा और प्रतिपदा पडवा के दिन राजा विक्रमादित्य के राज अभिषेक के साथ विक्रम संवत् के प्रारंभ से सम्बन्धित है। इसी दिन व्यवसायी अपने नये वित्तीय खाते शुरु करते है। पडवा के दिन राजा बलि को भगवान विष्णु ने हराया था, इसीलिए इसे बलि पद्दमी के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन भगवान की राक्षस पर विजय की याद में भी मनाया जाता है।–दीपप्रति पादुत्सव दीपावली को प्रकाश पर्व या दीप पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। तुलसीदास रामचरितमानस में ‘विज्ञानदीप’ को प्रतीक स्वरूप प्रस्तुत किया। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार प्रकृति का समस्त सर्वोत्तम प्रकाश रूप है। सूर्य प्रकृति का भाग हैं। कठोपनिषद मुंडकोपनिषद व श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा गया है प्रकृति के केंद्र पर सूर्य प्रकाश नहीं, चंद्र किरणों का भी नहीं। न विद्युत है और न अग्नि, लेकिन उसी एक ज्योति केंद्र से यह सब प्रकाशित है। इसी तरह वृहदारण्यक उपनिषद में ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय यानी अंधकार से प्रकाश व असत से सत की ओर चलने का संदेश है। ऋग्वेद के अनुसार, ‘जन-जन को प्रकाश से भरने के लिए ही अग्नि ने अमर सूर्य को आकाश में बिठाया है। दीपपर्व का उल्लेख पद्म पुराण व स्कंद पुराण में भी है। इतिहासकार अलबरूनी ने भी दीपावली का उल्लेख किया है। लगभग 3500 वर्ष ईसा पूर्व कठोपनिषद में यम और नचिकेता के बीच प्रश्नोत्तरों की स्मृति को भी दीपपर्व से जोड़ा जाता है। सातवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागनंद में इसे ‘दीपप्रति पादुत्सव’ कहा गया है। नौवीं शताब्दी में राजशेखर ने काव्य मीमांसा में इसे दीपमालिका कहा है। ब्रह्मपुराण के अनुसार कार्तिक अमावस्या की इस अंधेरी रात्रि अर्थात् अर्धरात्रि में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक में आती हैं। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like 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