मुस्ताअली बोहरा अधिवक्ता एवं लेखक
भोपाल, मप्र

संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्या सागर महाराज का नाम लेते ही सिर श्रद्धा से झुक जाता है। एक ऐसे संत जिनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी, ऐसा संत जिनके दर्शन को मन ना भर पाए, ऐसा संत जो भी उनके सानिध्य में आया वो निहाल हो गया, जिनके आचरण में करूणा रहती थी। विलक्षण संत, कन्नड भाषी, महाकवि, लेखक, आध्यात्म वेत्ता, साधक, आदर्श योगी, चिंतक, दार्शनिक, काव्य शिल्पी, परमउपकारी, आत्म तपस्वी दिगंबर मुनि, आचार्य विद्या सागर महाराज का पूरा जीवन लोगों के कल्याण में गुजरा। आपने न सिर्फ जिन शासन को मजबूत किया बल्कि भारतीय संस्कृति को भी प्रश्रय दिया। हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, प्राकृत, संस्कृत, कन्नड, बांग्ला आदि 8 भाषाओं के ज्ञाता दिगम्बर जैन आचार्य विद्या सागर महाराज को उनकी विद्वत्ता, ज्ञान, परोपकार और तप के लिए जाना जाता है। हाल ही में आचार्य विद्यासागर महाराज को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में उन्हें ब्रह्मांड के देवता के रूप में सम्मानित किया गया था। पूरे बुंदेलखंड में आचार्य विद्यासागर महराज छोटे बाबा के नाम से जाने जाते रहे हैं। आपने मध्य प्रदेश के दमोह जिले में स्थित कुंडलपुर में बड़े बाबा आदिनाथ भगवान की मूर्ति को मंदिर में रखवाया था और कुंडलपुर में अक्षरधआम की तर्ज पर भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। आचार्यश्री आज भले ही सशरीर हमारे बीच ना हो लेकिन गुरू, संत, लेखक के रूप में उनकी सूक्ष्म मौजूदगी हमेशा रहेगी और समाज को मार्गदर्शन देती रहेगी।  
   आपका जन्म 10 अक्टूबर 1946 को विद्याधर के रूप में कर्नाटक के बेलगाँव जिले के सदलगा में शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनके पिता श्री मल्लप्पा थे जो बाद में मुनि मल्लिसागर बने। उनकी माता श्रीमंती थी जो बाद में आर्यिका समयमति बनी। उनके माता-पिता ने भी उनसे ही दिक्षा लेकर समाधि प्राप्त की थी। विद्यासागर जी को 30 जून 1968 में अजमेर में 22 वर्ष की आयु में आचार्य ज्ञानसागर ने दीक्षा दी जो आचार्य शांतिसागर के वंश के थे। आचार्य विद्यासागर को 22 नवम्बर 1972 में ज्ञानसागर जी द्वारा आचार्य पद दिया गया था। आपके तीन भाईयों में से दो भाई अनंतनाथ और शांतिनाथ ने आचार्य विद्यासागर से दीक्षा ग्रहण की और मुनि योगसागर और मुनि समयसागर कहलाए। उनके बङे भाई भी उनसे दीक्षा लेकर मुनि उत्कृष्ट सागर जी महाराज कहलाए। आचार्य विद्यासागर महाराज की बहने स्वर्णा और सुवर्णा ने भी उनसे ही ब्रह्मचर्य लिया था।
  माता-पिता की द्वितीय सन्तान बालक विद्याधर की प्रतिभा को देख पिताजी ने कन्नड़ भाषा के विद्यालय में पढ़ाया। आचार्यश्री के घर का नाम पीलू थ। 9 वर्ष की उम्र में जैनाचार्य शान्तिसागर जी के कथात्मक प्रवचनों से वैराग्य का बीजारोपण हुआ और धर्म-अध्यात्म में रुचि बढ़ती गई। 20 वर्ष की उम्र में घर-परिवार का परित्याग कर अहिंसा, जीव प्रेम, मानव कल्याण के लिए निकल पड़े। राजस्थान प्रान्त के अजमेर जिले के उपनगर मदनगंज-किशनगढ़ में सन् 1967 मई-जून माह में नियति ने विद्याधर अष्टगे को मिला दिया ज्ञानमूर्ति चारित्र विभूषण महाकवि ज्ञानसागर जी महामुनिराज से। गुरुभक्ति-समर्पण से गुरुकृपा का प्रसाद पाकर 30 जून 1968 को अजमेर में सर्व पराधीनता को छोड़ दिगम्बर मुनि बनकर तपस्यारत हो गए। वे भक्तों के द्वारा दिन में एक बार दिया गया बिना नमक-मीठे के, बिना हरी वस्तु के, बिना फल मेवे के सात्विक आहार दान ही लेते रहे वो भी मात्र ज्ञानध्यान-तप-आराधना के उद्देश्य से। आचार्य विद्यासागर जी धन संचय करने के खिलाफ थे। उन्होंने दान-दक्षिणा में भी कभी किसी से पैसे नहीं लिए। उन्होंने ना ही कोई बैंक अकाउंट खुलवाया और ना ही कोई ट्रस्ट भी नहीं बनाया। लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि आचार्य ने पैसे को कभी हाथ भी नहीं लगाया। उनके नाम पर यदि कोई दान देता भी था तो उसे वे समाज सेवा के लिए दे देते थे। आचार्य श्री भीषण सर्दी-गर्मी में कपड़ा, कंबल, चटाई, रजाई, पंखा, कूलर, हीटर और एसी आदि का उपयोग नहीं करते थे। लकड़ी के पाटे पर ही बैठकर सुबह से शाम हो जाती थी। वे आहार में केवल दाल, रोटी, चावल और पानी लेते थ। छह रसों में केवल घी ग्रहण करते थे। उन्होंने आजीवन नमक, चीनी, फल, हरी सब्जियाँ, दूध, दही, सूखे मेव, अंग्रेजी दवाई, तेल, चटाई का त्याग किया। वे हर मौसम में बिना चादर, गद्दे, तकिए के शख्त तख्त पर सिर्फ एक करवट में शयन करते थे। वे महज तीन से चार घंटे की अल्प निद्रा लेते थे। शेष समय ध्यान में लीन रहते थे।  
  आचार्य विद्यासागर कई धार्मिक कार्यों में प्रेरणास्रोत रहे हैं। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, गुजरात आदि प्रदेशों की लगभग 50 हजार किलोमीटर की पदयात्रा कर लोक कल्याण के कार्य किया और प्रेरणा दी। आपने भारतीय शिक्षा पद्धति लागू करने, चिकित्सा को सेवाभाव बनाने, स्वरोजगार को बढ़ावा देने, खेती से युवाओं को जोड़ने, कर्ज से दूर रहने, हथकरघा से जुड़ने गौशालाओं को पुर्नजीवित करने, माँस निर्यात पर रोक लगाने और भारतीय प्रतिभाओं के पलायन पर रोक लगाए जाने की दिशा में काम किया। आपकी प्रेरणा से देश के पाँच राज्यों में 72 गौशालाएँ संचालित हुई जिनमें अल्पावधि एक लाख से अधिक गौवंश को कत्लखानों में कटने से बचाया गया। इसी तरह सागर (म.प्र.) में भाग्योदय तीर्थ धर्मार्थ चिकित्सालय की स्थापना हुई। पिसनहारी मढ़ियाजी जबलपुर एवं दिल्ली में ‘प्रशासनिक प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना हुई। आचार्य श्री जी की प्रेरणा एवं आशीर्वाद सेतीन आदर्श विद्यालय स्थापित किए गए-प्रतिभा स्थली, जबलपुर (म.प्र.), डोंगरगढ़ (छ.ग.), रामटेक (महाराष्ट्र)। इसके अतिरिक्त जगह-जगह छात्रावास स्थापित किए गए। आचार्य श्री जी की सुप्रेरणा से जबलपुर (म.प्र.) में लघु उद्योग पूरी मैत्री संचालित किया गया। आचार्य श्री ने हथकरघा की प्रेरणा दी जिससे समाज ने महाकवि पं. भूरामल समाजिक सहकार न्यास हथकरघा प्रशिक्षण केन्द्र की शाखाएँ अशोकनगर, भोपाल और आचार्य ज्ञानविद्या लोक कल्याण हथकरघा केन्द्र मुंगावली के अन्तर्गतः मुंगावली, गुना, आरोन आदि स्थानों पर हथकरघा शाखाएँ खोली गई। आचार्यश्री जी ने प्राचीन मन्दिरों की पाषाण निर्मित शैली को ही अपनाने की बात कही। आचार्य भगवन् के ऐतिहासिक सांस्कृतिक चिंतन से प्रभावित होकर उनकी प्रेरणा से अनेक स्थानों की समाजों ने पाषाण से जिनालयों के निर्माण हेतु आचार्यश्री जी के ही पावन सान्निध्य में शिलान्यास किए। इनमें गोपालगंज, जिला-सागर (म.प्र.), .सिलवानी, जिला-रायसेन (म.प्र.), टड़ा, जिला-सागर (म.प्र.) नवनिर्मित सर्वोदय तीर्थक्षेत्र, अमरकंटक (म.प्र.), नेमावर, जिला देवास (म.प्र.), हबीबगंज, भोपाल (म.प्र.), तेंदूखेड़ा,जिला-दमोह (म.प्र.), देवरी कलौं, जिला-सागर (म.प्र.), रामटेक, जिला-नागपुर (महा.), इतवारी,नागपुर (महा.), .विदिशा (म.प्र.), नक्षत्र नगर, जबलपुर (म.प्र.), डिंडोरी (म.प्र.) इनमें प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त कई नए तीर्थों की परिकल्पना को आचार्यश्री जी ने मूर्तस्वरूप प्रदान करने हेतु प्रेरणा एवं आशीर्वाद प्रदान किया। फलस्वरूप नए तीर्थों का जन्म हुआ। इनमें सर्वोदय तीर्थ, अमरकंटक, जिला-शहडोल (म.प्र.), भाग्योदय तीर्थ, सागर (म.प्र.), दयोदय तीर्थ, जबलपुर (म.प्र.), सिद्धक्षेत्र सिद्धोदय, नेमावर, जिला-देवास (म.प्र.), अतिशय क्षेत्रचन्द्रगिरि, डोगरगढ़ (छ.ग.) शामिल हैं। आचार्य भगवन् ने जिन तीर्थों पर चातुर्मास, ग्रीष्मकालीन या शीतकालीन प्रवास किया। वहाँ पर जीर्णशीर्ण मन्दिरों का जीणों द्वार कराया। अतिशय तीर्थक्षेत्र कोनी जी, जिला-जबलपुर (म.प्र.), सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर,जिला-दमोह (म.प्र.), अतिशय तीर्थक्षेत्र बीना जी बारहा, सागर (म.प्र.), अतिशय तीर्थक्षेत्र पटनागंज, रहली, सागर (म.प्र.) आदि इनमें शामिल हैं।
शिष्य गण- आचार्य श्री द्वारा 130 मुनिराजो, 172 आर्यिकाओं व 53 ऐलक जी, 64 क्षुल्लकगणों, 3 क्षुल्लिकाओं को दीक्षित किया। मुनिश्री समयसागर जी,मुनिश्री योगसागर जी, मुनिश्री नियमसागर जी,मुनिश्री सुधासागर जी, मुनिश्री प्रमाणसागर जी, मुनिश्री चिन्मयसागर जी,मुनिश्री अभयसागर जी, मुनि क्षमासागर जी,मुनि प्रणम्यसागर जी आदि प्रसिध्द संत है। डेढ़ दर्जन से ज्यादा दिगम्बर साधु आचार्य विद्यासागर के आज्ञा से चर्या करते हैं। एक हजार से अधिक ब्रह्मचारी एवं ब्रह्मचारिणी बहिनें साधनारत हैं। आपश्री के नियपिकाचार्यत्व में 30 से अधिक साधकों ने जीवन की संध्या बेला में आगमयुक्त विधि से सल्लेखनापूर्वक समाधि धारण कर जीवन के उद्देश्य को सार्थक किया है।
साहित्य सर्जन – आपने संस्कृत, हिन्दी के अतिरिक्त कन्नड़, बंगला, अंग्रेजी, प्राकृत भाषा में भी काव्य रचनाओं का सर्जन किया है। साथ ही आचार्य शान्तिसागर जी, आचार्यजी की परिचयात्मक स्तुतियों की रचना एवं संस्कृत, हिन्दी में शारदा स्तुति की रचना की है। मूकमाटी महाकाव्य के दो अंग्रेजी रूपान्तरण, दो मराठी रूपान्तरण, एक कन्नड़, एक बंगला, एक गुजराती रूपान्तरण हो चुका है एवं उर्दू व जापानी भाषा में अनुवाद का कार्य चल रहा है। विभिन्न शोधार्थियों ने उनके कार्य का मास्टर्स और डॉक्ट्रेट के लिए अध्ययन किया है। प्राकृत महाकाव्य पर अनेकों स्वतन्त्र आलोचनात्मक ग्रन्थों के अतिरिक्त 4 डी.लिट्, 22 पी.एच. डी., 7 एम.फिल के शोध प्रबन्ध तथा 2 एम. एड. और 6 एम.ए. के लघु शोध प्रबन्ध लिखे जा चुके हैं। आपने नीति-धर्म-दर्शन-अध्यात्म विषयों पर संस्कृत भाषा में 7 शतकों और हिन्दी भाषा में 12 शतकों का सर्जन किया है। आपके शताधिक अमृत प्रवचनों के 50 संग्रह ग्रन्थ भी उपलब्ध हैं एवं त्रिसहस्राधिक प्रवचनावली अप्रकाशित हैं। आपने जापानी छन्द की छायानुसार सहस्राधिक हाईकू (क्षणिकाओं) का सर्जन कर साहित्य क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उन्होंने काव्य मूक माटी की भी रचना की है। विभिन्न संस्थानों में यह स्नातकोत्तर के हिन्दी पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है। आपने प्राचीन जैनाचायों के 25 प्राकृत-संस्कृत ग्रन्थों का हिन्दी भाषा में पद्यानुवाद कर पाठक को सरसता प्रदान की। आचार्य विद्यासागर के शिष्य मुनि क्षमासागर ने उन पर आत्मान्वेषी नामक जीवनी लिखी है। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित हो चुका है। मुनि प्रणम्यसागर ने उनके जीवन पर अनासक्त महायोगी नामक काव्य की रचना की है।  
संस्कृत रचनाएं-शारदा स्तुति, श्रमण शतकम्, निरंजन शतकम्, भावना शतकम्, परीषहजय शतकम्, सुनीति शतकम्, चेतन चन्द्रोदय शतकम्, सूर्योदय शतकम्, धीवरोदय शतकम्, सर्वोदय शतकम्, पूर्णोदय शतकम्, जिनस्तुति शतकम्, चंपू काव्य (अप्रकाशित)
हिन्दी काव्य- मूक माटी महाकाव्य, नर्मदा का नरम कंकर, डूबो मत लगाओ डुबकी, तोता क्यों रोता?,चेतना के गहराव में। अनेक हाईको कविताएं (अप्रकाशित हैं)
स्तुति सरोज- आचार्य शान्तिसागर स्तुति, आचार्य वीरसागर स्तुति, आचार्य शिवसागर स्तुति, आचार्य ज्ञानसागर स्तुति, अध्यात्म भक्तिगीत (7 भक्तिगीत )
हिन्दी शतक – निजानुभव शतक, मुक्तक शतक, श्रमण शतक, निरंजन शतक, भावना शतक, परीषहजय शतक, सुनीति शतक, दोहादोहन शतक, सूर्योदय शतक, पूर्णादय शतक, सर्वोदय शतक, जिनस्तुति शतक
अनुवादित ग्रन्थ – कुन्दकुन्द का कुन्दन (समयसार), निजामृतपान (समयसार कलश), अष्ट पाहुड़, नियमसार, बारस अणुवेक्खा, पंचास्तिकाय, इष्टोपदेश (बसंततिलका), प्रवचनसार, समाधिसुधा शतक (समाधि शतक), एकीभाव स्तोत्र, नव भक्तियाँ (आचार्य पूज्यपाद कृत), समन्तभद्र की भद्रता (स्वयंभू स्तोत्र), रयणमंजूषा (रत्नकरण्डक श्रावकाचार), आप्तमीमांसा (देवागम स्तोत्र), द्रव्य संग्रह (बसंततिलका छंद), गोमटेश अष्टक, योगसार, आप्त परीक्षा, जैन गीता (समणीसुतं),कल्याण मंदिर स्तोत्र, जिनेन्द्र स्तुति (पात्रकेसरी स्तोत्र), गुणोदय (आत्मानुशासन), स्वरूप संबोधन, इष्टोपदेश (ज्ञानोदय), द्रव्यसंग्रह (बसंततिलका एवं ज्ञानोदय )
प्रवचन साहित्य- प्रवचन पर्व, प्रवचन पीयूष, प्रवचनामृत, प्रवचन पारिजात, प्रवचन पंचामृत, प्रवचन प्रदीप, प्रवचन प्रमेय, प्रवचनिका, प्रवचन सुरभि, तेरह सौ एक, धीवर की धी, सर्वोदय सार, सीप के मोती, विद्या वाणी, अकिंचित्कर, चरण आचरण की ओर, कर विवेक से काम, धर्म देशना, कुण्डलपुर देशना, तपोवन देशना, आदशो के आदर्श, सिद्धोदय सार, कौन कहाँ तक साथ देगा, समागम, गुरुवाणी, व्यामोह की पराकाष्ठा, भक्त का उत्सर्ग, आत्मानुभूति ही समयसार, मूर्त से अमूर्त की ओर, स्वराज और भारत, .अहिंसा सूत्र, मेरे सपनों का भारत, भारत की भाषा राष्ट्र भाषा हो, जैन दर्शन का हृदय, जयन्ती से परे, सत्य की छाँव में, ब्रह्मचर्य चेतन का भोग, भोग से योग की ओर, आदर्श कौन.?, मर हम…. मरहम बनें, मानसिक सफलता, न धमों धार्मिकैर्विना, डबडबाती आँखें। इस प्रकार 50 अधिक कृतियाँ हैं।
ग्रन्थ प्रवचन – समयोपदेश भाग 1-2, गुरुवयणं, दिव्योपदेश, इष्टोपदेश, पंचास्तिकायोपदेश, श्रुताराधना भाग 1-2-3 और भी बहुत सी कृतियाँ हैं।  
   
पूर्व नाम- श्री विद्याधर जी जैन अष्टगे
पिता का नाम- श्री मल्लप्पा जी जैन अष्टगे
माता का नाम- श्रीमती श्रीमंती जी जैन अष्टगे
जन्म- 10 अक्टूबर, 1946, आश्विन शुक्ल- 15 वि.सं.- 2003 (शरद पूर्णिमा) सदलगा, चिक्कोड़ी, जिला-बेलगाँव (कर्नाटक)
लौकिक शिक्षा- नवमीं
ब्रह्मचर्यव्रत- 1966 में आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज से
मुनि दीक्षा- 30 जून, 1968, आषाढ़ शुक्ल-पंचमी वि.सं.- 2025, अजमेर (राजस्थान)
दीक्षा गुरू- मुनि श्री ज्ञानसागर जी महाराज
आचार्य पद- 22 नवम्बर 1972, बुधवार, मार्गशीर्ष कृष्ण- 2, वि.सं. 2029 नसीराबाद, जिला-अजमेर  (राज.)
मातृभाषा- कन्नड़
समाधि-छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरी तीर्थ में संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज का 18 फरवरी 2024 को सल्लेखना व्रत द्वारा समतापूर्वक समाधिमरण हुआ।

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