महाशिवरात्रि : इसी दिन हुई थी सृष्टि की शुरूआत– शिव-पार्वती के विवाह का पर्व– समुद्र से निकला था हलाहल भोपाल। मुस्ताअली बोहरा,अधिवक्ता एवं लेखक महाशिवरात्रि…….इसी दिन सृष्टि की शुरूआत हुई इसी दिन शिव और पार्वती का विवाह हुआ, इसी दिन समुद्र से निकले विष को शिव ने पीकर दुनिया को अंधेरे से बचाया। महाशिवरात्रि भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। माघ फागुन फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। महाशिवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है शिव की महान रात। पुरातन कथाओं के अनुसार इस दिन शिव नृत्य या तांडव करते हैं। महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। ऐसा माना जाता है कि समुद्र मन्थन के दौरान अमृत के साथ हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में ब्रह्माण्ड को नष्ट करने की क्षमता थी और केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कण्ठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव अत्यधिक दर्द से पीड़ित हो उठे थे और उनका गला नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव नीलकण्ठ के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जगाये रहने की सलाह दी। शिव को आनंदित करने और जगाये रखने के लिए देवताओं ने नृत्य किए और संगीत बजाए। जैसे सुबह हुई उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। विष पीकर शिव ने दुनिया को अंधेरे और निराशा से बचाया था। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारम्भ महाशिवरात्रि से ही हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (महादेव का ही स्वरूप) के उदय से हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव व पत्नी पार्वती की पूजा होती हैं। यह पूजा व्रत रखने के दौरान की जाती है। यूं तो हर महीने यानि साल में 12 शिवरात्रि आती हैं लेकिन महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत के अलावा, नेपाल, श्रीलंका, वेस्ट इंडीज सहित अन्य देशों में भी महाशिवरात्रि मनाई जाती है। कश्मीर शैव मत में इस त्यौहार को हर-रात्रि भी कहा जाता हैं। शिव जिनसे योग परंपरा की शुरुआत मानी जाती है को आदि (प्रथम) गुरु माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस रात को ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है जिससे मनुष्य में ऊर्जा का संचार होता है। इसे भौतिक और आध्यात्मिक रूप से लाभकारी माना जाता है इसलिए इस रात जागरण की भी परंपरा है। कई स्थानों पर महाशिवरात्रि की रात भजन-कीर्तन, जाप और अन्य धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। महाशिवरात्रि को महिलाओं के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। विवाहित महिलाएँ अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुखी जीवन के लिए व्रत करती हैं। ये भी मान्यता है कि महाशिवरात्रि का व्रत रखने से अच्छा जीवनसाथी मिलता है, शीघ्र शादी के योग बनते हैं इसलिए कुंवारी कन्याएं भी व्रत रखती हैं। अविवाहित महिलाएं भगवान शिव, जिन्हें आदर्श पति के रूप में माना जाता है जैसे पति के लिए प्रार्थना करती हैं। ये व्रत स्त्री-पुरुष कोई भी कर सकता है। महाशिवरात्रि का व्रत अमोघ फल देने वाला माना गया है।महाशिवरात्रि का पर्व पूरे देश में भक्ति भाव और आस्था के साथ मनाया जाता है। भारत के अलावा नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान में भी इस दिन पूजा होती है। बांग्लादेश में सनातन धर्मावलम्बी भगवान शिव के दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करने की मंशा से व्रत रखते हैं। कई बांग्लादेशी हिंदू इस खास दिन चंद्रनाथ धाम (चिटगांव) जाते हैं। बांग्लादेशी हिंदुओं की मान्यता है कि इस दिन व्रत व पूजा करने वाले स्त्री-पुरुष को अच्छा पति या पत्नी मिलती है। नेपाल में पशुपति नाथ में महाशिवरात्रि पर भव्य कार्यक्रम होता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर काठमांडू के पशुपतिनाथ मन्दिर पर भक्तजनों की भीड़ लगती है। चूंकि, नेपाल की सीमा भारत से लगती है और दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, व्यापारिक और आर्थिक संबंध हैं इसलिए भारत से भी कई हिन्दु धर्मावलम्बी महाशिवरात्रि पर काठमांडू पहुंचते हैं।मध्यपदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि पर शिव भक्तों का हुजूम उमड़ता है, यहां दिन भर पूजा-अर्चना होती है। जेओनरा, सिवनी के मठ मंदिर में व जबलपुर के तिलवाड़ा घाट नामक दो अन्य स्थानों पर यह त्योहार बहुत धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। दमोह जिले के बांदकपुर धाम में भी इस दिन लाखों लोगों का जमावड़ा रहता है। कश्मीर में कश्मीरी ब्राह्मणों के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। यह शिव और पार्वती के विवाह के रूप में हर घर में मनाया जाता है। महाशिवरात्रि का उत्सव तीन दिन पहले से शुरू हो जाता है और महाशिवरात्रि के दो दिन बाद तक चलता रहता है। आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के सभी मंदिरों में महाशिवरात्रि उत्साहपूर्वक मनाई जाती है। – महाशिवरात्रि और शिवरात्रि –महाशिवरात्रि साल में एक बार आती है जबकि शिवरात्रि हर महीने या साल में 12 बार। ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन करोड़ो सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए थे। ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव होने से यह पर्व महाशिवरात्रि के रुप में मनाया जाता है। महाशिवरात्रि पर्व भगवान् शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है, भोलेनाथ के निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। इस दिन व्रत करने मात्र से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं। इस दिन शिव पूजा करने वालों को महादेव काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शांति प्रदान करते हैं। महादेव और माता पार्वती की शादी हुई थी इसलिए महाशिवरात्रि को रात्रि काल में भोलेनाथ की बारात निकाली जाती है। हिन्दु विद्वानों की मानें तो शिव पुराण के अनुसार चतुर्दशी तिथि शिवलिंग का प्राक्ट्य और विवाहोत्सव के रूप में जानी जाती है, इसलिए ये तिथि शिव की प्रिय है। यही कारण है कि हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन शिव पूजा करने वालों को वैवाहिक जीवन में सुख शांति और विवाह के लिए सुयोग्य जीवनसाथी पाने का वरदान मिलता है। – यहां है ज्योतिर्लिंग के साथ शक्तिपीठ –यूं तो देश के किसी राज्य में ज्योतिर्लिंग हैं या फिर शक्तिपीठ। इसके अलावा तीर्थ और धाम भी हैं। लेकिन देश में दो शहर ऐसे हैं जहां ज्योतिर्लिंग हैं और साथ ही शक्तिपीठ भी। मान्यता है कि जिन 51 स्थानों पर सती के अंग गिरे थे, वो स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजे गए। इन शक्तिपीठों में से दो ऐसे शक्तिपीठ हैं, जहां शिव के साथ ही शक्ति या शक्ति के साथ शिव के दर्शन का भी सौभाग्य प्राप्त होता है। ये दोनों ही भारत की प्राचीन नगरी यानि काशी और उज्जैन में स्थित है। वाराणसी को बाबा विश्वनाथ की नगरी के नाम से जाना जाता है लेकिन इस पावन नगरी में शक्ति के पावन पीठ हैं। इनमें सबसे प्रमुख है मां विशालाक्षी का मंदिर, जो कि 51 शक्तिपीठों में से एक है। वाराणसी में स्थित इस मंदिर को दक्षिण वाली माता के नाम से जाना जाता है। मंदिर की बनावट से दक्षिण भारतीय कलाकृति देखने को मिलती है इसलिए इसे दक्षिण वाली माता का मंदिर भी कहा जाता है। मान्यता है कि वाराणसी में जहां पर माता का मंदिर है, वहां पर कभी भगवती सती का कर्णकुंडल गिरा था। काशी स्थित इस शक्तिपीठ में माता विशालाक्षी की दो प्रतिमाओं के दर्शन करने को मिलते हैं, जिनमें से एक चल और दूसरी अचल मानी जाती है। यहां पर दोनों ही प्रतिमाओं का समान रूप से पूजा अभिषेक आदि होता है। माता का यह मंदिर काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के पास ही मीरघाट मोहल्ले में स्थित है। मध्यप्रदेश की उज्जैयनी को लोग महाकाल की नगरी के नाम से जानते हैं, वहां पर द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक महाकालेश्वर भगवान के साथ हरसिद्धि माता के शक्तिपीठ के दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। उज्जैन स्थित माता के इस शक्तिपीठ के बारे में मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवती सती की दाहिनी कोहनी गिरी थी। माता का यह पावन शक्तिपीठ महाकालेश्वर मंदिर के पास ही रुद्रसागर तालाब के पश्चिमी तट पर स्थित है। हरसिद्धि देवी के मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें देवी का कोई विग्रह नहीं है, बल्कि सिर्फ कोहनी ही है, जिसे हरिसिद्धि देवी के रूप में पूजा जाता है। इस धाम में दो बड़े दीप-स्तंभ हैं, जिसे नर-नारी का प्रतीक माना जाता है। इसमें दाहिनी ओर का स्तंभ बड़ा है, जबकि बांई ओर का छोटा है इसे लोग शिव-शक्ति का प्रतीक भी मानते हैं। मान्यता है कि इस दीप स्तंभ पर दीप जलाने से मान्यता पूरी हो जाती है। – ये हैं 12 ज्योतिर्लिंग –बारह ज्योतिर्लिंग (प्रकाश के लिंग) जो भगवान शिव के पवित्र धार्मिक स्थल और केन्द्र हैं। वे स्वयम्भू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है स्वयं उत्पन्न। बारह स्थानों पर बारह ज्योर्तिलिंग स्थापित हैं। 1. सोमनाथ- यह शिवलिंग गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित है।2. श्री शैल मल्लिकार्जुन- मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित है श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग।3. महाकाल- उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, जहाँ शिवजी ने दैत्यों का नाश किया था।4. ओमकारेश्वर- मध्यप्रदेश के धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर वरदान देने हुए यहां प्रकट हुए थे शिवजी। जहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हो गया।5. नागेश्वर- गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग।6. बैजनाथ- झारखंड के देवघर में बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग।7. भीमाशंकर- महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग।8. र्त्यंम्बकेश्वर- नासिक (महाराष्ट्र) से 25 किलोमीटर दूर र्त्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग।9. घृष्णेश्वर- महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गाँव में स्थापित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग।10. केदारनाथ- हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग। हरिद्वार से 150 पर मिल दूरी पर स्थित है।11. काशी- विश्वनाथ बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग।12. रामेश्वरम- त्रिचनापल्ली (मद्रास) समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग। — ये हैं 51 शक्तिपीठ —ये देश भर में स्थित देवी के वो मंदिर है जहाँ देवी के शरीर के अंग या आभूषण गिरे थे। सबसे ज्यादा शक्ति पीठ बंगाल में है।—बंगाल के शक्तिपीठ—-1. काली मंदिर- कोलकाता2. युगाद्या- वर्धमान (बर्दमान)3. त्रिस्त्रोता- जलपाइगुड़ी4. बहुला- केतुग्राम5. वक्त्रेश्वर- दुब्राजपुरके6. नलहटी- नलहटी7. नन्दीपुर- नन्दीपुर8. अट्टहास- लाबपुर9. किरीट- बड़नगर10. विभाष- मिदनापुर—मध्यप्रदेश के शक्तिपीठ—-12. हरसिद्धि- उज्जैन13. शारदा मंदिर- मैहर14. ताराचंडी मंदिर- अमरकंटक—तमिलनाडु के शक्तिपीठ——15. शुचि- कन्याकुमारी16. रत्नावली- अज्ञात17. भद्रकाली मंदिर- संगमस्थल18. कामाक्षीदेवी- शिवकांची—बिहार के शक्तिपीठ——19. मिथिला- अज्ञात20. वैद्यनाथ- बी. देवघर21. पटनेश्वरी देवी- पटना—-उत्तरप्रदेश के शक्तिपीठ——-22. चामुण्डा माता- मथुरा23. विशालाक्षी- मीरघाट24. ललितादेवी मंदिर- प्रयाग—राजस्थान के शक्तिपीठ—-25. सावित्रीदेवी- पुष्कर26. वैराट- जयपुर—गुजरात के शक्तिपीठ—–27. अम्बिक देवी मंदिर- गिरनार11. भैरव पर्वत- गिरनार—आंध्रप्रदेश के शक्तिपीठ—–28. गोदावरीतट- गोदावरी स्टेशन29. भ्रमराम्बादेवी- श्रीशैल—महाराष्ट्र के शक्तिपीठ———30. करवीर- कोल्हापुर31. भद्रकाली- नासिक—कश्मीर के शक्तिपीठ—-32. श्रीपर्वत- लद्दाख33. पार्वतीपीठ- अमरनाथ गुफा—पंजाब के शक्तिपीठ——34. विश्वमुखी मंदिर- जालंधर—उड़ीसा के शक्तिपीठ——-35. विरजादेवी- जाजपुर—हिमाचल प्रदेश के शक्तिपीठ——36. ज्वालामुखी शक्तिपीठ- कांगड़ा—असम के शक्तिपीठ——-37. कामाख्यादेवी- गुवाहाटी—मेघालय के शक्तिपीठ38. जयंती- शिलांग—-त्रिपुरा के शक्तिपीठ—–39. राजराजेश्वरी त्रिपुरासुंदरी- राधाकिशोरपुर—-हरियाणा के शक्तिपीठ—–40. कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ- कुरुक्षेत्र41. कालमाधव शक्तिपीठ- अज्ञात—-नेपाल के शक्तिपीठ——42. गण्डकी- गण्डकी43. भगवती गुहेश्वरी- पशुपतिनाथ—-पाकिस्तान के शक्तिपीठ——44. हिंगलाजदेवी- हिंगलाज—-श्रीलंका के शक्तिपीठ——45. लंका शक्तिपीठ- अज्ञात—-तिब्बत के शक्तिपीठ—–46. मानस शक्तिपीठ- मानसरोवर—–बांगलादेश के शक्तिपीठ—–47. यशोर- जैशौर48. भवानी मंदिर- चटगांव49. करतोयातट- भवानीपुर50. उग्रतारा देवी- बारीसाल51 वीं पंचसागर शक्तिपीठ है। ———– सप्तपुरी —————-सनातन धर्म सात नगरों को बहुत पवित्र मानता है जिन्हें सप्तपुरी कहा जाता है।1. अयोध्या, 2. मथुरा, 3. हरिद्वार, 4. काशी, 5. कांची, 6. उज्जैन 7. द्वारका———– चारधाम —————-चारधाम की स्थापना आद्य शंकराचार्य ने की थी। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चार दिशाओं में ये धाम स्थित हैं।1. बदरीनाथ धाम- उत्तर दिशा में हिमालय पर अलकनंदा नदी के पासप्रतिमा– विष्णु की शालिग्राम शिला से बनी चतुर्भुज मूर्ति। इसके आसपास बाईं ओर उद्धवजी तथा दाईं ओर कुबेर की प्रतिमा है।2. द्वारका धाम- पश्चिम दिशा में गुजरात के जामनगर के पास समुद्र तट पर।प्रतिमा– भगवान श्रीकृष्ण।3. रामेश्वरम- दक्षिण दिशा में तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में समुद्र के बीच रामेश्वर द्वीप।प्रतिमा– शिवलिंग4. जगन्नाथपुरी-पूर्व दिशा में उड़ीसा राज्य के पुरी में।प्रतिमा- विष्णु की नीलमाधव प्रतिमा जो जगन्नाथ कहलाती है। सुभद्रा और बलभद्र की प्रतिमाएं भी हैं। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन इंदौर क्राइम ब्रांच ने सोशल मीडिया के माध्यम से डर फैलाने वाले आरोपी को गिरफ्तार किया। पुलिस ने 5 लाख रुपए की लूट का किया खुलासा.
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