(आलेख : सुभाष गाताडे)

पिछले एक दशक से जातिगत पदानुक्रम को वैध बनाने और जातिगत उत्पीड़न को पवित्र मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

यह वह दौर था, जब भारत आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा था। अनेक कार्यक्रम हो रहे थे। तब किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कैसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इन समारोहों में अपनी आवाज़ शामिल कर ली थी। उसे सबसे अच्छा तरीका यही लगा कि वह भारतीय परिस्थितियों और उसके प्रेरणा स्रोतों के बारे में अपना दृष्टिकोण साझा करे।

इसने एक दस्तावेज जारी किया, जिसमें मानवाधिकारों के प्रति उसके नजरिए की झलक पेश की गई थी :

“प्राचीन भारतीय साहित्य, जिसमें वेद, उपनिषद और विभिन्न धर्म शास्त्र (नैतिकता और कर्तव्यों पर ग्रंथ) जैसे ग्रंथ शामिल हैं, में ऐसे संदर्भ और शिक्षाएं हैं जो मानव अधिकारों के सिद्धांतों के साथ प्रतिध्वनित होती हैं। मनुस्मृति, अपने समय के सामाजिक मानदंडों को प्रतिबिंबित करते हुए, न्याय के सिद्धांतों को भी रेखांकित करती है, जिसमें अपराध के अनुपात में दंड भी शामिल है।”

न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अरुण कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में एनएचआरसी के प्रमुख लोगों को शायद ही यह याद हो (या उन्होंने जानबूझकर इसे भुला दिया?) कि महान समाज सुधारक भीमराव अंबेडकर, जो संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष थे, ने इस धार्मिक ग्रंथ के बारे में क्या कहा था, कैसे उन्होंने एक ऐतिहासिक सत्याग्रह का नेतृत्व किया था — जिसे महाड़ सत्याग्रह कहा जाता है (1927) — जहां उन्होंने हजारों लोगों को इसके मानव-विरोधी सामग्री के लिए मनुस्मृति को जलाने के लिए प्रेरित किया था … (25 दिसंबर, 1927)। वहां आयोजित प्रस्तावों में रेखांकित किया गया कि कैसे मनुस्मृति ने शूद्र जाति को कमजोर किया, उनकी प्रगति को बाधित किया और उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी को स्थायी बना दिया :

“इस सम्मेलन का यह दृढ़ मत है कि मनुस्मृति, अपने श्लोकों (वचनों) को ध्यान में रखते हुए, जो शूद्र जाति को कमजोर करते हैं, उनकी प्रगति को रोकते हैं, तथा उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी को स्थायी बनाते हैं, तथा उनकी तुलना हिंदुओं के जन्मसिद्ध अधिकारों के घोषणापत्र के उपरोक्त भाग में बताए गए सिद्धांतों से करते हैं, वह धार्मिक या पवित्र पुस्तक बनने के योग्य नहीं है। और इस मत को अभिव्यक्त करने के लिए यह सम्मेलन ऐसे धार्मिक ग्रंथ का दाह संस्कार कर रहा है जो लोगों को बांटने वाला और मानवता का विनाश करने वाला रहा है…”। (महाड़ सम्मेलन में प्रस्ताव, 25 दिसंबर, 1927, पृष्ठ 351, महाड़: प्रथम दलित विद्रोह का निर्माण’ – आनंद तेलतुंबड़े, आकार बुक्स, 2015)

मनुस्मृति की वास्तविक सामग्री को अनजाने में या जानबूझकर अदृश्य करने का यह पहला (या अंतिम) मामला नहीं था, जिसे डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में आयोजित सम्मेलन द्वारा “लोगों को विभाजित करने वाला और मानवता को नष्ट करने वाला” माना गया था।

यह कहना गलत नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी के शासन का दशक (2014-2024) एक महत्वपूर्ण अवधि रही है, जिसमें मनुस्मृति को सामान्य बनाने या उसे पवित्र बनाने के ऐसे प्रयास बेरोकटोक जारी रहे हैं। इस तरह के हस्तक्षेप न्यायिक स्तर या संस्थागत स्तर पर, साथ ही सांस्कृतिक समारोहों या यहां तक ​​कि विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रमों से लेकर छात्रों के लिए पाठ्यपुस्तकों के स्तर पर भी दिखाई देते हैं।

महज एक साल पहले गुजरात उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय स्तर पर तब सुर्खियां बटोरी थीं, जब उसने एक नाबालिग लड़की के पिता द्वारा दायर गर्भपात की याचिका पर विचार-विमर्श करते हुए 17 साल की उम्र में लड़कियों की शादी की बात कही थी। उक्त न्यायाधीश ने तुरंत उसकी गर्भावस्था को समाप्त करने का आदेश नहीं दिया था, बल्कि उस बेचारे पिता को सलाह दी थी कि वह अपनी सोच को अपडेट करने के लिए मनुस्मृति को फिर से पढ़े। न्यायमूर्ति समीर जे दवे ने कहा था :

“पुराने समय में लड़कियों की 14-15 साल की उम्र में शादी हो जाना और 17 साल की उम्र से पहले बच्चा पैदा होना सामान्य बात थी…आप इसे नहीं पढ़ेंगे, लेकिन इसके लिए एक बार मनुस्मृति जरूर पढ़ें।”

या फिर, दिल्ली उच्च न्यायालय की एक अन्य न्यायाधीश ने ‘महिलाओं को सम्मान देने’ के लिए मनुस्मृति की खुले आम प्रशंसा की थी, (वे एक कार्यक्रम में बोल रही थीं, जहां उन्हें उद्योग मंडल फिक्की द्वारा आमंत्रित किया गया था)। उनके शब्द थे :

“मुझे सच में लगता है कि भारत में महिलाओं का बहुत बड़ा भला हुआ है और इसका कारण यह है कि हमारे शास्त्रों में हमेशा महिलाओं को बहुत सम्मानजनक स्थान दिया गया है और जैसा कि मनुस्मृति में कहा गया है कि अगर आप महिलाओं का सम्मान नहीं करते हैं, तो आप चाहे कितनी भी पूजा-पाठ क्यों न करें, उसका कोई मतलब नहीं है। इसलिए मुझे लगता है कि हमारे पूर्वज और वैदिक शास्त्र अच्छी तरह जानते थे कि महिलाओं का सम्मान कैसे किया जाता है।”

शायद एनएचआरसी के ‘ज्ञान के मोती’ या इन न्यायाधीशों की टिप्पणियों के कारण, मनुस्मृति को दी जा रही नई वैधता अब एक तथ्य बन गई है।

दरअसल, एक शोधकर्ता/लेखक द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया है कि आज ‘भारतीय न्यायपालिका के उच्च पदों पर बैठे लोगों द्वारा मनुस्मृति को स्वीकार करने और मान्यता देने’ का चलन बढ़ रहा है। यह धीरे-धीरे फैल रहा है और ‘विषाक्त हिंदुत्व के उदय’ के साथ इसने जबरदस्त गति पकड़ ली है।

जैसा कि एससीसी ऑनलाइन और इंडियनकानून. ओआरजी दोनों बताते हैं : 1950 से 2019 के बीच, सुप्रीम कोर्ट और कई उच्च न्यायालयों द्वारा कुल 38 बार मनुस्मृति का इस्तेमाल किया गया है, उनमें से 26 (लगभग 70%) 2009 और 2019 के बीच के हैं। यह अवधि पूरे उपमहाद्वीप में उग्र हिंदुत्व के उदय के साथ मेल खाती है। 1989 से 2019 के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने कुल 7 बार अपने फैसले देने में मनुस्मृति का इस्तेमाल किया है।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) को ही देख लीजिए, जिसने पिछले वर्ष ही अपने पीएचडी कार्यक्रम के तहत मनुस्मृति की ‘प्रयोज्यता’ का अध्ययन करने के लिए एक शोध परियोजना शुरू की थी। विश्वविद्यालय के धर्मशास्त्र और मीमांसा विभाग, जिसके पाठ्यक्रम में प्राचीन भारतीय ग्रंथों में से मनुस्मृति का अध्ययन पहले से ही शामिल है, ने भारतीय समाज में मनुस्मृति की “प्रयोज्यता” पर शोध करने का प्रस्ताव (2023) रखा है। इसने केंद्र की प्रतिष्ठित संस्थान योजना के तहत प्राप्त धन का उपयोग करने की योजना बनाई थी, जो 10 चुनिंदा सार्वजनिक वित्त पोषित संस्थानों को 1,000 करोड़ रुपये तक का अनुसंधान और विकास अनुदान प्रदान करती है।

बीएचयू का प्रस्ताव असंगत प्रतीत हुआ — और सिर्फ इसलिए नहीं कि इसमें एक गूढ़ विषय पर धन खर्च करना शामिल है, जबकि सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिसके कारण उन्हें आवश्यक खर्चों में भी कटौती करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है।

एनएचआरसी का मनुस्मृति के प्रति अचानक आकर्षण, या विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा मनुस्मृति की प्रशंसा करना, कानूनी विद्वान मोहन गोपाल द्वारा शीर्ष न्यायपालिका की संरचना के बारे में की गई टिप्पणियों से मेल खाता है। लाइव लॉ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में दिए गए भाषण में उन्होंने विस्तार से बताया था कि ‘धर्म के आधार पर संविधान की तुलना में धर्म में कानून का स्रोत खोजने वाले न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि हुई है :

“परंपरावादी/धर्मतंत्रवादी न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि हुई है — जैसा कि मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में हुआ। यह 2047 तक हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लक्ष्य को प्राप्त करने की दो भागों में बंटी रणनीति का एक अनिवार्य हिस्सा है। यह काम संविधान को उखाड़ फेंकने से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस संविधान की व्याख्या एक हिंदू दस्तावेज के रूप में करके किया जाना है। पहले चरण में ऐसे न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई, जो इससे आगे देखने के लिए तैयार हों, तथा दूसरा चरण जो अब शुरू होगा, उसमें न्यायाधीश स्रोत की पहचान करेंगे और इसकी शुरुआत हिजाब निर्णय से हुई। …हम धीरे-धीरे उस स्थिति में पहुंच सकते हैं, जहां हम कह सकते हैं कि भारत उसी संविधान के तहत एक हिंदू धर्मतंत्र है – जिसकी सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्व्याख्या की है। इसलिए यह विचार न्यायपालिका का अपहरण करने और एक हिंदू धर्मतंत्र स्थापित करने का है।”

न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने और उसे कार्यपालिका के हस्तक्षेप से बचाने की इस लड़ाई के परिणाम भारत में लोकतंत्र पर दीर्घकालिक प्रभाव डालेंगे।

मानवाधिकार कार्यकर्ता और एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के अध्यक्ष आकार पटेल इस भाषण के इर्द-गिर्द चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। वे इस बात को उठाते हैं कि कैसे यहाँ कुलीनतंत्र उन नियमों का विरोध करता है, जिनका भारत के संविधान में विरोध है, जिसमें समानता, धर्मनिरपेक्षता, गरिमा आदि जैसे मूल्यों पर जोर दिया गया है और यह पाकिस्तान से अलग है, जहाँ दोनों एक ही दिशा में हैं। दूसरा, उन्होंने विस्तार से बताया कि किस प्रकार यहां न्यायपालिका में विविधता का अभाव है, जिसके कारण इस पर कब्जा करना आसान हो गया है।

तथ्य यह है कि लोगों और इन घटनाक्रमों से संबंधित संस्थाओं को संविधान के मूल सिद्धांतों और मूल्यों को बचाने के लिए एकजुट होकर प्रयास करना होगा।

निष्कर्ष निकालने से पहले, यह देखना दिलचस्प होगा कि दुनिया के सबसे बड़े और सबसे मजबूत लोकतंत्र की प्रगति में दिलचस्प समानताएं हैं।

वास्तव में, जब यहाँ धार्मिक न्यायाधीशों के धीमे प्रभुत्व के बारे में चिंताएँ बढ़ रही हैं, तो कोई यह देख सकता है कि अमेरिकी न्यायपालिका भी इसी तरह के बदलावों का सामना कर रही है। कुछ समय पहले ही लुइसियाना ने पब्लिक स्कूलों में दस आज्ञाएँ प्रदर्शित करने के लिए बाध्य करने का निर्णय लिया था।

लुइसियाना द्वारा सार्वजनिक स्कूलों में दस धर्मादेशों को प्रदर्शित करने के लिए बाध्य करने का निर्णय, अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के दक्षिणपंथी बहुमत के विवादास्पद निर्णयों की श्रृंखला का नवीनतम परिणाम है, जिसने भानुमती का पिटारा खोल दिया है, जो अमेरिका को एक धर्मशासित राज्य में बदलने के प्रयासों को बढ़ावा दे रहा है।

यह जानकर खुशी हो रही है कि एसीएलयू (अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन) ने अन्य संगठनों की मदद से इस अध्यादेश को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि यह ‘धार्मिक जबरदस्ती’ के अलावा और कुछ नहीं है।

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