मुस्ताअली बोहरा,अधिवक्ता एवं लेखकभोपाल, मप्र मैंने राहुल गांधी को बहुत पीछे छोड़ दिया है, अब मैं वो राहुल गांधी नहीं हूँ………… सच ही कहा था। 18 वीं लोकसभा में सदन के भीतर जो राहुल गांधी दिखाई दिए वो पहले के राहुल से ज्यादा नहीं तो थोड़े बहुत अलग ही थे। जो लोग कभी उन्हें पप्पू कहकर तंज करते थे वो भी उनके भाषण के दौरान असहज दिखे। लोकसभा के नए भवन में नई सरकार के गठन के बाद नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल ने पहली बार संबोधन दिया। राहुल ने अपने भाषण से खूब वाहवाही बटोरी हालांकि उनके भाषण के हिंदू वाले अंश पर खूब हंगामा भी हुआ और दर्जन भर से ज्यादा प्वाइंट को रिकार्ड से हटा दिया गया। राहुल के अलावा सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी सदन में सत्ता पक्ष पर कटाक्ष करते हुए खामियां गिनाईं। कुल मिलाकर, अभी जो तस्वीर सामने आई उससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगले पांच साल मोदी सरकार के लिए आसान नहीं होने वाले हैं। राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। राहुल सदन में विपक्ष की आवाज बनेंगे ये तो चुनावी परिणाम आने पर ही तय हो गया था। लोकसभा में उनका जो रूप देखने को मिला उसने ज्यादातर लोगों को हैरत में डाल दिया। राहुल ने जिस तरह से अपनी बात रखी और जिस तरह से तर्क दिए उससे भाजपा बैकफुट पर दिखी। नेता प्रतिपक्ष के तौर पर लोकसभा में बोलते हुए राहुल गांधी मंझे हुए और परिपवक्व नेता के रूप मंे नजर आए। राहुल को रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, रक्षा मंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चैहान भी खड़े हुए। कई मौकों पर राहुल को घेरने की कोशिश की लेकिन राहुल ने नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपना काम कर दिखाया। विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल भले ही पहली बार बोले हों लेकिन कई मौकों पर उन्होंने भाजपा को असहज कर दिया। मालूम हो कि भारत जोड़ो यात्रा के दौरान पत्रकारांे से बात करते हुए राहुल कहा था, मैंने राहुल गांधी को बहुत पीछे छोड़ दिया है, अब मैं वो राहुल गांधी नहीं हूँ। उनकी ये बात सदन में साफ नजर आई। यहां ये बताना लाजमी होगा कि दस साल बाद लोकसभा को नेता प्रतिपक्ष मिला है। पिछले दो आम चुनावों में कांग्रेस के पास संसद का 10 फीसदी सीट शेयर (54 सीट) भी नहीं रहा था। ऐसे में कांग्रेस सदन में विपक्ष के नेता के तौर पर अपनी दावेदारी पेश ही नहीं कर पाई थी। सन 2014 में कांग्रेस के पास 44 सीटें थीं और 2019 में 52 सीटें थीं। इस बार कांग्रेस के पास 99 सीटें हैं। 19 जून 1970 को नई दिल्ली में जन्में राहुल हमेशा की तरह शांत लेकिन हमलावर दिखे, इस बार उनके भाषण में तंज का पुट भी नजर आया। राहुल ने पीएम मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने बोला है मेरा डायरेक्ट कनेक्शन है भगवान से। ये मैने नहीं पीएम मोदी ने बोला है। उन्हें डायरेक्ट मैसेज आया और उन्होंने नोट बंदी कर दी। राहुल ने कहा कि इनकम टैक्स, ईडी सब स्माॅल बिजनेस आनर्स के पीछे पड़े रहते हैं। राहुल तो पीएम मोदी पर कटाक्ष करते हुए ये कहने से भी नहीं चूके कि राजनाथ सिंह और गडकरी जी इनके सामने नमस्ते तक नहीं करते। राहुल ने ओम बिरला के फिर से लोकसभा स्पीकर बनने पर बधाई देते हुए कहा कि जाहिर है कि सरकार के पास राजनीतिक शक्ति है लेकिन विपक्ष भी भारत के लोगों की आवाज का प्रतिनिधित्व कर रहा है। इस बार विपक्ष भारत के लोगों की आवाज का प्रतिनिधित्व ज्यादा दमदार तरीके से कर रहा है। विपक्ष आपको संसद चलाने में मदद करेगा। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि सहयोग भरोसे के साथ होना चाहिए। विपक्ष की आवाज संसद में सुनाई दे यह बहुत जरूरी है। हमें पूरी उम्मीद है कि विपक्ष की आवाज संसद में दबाई नहीं जाएगी। सवाल यह नहीं है कि संसद कितनी शांति से चल रही है। सवाल यह है कि भारत के लोगों की आवाज उठाने के लिए कितनी अनुमति मिलती है। आप विपक्ष की आवाज दबाकर संसद शांति से चला सकते हैं लेकिन यह आइडिया अलोकतांत्रिक है। स्पीकर की यह जिम्मेदारी होती है कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे। राहुल ने कहा कि हिन्दुस्तान अहिंसा का देश है, यह डरता नहीं है। हमारे महापुरूषों ने संदेश दिया, डरो मत, डराओ मत। शिवजी कहते हैं डरो मत, डराओ मत और त्रिशूल को जमीन में गाड़ देते हैं। दूसरी तरफ जो लोग अपने आपको हिंदु कहते हैं वो 24 घंटे हिंसा-हिंसा-हिंसा, नफरत-नफरत-नफरत, आप हिंदू हो ही नहीं, हिंदू धर्म में साफ लिख है सच का साथ देना चाहिए। राहुल गांधी के इसी बयान में सदन से लेकर सड़क तक हंगामा मचा हुआ है। पीएम मोदी ने कहा कि पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना गंभीर बात है। हालांकि राहुल ने ये भी कहा कि पीएम मोदी और भाजपा पूरा हिंदू समाज नहीं है। राहुल ने अग्निवीर और एमएसपी मुद्दे पर भी खुलकर बोला। राहुल एक के बाद एक फायर करते रहे। उन्होंने अयोध्या का जिक्र छेड़ भाजपा की दुखती रग पर हाथ रख दिया तो ये भी कहा कि जम्मू कश्मीर से राज्य का दर्जा छीना गया। राहुल ने मणिपुर का मुद्दा उठाया तो भूमि अधिग्रहण बिल का मामला भी उछाल दिया। जिस तरह से मुद्दे उछलते रहे उससे एक दशक बाद भाजपा सदन के भीतर बचाव की मुद्रा में नजर आई। पहली बार राहुल गांधी ने संसद में संवैधानिक पद लिया है। ये भी पहली बार है, जब उनके साथ लोकसभा में उनकी माँ सोनिया गांधी नहीं होंगीं। सोनिया गांधी राज्यसभा सांसद बन गई हैं और उन्हीं की सीट रायबरेली से राहुल गांधी चुने गए हैं। राहुल रायबरेली के साथ ही वायनाड सीट से भी जीते थे लेकिन राहुल ने रायबरेली से सांसद रहना चुना। जहां तक राहुल के पद लेने का सवाल है तो राहुल भी बड़े ओहदे को लेने से इंकार करते रहे हैं। वर्ष 2019 में जब कांग्रेस लोकसभा चुनाव में हारी तो राहुल गांधी ने इस पराजय की जिम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ दिया था। इसके बाद कुछ सालों तक सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष रहीं। इस दौरान कई ऐसे मौके आए जब राहुल गांधी से अध्यक्ष पद वापस लेने को कहा गया लेकिन वो इस बात पर अड़े रहे कि वो अपनी पार्टी में कोई बड़ा पद नहीं लेंगे। अब इतने सालों में पहली बार राहुल गांधी कोई अहम पद लेने को तैयार हुए। इधर, कांग्रेस ने सन 2022 में मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी अध्यक्ष बनाकर कमान सौंपी। खड़गे के रूप में पार्टी की कमान लंबे समय बाद गैर गांधी-नेहरू परिवार के व्यक्ति के हाथों में है। नेता प्रतिपक्ष एक कैबिनेट रैंक का पद है। जहां तक विपक्ष के नेता की संवैधानिक शक्तियों या अधिकारों का सवाल है तो नेता प्रतिपक्ष को बहुत सारे पाॅवर होते हैं। नेता प्रतिपक्ष पूरे विपक्ष का नेतृत्व करता है। एक तरह से वो पूरे विपक्ष की आवाज होता है। साथ ही कई जरूरी नियुक्तियों में प्रधानमंत्री के साथ होने वाली बैठकों में मौजूद रहता है। नेता प्रतिपक्ष कई प्रमुख समितियों जैसे पब्लिक अकाउंट, पब्लिक अंडरटेकिंग और एस्टिमेट पर बनाई गई कमेटी का हिस्सा होता है। विपक्ष के नेता की सबसे अहम भूमिका संयुक्त संसदीय समितियों और चयन समितियों में होती है। ये चयन समितियां प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो, केंद्रीय सतर्कता आयोग, केंद्रीय सूचना आयोग, लोकपाल, साथ ही चुनाव आयुक्तों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जैसे काफी महत्वपूर्ण पदों की नियुक्तियां करती हैं। यानि, अब अहम पदों पर जो भी नियुक्तियां होंगी उसमें विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गांधी की राय मायने रखेगी। साथ ही पीएम मोदी के लिए भी मनमाने तरीके से नियुक्ति करना आसान नहीं होगा।ये भी दिलचस्प है कि कांग्रेस जब सत्ता से बाहर हुई तो नेता प्रतिपक्ष बनाने लायक भी सीटें नहीं जीत पाई। कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए राहुल ने सात सितंबर 2022 से कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा की शुरुआत की। भारत जोड़ो यात्रा 7 सितंबर 2022 को दक्षिण से कन्याकुमारी, तमिलनाडु से होकर उत्तर में श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर में समाप्त हुई। इस दौरान 12 राज्यों में 4080 किलोमीटर की दूरी तय की। इसके बाद राहुल ने मणिपुर से मुंबई तक भारत जोड़ो न्याय यात्रा की। राहुल गांधी की पूर्व से पश्चिम भारत जोड़ो न्याय यात्रा 14 जनवरी को मणिपुर के थौबल में शुरू हुई। इस दौरान 15 राज्यों से होकर गुजरी, जिसमें 6713 किलोमीटर की दूरी तय हुई और मुंबई में समाप्त हुई। राहुल समर्थकों का मानना है कि राहुल की यात्राओं की बदौलत ही वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 99 सीटों पर जीत मिली। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का मानना है कि राहुल की मेहनत की वजह से इन यात्राओं के दौरान गरीबों, मजदूरों, किसानों, महिलाओं, युवाओं, पिछड़े वर्गों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की समस्याओं और परेशानियों को समझने का प्रयास किया गया। इन यात्राओं के जरिए लोगों का कांग्रेस के प्रति विश्वास और गहरा हुआ जिसका नतीजा 2024 के आम चुनाव में साफ नजर आया। राहुल गांधी को पढ़ना, संगीत, शतरंज खेलने, घूमने, घुड़सवारी, वाटर स्पोटर्स और बाइकिंग का शौक है। बहरहाल, राहुल गांधी के सामने अभी चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। सबसे पहले तो उन्हें कांग्रेस को नए सिरे से चुस्त-दुरूस्त करना होगा। गांधी-नेहरू की कांग्रेस की बजाए उन्हें इसे लोगों की या आमजन की कांग्रेस बनाना होगा। इसके अलावा लोकसभा में मोदी का सामना करते हुए उनकी धार को कुंद करना सबसे बड़ी चुनौती होगी। राहुल को अपनी वाकशैली में भी बदलाव करना होगा, उन्हें धारदार वक्ता बनना होगा। नेता प्रतिपक्ष के रूप में सरकार को घेरने के लिए राहुल को अर्थशास्त्र, राजनीति, सरकार प्रबंधन, रक्षा, विदेश नीति, कारपोरेट सेक्टर, होम अफेयर्स आदि के विशेषज्ञों से भी सलाह लेते रहना होगा ताकि सदन में जब इन विषयों पर चर्चा हो तो सरकार की खामियों को उजागर किया जा सके। उन्हें पीएम मोदी की राजनीति, आर्थिक-विदेश नीति, कूटनीति में खामियां तलाशनी होंगी। सदन में सरकार को बताना होगा कि किस तरह से जनसरोकार वाली योजनाएं बनाई और क्रियान्वित की जा सकती हैं। राहुल को उन मौकों की तलाश में रहना होगा जब मोदी कोई चूक करें। ये सभी जानते हैं कि चाहे जब वह गुजरात के सीएम रहे हो या फिर केन्द्र में पीएम, उनकों कम ही मौकों पर चुनौती मिली है। लेकिन 2024 के आम चुनाव में सरकार और सदन की तस्वीर बदल गई है। इस बार मोदी पर गठबंधन दलों का दबाव ज्यादा होगा। सरकार में सहयोगी दल वक्त आने पर अपनी मांगे मोदी के सामने रखेंगे। मान-मनौव्वल के बीच मोदी से चूक होने संभावनाएं ज्यादा होंगी, राहुल को बस ऐसे ही मौके की तलाश में रहना होगा। राहुल ऐसे मौके का फायदा उठा सकते हैं। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन बागपत में क्लाइमेट कार्डिनल्स चैप्टर का हुआ शुभारंभ, जलवायु परिवर्तन 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