उत्तर प्रदेश के मऊ में हैरान करने वाला मामला, हत्या के मुकदमे से बचने के लिए आरोपी ने रची फर्जी मौत की कहानी, डेढ़ साल तक पुलिस को देता रहा चकमा मऊ, उत्तर प्रदेश। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दुरुपयोग का एक चौंकाने वाला मामला उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से सामने आया है। यहां वर्ष 2016 के एक हत्याकांड में आरोपी व्यक्ति ने कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए अपनी ही मौत की साजिश रच डाली। पुलिस के अनुसार, आरोपी ने एआई तकनीक की मदद से चिता पर लेटे अपने शव की फर्जी तस्वीर तैयार कराई। इतना ही नहीं, खुद की मौत को वास्तविक दिखाने के लिए कथित तौर पर बकरे का अंतिम संस्कार करवा दिया और मृत्यु से संबंधित दस्तावेज भी तैयार करा लिए। इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ, जब पुलिस की एसओजी और सर्विलांस टीम ने जांच के दौरान आरोपी के जीवित होने के सुराग जुटाए। इसके बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया। हत्या के मामले में आरोपी था राजू उर्फ राजकुमार राजभर पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपी की पहचान राजू उर्फ राजकुमार राजभर के रूप में हुई है। वह वर्ष 2016 में हुए योगेश सिंह हत्याकांड का आरोपी है। बताया जा रहा है कि हत्या के मामले में संभावित सजा और कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए उसने खुद को मृत साबित करने की योजना बनाई। आरोपी ने अपनी मौत की कहानी को विश्वसनीय बनाने के लिए आधुनिक तकनीक और कथित फर्जी सरकारी दस्तावेजों का सहारा लिया। AI से तैयार कराई चिता पर लेटे शव की तस्वीर पुलिस के अनुसार, आरोपी ने एआई की मदद से ऐसी तस्वीर तैयार कराई, जिसमें वह मृत अवस्था में चिता पर लेटा हुआ दिखाई दे रहा था। इस तस्वीर का इस्तेमाल अपनी मृत्यु का दावा मजबूत करने के लिए किया गया। आरोप है कि साजिश को वास्तविक रूप देने के लिए मानव शव के स्थान पर बकरे का अंतिम संस्कार कराया गया, ताकि लोगों को उसकी मौत का विश्वास दिलाया जा सके। मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाकर अदालत में पेश किए दस्तावेज मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि राजू ने अपनी कथित मौत से जुड़े दस्तावेज और मृत्यु प्रमाण पत्र भी बनवा लिए। इन दस्तावेजों को अदालत में प्रस्तुत कर यह साबित करने का प्रयास किया गया कि हत्या के मुकदमे का आरोपी अब जीवित नहीं है। इस तरह उसने कानूनी प्रक्रिया से बचने की कोशिश की। पुलिस के मुताबिक, आरोपी लगभग डेढ़ वर्ष तक फरार रहने में सफल रहा। एसओजी और सर्विलांस टीम ने खोली साजिश की परतें मऊ पुलिस की एसओजी और सर्विलांस टीम ने तकनीकी जांच और सुरागों के आधार पर मामले की पड़ताल की। जांच में आरोपी के जीवित होने की जानकारी सामने आई। इसके बाद पुलिस ने उसकी तलाश कर उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार कराने के संबंध में एक अन्य मामला भी दर्ज किया है। AI के दुरुपयोग और सरकारी दस्तावेजों की सत्यता पर सवाल इस घटना ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दुरुपयोग के साथ-साथ मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने और सरकारी दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला यह भी दर्शाता है कि एआई से तैयार तस्वीरों को बिना स्वतंत्र सत्यापन के वास्तविक प्रमाण मानना कितना जोखिमपूर्ण हो सकता है। 19 दिसंबर 2016 को हुई थी योगेश सिंह की हत्या मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 19 दिसंबर 2016 को मऊ के मुंशीपुरा रेलवे लाइन के पास योगेश सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मृतक के भतीजे अविनाश सिंह की शिकायत पर राजकुमार राजभर और उसके साथी सुदर्शन राजभर के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया था। मामले की सुनवाई अदालत में चल रही थी। शेयर बाजार में निवेश के नाम पर रुपये लेने का भी आरोप अपर पुलिस अधीक्षक अनूप कुमार के मुताबिक, राजकुमार शेयर बाजार में ट्रेडिंग करता था। उसने विभिन्न शहरों के लोगों से निवेश के नाम पर रुपये लिए थे। पुलिस का कहना है कि हत्या के मुकदमे से बचने के साथ-साथ निवेशकों के रुपये लौटाने से बचना भी उसकी कथित साजिश का उद्देश्य था। पत्नी ने कर दी तेरहवीं, बीमा राशि की भी जांच कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि आरोपी की कथित मौत के बाद परिवार ने तेरहवीं भी कर दी थी। उसकी पत्नी को करीब 10 लाख रुपये का बीमा भुगतान मिलने की बात भी सामने आई है। हालांकि, पुलिस इस भुगतान और संबंधित दस्तावेजों की जांच कर रही है। दो होम्योपैथिक चिकित्सकों की संभावित भूमिका की भी जांच किए जाने की खबर है। इन पहलुओं में किसी अन्य व्यक्ति की संलिप्तता अभी स्थापित नहीं हुई है। 25 अक्टूबर को हुई गिरफ्तारी पुलिस के मुताबिक, रविवार 25 अक्टूबर 2026 को सुबह करीब 9:10 बजे कोतवाली नगर पुलिस ने एसओजी और सर्विलांस टीम की मदद से ख्वाजाजहांपुर क्षेत्र के पास राजकुमार को गिरफ्तार किया। आरोपी के खिलाफ फर्जी दस्तावेजों के मामले में भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत अलग प्रकरण दर्ज किया गया है। NEWS NATIONAL WORLD | विशेष रिपोर्ट यह मामला केवल फर्जी मौत की कहानी तक सीमित नहीं है, बल्कि एआई से तैयार तस्वीरों, मृत्यु प्रमाण पत्रों के सत्यापन और न्यायिक प्रक्रिया में डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े करता है। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन अल्ट्राटेक कम्पनी का कर्मचारी ही निकला चोरों का सरगना, चौकी नौबस्ता पुलिस ने बरामद किया अल्ट्राटेक कम्पनी से चोरी गया सामान