(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

गोरक्षा के नाम पर, हरियाणा के फरीदाबाद में अठारह-उन्नीस साल के, बारहवीं कक्षा के छात्र, आर्यन मिश्र की हत्या की वारदात के बाद, अगर किसी को यह लग रहा हो कि कम से कम अब, गोरक्षा की आड़ में भीड़-हिंसा तथा भीड़ हत्याओं का सिलसिला थम जाएगा, तो अब उसकी यह गलतफहमी दूर हो जानी चाहिए। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं है कि जिस कार में आर्यन था, उसका तीस किलोमीटर तक गोलियां चलाते हुए पीछा करने वाले और अंतत: उसे नजदीक से गोली मारने वाले गिरोह के सरगना, अनिल कौशिश ने बाद में जब आर्यन के घरवालों के सामने अपनी ”गलती” मानी और घटना पर पछतावा जताया, तो यह सिर्फ इसका पछतावा था कि मुसलमान के धोखे में, उनके हाथों से एक हिंदू ब्राह्मण लड़का मारा गया था! ऐसा सिर्फ इसलिए भी नहीं है कि पुलिस शुरूआत में सुलह-समझौते की कोशिश करते हुए, मृतक के परिजनों को इसी पर कन्विंस करने में लगी हुई थी कि आर्यन की मौत एक ”गलती” थी और यह गलती करने वाले ”भले लोग” थेे, जिनकी शराफत का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि वे खुद ही गलती होने की बात मान रहे थे!

और ऐसा सिर्फ इसलिए भी नहीं है कि सत्ताधारी संघ-भाजपा द्वारा नियंत्रित मीडिया द्वारा अनदेखी के जरिए, इस भयावह त्रासदी को कानून व व्यवस्था का मामूली मामला बनाने की ही कोशिश नहीं की गयी है, इन पंक्तियों के लिखे जाने तक न तो शासन के किसी प्रतिनिधि ने पीड़ित परिवार की सुध लेने की जरूरत समझी थी और न ही सत्ताधारी संघ-भाजपा जोड़ी का कोई अदना नेता तक उनसे मिलने गया था। यहां तक कि पीड़ित परिवार के लिए मुआवजे की रुटीन घोषणा तक नहीं की गयी थी। इस हृदय विदारक कांड के किसी खास असर को लेकर किसी गलतफहमी की गुुंजाईश न होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि खुद को गोरक्षक बताने वाले इस तरह के गो-गुंडों का असली सामाजिक-राजनीतिक-वैचारिक सहारा, कथित संघ परिवार, इस त्रासदी से जरा-सा भी विचलित नजर नहीं आता है। उल्टे स्वघोषित संघ परिवार के निर्विवाद संचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या आरएसएस के शीर्ष नेताओं में से एक, इंद्रेश कुमार पटना में संवाददाताओं से बातचीत करते हुए, मॉब लिंचिंग की भयावह घटनाओं को यह कहकर मामूली बनाते ही दिखाई दे रहे थे कि लिंचिग किसी की भी नहीं होनी चाहिए: ‘न कोई इंसान की लिंचिंग और न कोई गाय की लिंचिंग!’ इस तरह वह नर हत्या को गो-हत्या की बराबरी में ही स्थापित नहीं कर रहे थे, वास्तव में गोरक्षा के लिए, मानव हत्या को वैध, सही ठहराने की कोशिश कर रहे थे।

आरएसएस के आला नेता से संवाददाताओं ने जब कथित गोरक्षकों द्वारा लिंचिंग की बार-बार होती घटनाओं के बारे में पूछा, जिसके लिए विपक्षी पार्टियां भाजपा के उभार को जिम्मेदार मानती हैं, इंद्रेश कुमार का जवाब था: ‘देश और दुनिया के कई हिस्सों में लोग मांस खाते हैं। लेकिन, हमें यह मानना पड़ेगा कि गायों को लेकर लोग संवेदनशील हैं। इसलिए, हमें ऐसा वातावरण बनाने की कोशिश करनी चाहिए जहां कोई गाय की लिंचिंग न हो और इंसान की लिंचिंग न हो। हमें, विविधता में एकता का आनंद मनाना चाहिए।’ यानी जब तक गोकशी होती रहेगी, तब तक उसके जवाब में इंसानों की लिंचिंग होती रहेगी! फिर याद दिला दें कि इंद्रेश कुमार ने यह बयान, कथित गोरक्षकों द्वारा मॉब लिंचिंग की घटनाओं में मोदी-3.0 आने के साथ आयी तेजी की पृष्ठभूमि में दिया था, आर्यन मिश्रा की हत्या जिस सिलसिले की ताजातारीन कड़ी है।

इससे चंद रोज ही पहले, हरियाणा में ही चरखी-दादरी में कथित गोरक्षकों ने कूड़ा बीनकर गुजारा करने वाले, दो गरीब बंगाली मुसलमान मजदूरों की दिन-दहाड़े, एक सार्वजनिक जगह पर लिंचिंग की थी, जिसमें साबिर मलिक की मौत हो गयी और असीमुद्दीन को मरा हुआ समझकर छोड़ दिया गया। इस बार मॉब लिंचिंग का बहाना कथित रूप से इसका शक था कि उन्होंने गोमांस खाया हो सकता है। वास्तव में मॉब लिंचिंग से दो-तीन रोज पहले, कथित गोरक्षकों ने इन केे खिलाफ गोमांस खाने की आशंका जताते हुए शिकायत भी की थी, जिस पर पुलिस ने उनकी झोंपड़ियों पर दबिश देकर, वहां मिला मांस इसका पता लगाने के लिए जांच के लिए भेज भी दिया था कि वह किस जानवर का मांस था। लेकिन, गड़बड़ी की संभावना के इस अत्यंत स्पष्ट संकेत के बावजूद, हरियाणा पुलिस ने सतर्कता के कोई कदम उठाने की जरूरत ही नहीं समझी। कथित गोरक्षकों ने इसे अपने मन की करने का संकेत माना और मांस के परीक्षण की रिपोर्ट का इंतजार करने के बजाए, दोनों का जबरन अपरहरण कर लिया और फिर एक सार्वजनिक स्थल पर ले जाकर, लाठी-डंडों से कातिलाना पिटाई की।

पुन:, अपने संघ परिवारी नेता, इंद्रेश कुमार के ही सुर में सुर मिलाते हुए, हरियाणा की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री, नायब सैनी ने एक प्रकार से गोमांस खाने के शक को, नरहत्या के लिए पर्याप्त उकसावा बता दिया। इंद्रेश कुमार की ही तरह, भाजपायी मुख्यमंत्री ने लिंचिंग की घटना को ”दुर्भाग्यपूर्ण” कहा तो जरूर, लेकिन इस दरिंदगी के लिए तथाकथित गोरक्षकों की निंदा करने की उन्होंने कोई जरूरत नहीं समझी। उल्टे सैनी ने प्रकारांतर से इस मामले में अपनी पुलिस तथा प्रशासन की घोर विफलता को एक प्रकार से स्वाभाविक ही करार देते हुए कहा कि ऐसी बातों से लोगों की भावनाएं आहत होती हैं। इसीलिए, उनकी सरकार ने गोरक्षा के लिए कड़ा कानून बनाया था। इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। और अंत में यह कि गांवों में लोगों की भावनाएं भड़क जाएं, तो कौन रोक सकता है? दूसरी ओर, भाजपायी मुख्यमंत्री ने जोर देकर दावा किया कि चरखी-दादरी में जो हुआ, उसे मॉब लिंचिंग कहना गलत था। शायद सैनी के अनुसार, यह क्रिया की स्वाभाविक प्रतिक्रिया का मामला था — गोमांस खाने के शक में हत्या!

हरियाणा में लिंचिंग की इन हालिया घटनाओं से और खासतौर पर चरखी-दादरी और फरीदाबाद की कथित गोरक्षकों द्वारा हत्या की घटनाएं जिस तरह, एक के फौरन बाद दूसरी हुई हैं, उनसे इसकी आशंका होना अस्वाभाविक नहीं है कि इन घटनाओं का, अगले ही महीने के आरंभ में होने जा रहे, हरियाणा के विधानसभाई चुनावों से संबंध हो सकता है। यह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है कि हरियाणा में भाजपा को एक खासतौर पर कठिन चुनाव का सामना करना पड़ रहा है। वास्तव में इसी राजनीतिक-सामाजिक प्रतिकूलता का पूर्वानुमान कर, संघ-भाजपा जोड़ी इस राज्य में भी, जहां मुस्लिम आबादी अधिक नहीं है, अपने पीछे हिंदुओं को गोलबंद करने के लिए, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों में लगी रही है।

खासतौर पर मुस्लिम आबादी के केंद्रीयकरण की पॉकेट, मेवात के इलाके को केंद्रित कर, गोरक्षा के नाम पर खासतौर पर हिंसक गिरोहों को संगठित किया गया है, जिनकी गतिविधियों ने मेवात के इलाके को देश की मॉब लिंचिंग की राजधानी ही बना दिया है। इसी सिलसिले के हिस्से के तौर पर, पिछले ही साल फरवरी में कथित गोरक्षकों द्वारा नासिर और जुनैद की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी गयी थी। बाद में अगस्त के आरंभ में नूंह में कथित ब्रज मंडल शोभायात्रा के नाम पर, बाकायदा दंगा भी कराया गया था, जिसका समापन भाजपा सरकार की पुलिस की पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण मुस्लिम-विरोधी कार्रवाई के साथ हुआ था। उधर गुड़गांव में खुले में नमाज को रोकने के नाम पर, उकसावेपूर्ण मुस्लिमविरोधी मुहिम चलायी जाती रही है। खासतौर पर किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में, ध्रुवीकरण की इन कोशिशों के खास सफल न होने के बाद अब, कथित गोरक्षकों के सहारे चुनाव से ऐन पहले एक बार फिर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का दांव आजमाया जा रहा है। लेकिन, यह सब सिर्फ चुनावी चिंताओं का मामला ही नहीं है।

वास्तव में आम चुनाव के नतीजे आने के बाद से, गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग के मामलों में उल्लेखनीय तेजी आयी है। चुनाव नतीजों के बाद इसकी शुरूआत छत्तीसगढ़ से हुई थी, जहां ट्रक ड्राइवर तथा क्लीनर समेत तीन लोगों की कथित गोरक्षकों ने पीछा कर के हत्या कर दी थी। लेकिन बाद में, जैसाकि भाजपा-शासित राज्यों में आम है, पुलिस की जांच में यह नतीजा पेश कर दिया गया और तत्परता से सरकार द्वारा उसका अनुमोदन भी कर दिया गया कि दो मरने वाले, खुद ही पुल से नदी में कूद गए थे! गोरक्षकों ने तो उनका पीछा भर किया था! उसके बाद से विभिन्न राज्यों में कथित गोरक्षकों द्वारा मॉब लिंचिंग की अनेक घटनाएं हो चुकी हैं। मॉब लिंचिंग की इन घटनाओं से, जिनमें अक्सर दोषियों के खिलाफ समुचित कार्रवाई नहीं होती है और तरह-तरह के बहानों से की जाने वाली बुलडोजर कार्रवाइयों आदि से मिलकर, मुसलमानों के खिलाफ एक प्रकार से राजनीतिक-चुनावी बदला लिए जाने का वातावरण बन रहा है। भाजपा के अनेक नेताओं के मुस्लिम-विरोधी बयान और मोदी एंड कंपनी का अपनी सोची-समझी चुप्पी से इस सब को बढ़ावा देना, इस वातावरण को और दमघोंटू बना रहा है। इंद्रेश कुमार के बयान से साफ है कि आरएसएस, इस सिलसिले को आगे बढ़ाने की ही कोशिश करेगा, न कि टूटने देगा।

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