भोपाल- मुस्ताअली बोहरा (अधिवक्ता एवं लेखक)
 

भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर एक शख्सियत…. ऐसा किरदार जिनके जीवन, उपलिब्ध, समाज में योगदान को आसानी से समझना हो तो कुछ इस तरह से समझा जा सकता है कि, जिनके पूर्वज कभी उन्हें क्लास रूम में अपने साथ नहीं बिठाते थे, जिनके साथ कभी पानी का जग साझा नहीं करते थे वही आज उनकी मूर्तियां बना रहें हैं। जो उच्च समाज उन्हें अछूत कहकर अपमानित करता था वही आज उनकी मूर्तियों पर पुष्पांजलि अर्पित करने को उतावला रहता है। उत्तर प्रदेश के योगी सरकार ने तो घोषणा की है कि इस साल बाबा साहब की हर प्रतिमा पर छत्र बनाया जाएगा, जिस पार्क में बाबा साहब की प्रतिमा है उसका सौंदर्यीकरण किया जाएगा। पूरे प्रदेश में सामाजिक न्याय के कार्यक्रम होंगे। मध्यप्रदेश की मोहन सरकार ने भी घोषणा की है कि बाबा साहब की जयंती पर आधा सैकड़ा से ज्यादा कैदियों को समयपूर्व रिहा किया जाएगा। यानि, हर कोई बाबा साहब का खैरख्वाह बनने की होड़ में है। खैर, बाबा साहब ने हर वर्ग और तबके की भलाई के लिए काम किया है। खासकर अपने समाज को ऊंचा उठाने, दलित समाज के लोगों की शिक्षा, उनके सामाजिक और आर्थिक विकास, समाज में उनके सम्मान और बराबरी के हक के लिए ताउम्र संघर्ष करते रहे। बाबा साहेब दलितों में चेतना जगाने में तो सफल रहे। बाबा साहब दलितों के मन से हीन भावना को निकालने में कामयाब रहे लेकिन सवर्ण समाज के लोगों के मन से श्रेष्ठ या बेहतर होने की मानसिकता को खत्म नहीं कर सके। सवर्ण समाज ने उनके बराबरी के सिद्धांत को नहीं स्वीकारा। बाबा साहब ने दलित और शोषित समाज के लिए संविधान में भी कई चीजों को शामिल किया, वे ये चाहते थे कि कानून को सहीं तरीके से लागू किया जाए ताकि अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंच सके। इसी से पता चलता है कि बाबा साहब केवल अपने समाज या दलितों के लिए ही नहीं सोचते थे बल्कि सभी शोषित, मजलूम और कमजोर वर्ग के तबके के लिए उनकी चिंता थी। बाबा साहब ने तो सवर्ण महिलाओं के लिए भी चिंता जताई थी। ये भी विडम्बना ही है कि समाज का उच्च वर्ग बाबा साहब की नेक मंशा और उनके उसूलों को समझ नहीं पाया। इसके अलावा बाबा साहब ने जो अलख जगाई थी उसे दलित समाज का ही कोई अन्य नेता प्रज्वलित नहीं रख सका। समाज के अंदर की खेमेबाजी, राजनीतिक कूट चाल, भीतरी कलह, पदलोलुपता की वजह से दलित समाज को काशीराम के बाद कोई नेतृत्व नहीं मिल सका। कांशीराम ने खासी मेहनत की और वे कुछ हद तक कामयाब रहे। एक बड़े राजनीतिक मंच के तौर पर काशीराम ने राष्ट्रीय स्तर पर बहुजन समाज पार्टी को स्थापित किया। हालांकि, आरपीआई सहित लगभग सभी पार्टियाँ कुछ कामयाबी के बाद ही अपने रास्ते से भटक गईं और अपने मूल मकसद में कामयाब नहीं हो सकीं। एक खास बात और, दलित समाज में उंच-नींच का भेद पनपने लगा। इस समाज के जो लोग उच्च पदों पर आसीन हो गए उन्होंने अपने ही समाज के लोगों को आगे बढ़ाने की बजाए उनसे ही भेदभाव शुरू कर दिया। उच्च शिक्षित या आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग समाज के ही कमजोर लोगों को कमतर समझने लगे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि सिर्फ बाबा साहब को ही नहीं मानें बल्कि बाबा साहब की भी मानें। जय भीम का नारा लगाकर हम खुद को उनका अनुयायी तो बता सकते हैं लेकिन बाबा साहब का सपना तो तभी साकार होगा जब हम उनके बताए रास्ते पर चलेंगे, हम उनके आर्दशों को आत्मसात करेंगे, हम कमजोर-शोषित-पीड़ित और आर्थिक रूप से पिछड़े तबके इस इस तबके के लोगों का हाथ पकड़कर उसे सहारा देगें अन्यथा बाबा साहब की जयंती और महापरिनिर्वाण दिवस मनाकर ही इतिश्री हो जाएगी।


  डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को ब्रिटिश भारत के मध्य भारत प्रांत (अब मध्य प्रदेश) में स्थित महू नगर सैन्य छावनी में हुआ था। इनके बचपन का नाम भिवा था। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई मुरबादकर की 14 वीं और अंतिम संतान थे। डॉ. बाबा साहब अंबेडकर के पिता ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। बाबा साहेब का परिवार कबीर पंथ को मानने वाला मराठी मूल का था और वो वर्तमान महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में आंबडवे गाँव के निवासी थे।

भारत रत्न, बोधिसत्व, महान मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, संविधान शिल्पी, आधुनिक भारत की नींव रखने वाले, इतिहास के ज्ञाता, तत्वज्ञानी, मानव शास्त्र के ज्ञाता, कानूनविद, मानवाधिकार के संरक्षक, धर्म व दर्शन के विद्वान, पाली साहित्य के अध्ययनकर्ता, महान लेखक, समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ, संपादक, बौद्ध साहित्य के अध्ययनकर्ता, मजदूरों के मसीहा, इतिहासविद, प्रोफेसर, शिक्षाविद्, चिंतक, समाज सुधारक, पर्यावरणविद्, वक्ता, दार्शनिक, बहुभाषाविद्, संपादक, आजाद भारत के पहले कानून मंत्री बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डाॅ. भीमराव आंबेडकर जिन्हें पूरी दुनिया प्यार और सम्मान के साथ बाबा साहब के नाम से पुकारती है। बाबा साहब, लाखों लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत और राष्ट्रीय प्रतीक या रोल मॉडल बन गए। डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन साहस, संघर्ष और सामाजिक बदलाव की मिसाल है। भीवा से डाॅ भीमराव अंबेडकर बनने तक का सफर आसान नहीं था लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। जिस बच्चे को कभी स्कूल में कक्षा के भीतर बैठने तक नहीं दिया जाता था बाद में वही बच्चा देश का पहला कानून मंत्री बना।
डॉ अंबेडकर ने धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक सद्भाव में अहम भूमिका निभाई। समाज में समानता के माध्यम से समाज को एक मजबूत नेतृत्व दिया। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के माध्यम से समाज में धार्मिक विवादों और भेदभाव को दूर किया। सभी धर्मों के अधिकारों की समानता को लोगों तक पहुंचाया। बाबा साहब ने शिक्षा, आर्थिक विकास, और सामाजिक समानता को प्रोत्साहित किया। संविधान के माध्यम से उन्होंने दलितों और अन्य वंचित समुदायों के अधिकारों को सुनिश्चित किया। उनके कानूनी और सामाजिक सुधार जैसी नीतियों के कारण न्याय सुलभ हुआ और समाज में व्यापक परिवर्तन हुआ। उन्होंने समाज के शोषित और पीड़ित वर्ग के लिए आवाज उठाई। इसके लिए उन्होंने कई सामाजिक आंदोलन चलाए। आपने दलितों के लिए विशेष आरक्षण की मांग की और उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान की। उन्होंने हिन्दू संविधान के खिलाफ विरोध किया और दलितों को उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए प्रयास किया। बाबा साहब ने महाराष्ट्र के दलित समुदाय के लिए “महाद आंदोलन” किया, जिसमें उन्होंने दलितों के अधिकारों की मांग की और उन्हें समाज में समानता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। “दलितों का उद्धार” आंदोलन के माध्यम से बाबा साहब ने दलितों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए संघर्ष किया। दलितों के लिए अनेक संगठन और संस्थाएं स्थापित की ताकि इनके जरिए दलितों को सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समानता दिलाई जा सके। उन्होंने दलितों के लिए शिक्षा, आर्थिक सहायता, न्याय और उनके सामाजिक अधिकारों की रक्षा के लिए कई योजनाएं चलाईं।
डॉ अंबेडकर के राष्ट्र प्रेम का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वो भारत को विभाजित नहीं देखना चाहते थे। भारत को दो हिस्सों में बांटने की अंग्रेजों की साजिश से वे नाराज थे। इतना ही नहीं महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना की भी आलोचना की। पाकिस्तान के विभाजन को लेकर ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ के नाम से किताब भी लिखी थी। बाबा साहब का नजरिया दूरंदेशी था। वे समग्र विकास को तरजीह देते थे। उन्होंने ही  औद्योगीकरण और कृषि निवेश की वकालत की। अल्प आय वर्ग के लिए आयकर का विरोध किया और भूमि सुधारों का समर्थन किया। उन्होंने महिलाओं के आर्थिक अधिकारों की की भी वकालत की।   
  बाबा साहब का मानना था कि धर्म मनुष्य के लिए है। अम्बेडकर ने कहा कि ऐसे धर्म का कोई मतलब नहीं जिसमें मनुष्यता का कुछ भी मूल्य नहीं। अम्बेडकर जी ऐसे धर्म को चुनना चाहते थे जिसका केन्द्र मनुष्य और नैतिकता हो, उसमें स्वतंत्रता, समता तथा बंधुत्व हो। भीमराव आंबेडकर ने 13 अक्टूबर 1935 को नासिक के निकट येवला में एक सम्मेलन में धर्म परिवर्तन करने की घोषणा की। उन्होंने कहा था, हालांकि मैं एक अछूत हिन्दू के रूप में पैदा हुआ हूं, लेकिन मैं एक हिन्दू के रूप में हरगिज नहीं मरूंगा। इसके साथ ही उन्होंने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़कर कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने धर्म परिवर्तन की घोषणा करने के बाद 21 साल तक विश्व के सभी प्रमुख धर्मों का गहन अध्ययन किया। अम्बेडकर बौद्ध धर्म को पसन्द करते थे क्योंकि उसमें तीन सिद्धांतों का समन्वित रूप मिलता है जो किसी अन्य धर्म में नहीं मिलता। बौद्ध धर्म प्रज्ञा (अंधविश्वास तथा अति प्रकृतिवाद के स्थान पर बुद्धि का प्रयोग), करुणा (प्रेम) और समता (समानता) की शिक्षा देता है। उनका कहना था कि मनुष्य इन्हीं बातों को शुभ तथा आनंदित जीवन के लिए चाहता है। सन् 1950 में भीमराव अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका (तब सिलोन) गये। स्वदेश वापसी पर डॉ. अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे। सन 1954 में अम्बेडकर ने म्यांमार का दो बार दौरा किया। दूसरी बार वो रंगून में तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होंने भारतीय बौद्ध महासभा यानी बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम प्रसिद्ध ग्रंथ, द बुद्ध एंड हिज धम्म को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात सन 1957 में प्रकाशित हुआ। इस ग्रंथ की प्रस्तावना में अम्बेडकर ने लिखा हैं कि मैं बुद्ध के धम्म को सबसे अच्छा मानता हूं। इससे किसी धर्म की तुलना नहीं की जा सकती है। यदि एक आधुनिक व्यक्ति जो विज्ञान को मानता है, उसका धर्म कोई होना चाहिए, तो वह धर्म केवल बौद्ध धर्म ही हो सकता है। सभी धर्मों के घनिष्ठ अध्ययन के बाद यह दृढ़ विश्वास मेरे बीच बढ़ गया है। 

डॉ. अंबेडकर विद्वान और कर्मशील व्यक्ति थे। उन्होंने आकर्षक वेतन के साथ उच्च पदों को लेने से इनकार कर दिया क्योंकि वह दलित वर्ग के अपने बंधुओं को कभी नहीं भूले। उन्होंने अपना जीवन समानता, भाईचारे और मानवता के लिए समर्पित किया, दलित वर्गों के उत्थान के लिए पुरजोर कोशिश की। बाबा साहब ने सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए समर्थन किया। वे चाहते थे कि दलितों को उनका अधिकार, सम्मान, सामाजिक और आर्थिक समर्थन मिले। उन्होंने सामाजिक-आर्थिक समानता, धर्मनिरपेक्षता और शिक्षा के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। बाबा साहब का परिश्रम, संघर्ष और निरंतर प्रयास इस बात का प्रतीक है कि इससे किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। बाबा साहब का जीवन संघर्ष, आपके उसूल, दलितों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता के लिए संघर्ष, आदर्श और सशक्त भारत के निर्माण में दिए गए उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। 

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