(आलेख : बादल सरोज)

दंगे, फसाद, उत्पात और भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त करने के बाद अब  गुजरात सरकार ने तय किया है कि वह शादी-विवाहों की पुरोहिताई का काम भी अपने हाथ में लेगी। इसकी शुरुआत उसने विवाह रजिस्ट्रेशन के कानून में बदलाव के साथ की है। मोदी जिसे अपना बताते हैं, उस गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष सिंघवी ने विधानसभा में बोला कि ‘अनेक व्यक्तियों और सामाजिक संगठनों के ज्ञापन और सुझाव मिलने के बाद सरकार ने यह निर्णय लिया है कि अब रजिस्टर्ड विवाह करने वाले युगल को सहायक पंजीयक के यहाँ शपथपत्र देकर यह भी घोषित करना होगा कि उन्होंने अपनी शादी के बारे में अपने माता-पिता यानि अभिभावकों को बता दिया है।‘ इस प्रस्तावित कानून के तहत  उन्हें अपने विवाह आवेदनों के साथ अपने माता-पिता के पते, आधार कार्ड नम्बर और संपर्क फोन नम्बर भी जमा करने होंगे। इसके बाद 10 दिन में सहायक रजिस्ट्रार इन अभिभावकों को सूचित करेगा और उसके बाद यदि वह ‘संतुष्ट’ हो जाता है, तो उसकी संतुष्टि के 30 दिन बाद शादी पंजीकृत की जायेगी।



बदलाव का यह गुजरात मॉडल  अभी तक प्रचलित स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 — जो देश के सभी धर्मों, जातियों के नागरिकों के लिए एक “सिविल विवाह” का विकल्प प्रदान करता है – की भावना को पूरी तरह खत्म कर देने की बदनीयती से बढ़ा एक बड़ा कदम है। स्पेशल मैरिज एक्ट का यह कानून मुख्य रूप से लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष समाज बनाने और नागरिकों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता देने के उद्देश्य से बनाया गया था। यह ऐसा क़ानून था, जिसकी मंशा समाज में अलग-अलग धर्मों या जातियों के बीच होने वाले विवाहों को प्रोत्साहन देने, उसे कानूनी मान्यता प्रदान करने की थी ,ताकि धीरे-धीरे सामाजिक भेदभाव कम हो सके। पूरे देश में इस तरह के कई विवाहों के लिए कुछ लाख रुपयों की नकद प्रोत्साहन राशि, नौकरियों में प्राथमिकता जैसे प्रावधान तक किये गए थे। यह उन जोड़ों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, जो बिना धर्म बदले या बिना किसी धार्मिक रीति-रिवाज के शादी करना चाहते हैं। यह कानून हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध सहित सभी धर्मों और किसी भी धर्म को न मानने वाले लोगों पर लागू होता है। मुस्लिम या हिंदू विवाह कानून जैसे पर्सनल लॉ  के तहत अक्सर शादी के लिए एक साथी को अपना धर्म बदलना पड़ता था। यह एक्ट बिना धर्म बदले शादी का विकल्प देता है। इसी के साथ इस तरह शादी करने वाले जोड़ों को संपत्ति, विरासत और तलाक जैसे मामलों में ऐसा एक समान कानूनी ढांचा और सुरक्षा प्रदान करता है, जो किसी धार्मिक ग्रंथ के बजाय देश के संविधान पर आधारित होता है। इस कानून के माध्यम से यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि शादी करने वाला व्यक्ति पहले से विवाहित न हो, जिससे धोखाधड़ी और बहुविवाह की संभावना भी कम हो जाती है। अभी तक इसकी प्रक्रिया आसान है। शादी करने के इच्छुक जोड़े को अपने जिले के “विवाह अधिकारी” को लिखित नोटिस देना होता है। नोटिस मिलने के बाद अधिकारी इसे अपने नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर सार्वजनिक करता है। अगले 30 दिनों तक किसी भी व्यक्ति को इस विवाह पर कानूनी आपत्ति, जैसे पहले से शादीशुदा होना दर्ज करने का अधिकार होता है। यदि कोई वैध आपत्ति नहीं आती है, तो तीन गवाहों की उपस्थिति में विवाह अधिकारी के सामने शादी संपन्न होती है और मैरिज सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है।

देश के वयस्क नागरिकों के निजी जीवन में हस्तक्षेप और जीवन साथी चुनने के उनके संवैधानिक अधिकार को सीमित और लगभग असंभव बनाने वाले इस संशोधन के लिए ‘लव जिहाद’ का घिसा-पिटा, विभाजनकारी और निराधार बहाना बनाया गया हैं। ध्यान रहे  कि खुद मोदी सरकार संसद और सूचना के अधिकार में दिए गए जवाब तथा सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में मान चुकी है कि  लव जिहाद जैसी कोई चीज अस्तित्व में नहीं है। मगर कुनबा जानता है कि उसने समाज के भीतर अपने दुष्प्रचार के जरिये काफी हद तक  इस तरह का माहौल बना लिया है कि ज़रा-सा मुस्लिम एंगल देकर लोकतंत्र और संविधान के किसी भी निषेध को गले उतारा जा सकता है।

हाल के कुछ वर्षों में छेड़े गए धुर साम्प्रदायिक अभियान में सिर्फ आरएसएस ही नहीं जुटा, प्रधानमंत्री मोदी, उनके मंत्रिमंडल के मंत्रियो और भाजपा मुख्यमंत्रियों सहित प्रशासन, यहाँ तक कि इस विचारधारा से संबद्ध न्यायपालिका में विराजे ‘सज्जनों’ ने भी बढ़-चढ़कर योगदान दिया। मुंह में सबका साथ सबका विकास रहा, बगल में आबादी के अलग-अलग हिस्सों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने और लड़वाने का छुरा रहा। कभी श्मशान बनाम कब्रिस्तान, कभी होली बनाम ईद, कभी कपड़ों से की जाने वाली पहचान, तो कभी सब्जी ठेलों से लेकर दुकानों तक नाम लिखवाकर, उसे बहिष्करण का जरिया बनाया गया। इस तरह देश की हजारों वर्ष पुरानी सहजीवन और साझी संस्कृति को छिन्न-भिन्न तथा नष्ट-भ्रष्ट करने की कोशिशें की गयीं। बिना किसी तरह के आंकड़े बताये कुछ दशकों में हिन्दू आबादी के अल्पमत में चले जाने का खतरा बताकर भाजपा शासित राज्यों में धर्म परिवर्तन वाले कानूनों की झड़ी लगा दी गयी। इस नफरती मुहिम ने आज देश को कहाँ लाकर खड़ा कर दिया है, इसकी ताज़ी मिसाल बदायूं का बताया जाने वाला वह विडियो है, जिसमें नमाज से लौट रहे एक वृद्ध सहित मुस्लिम पहनावे वाले व्यक्तियों के साथ खुद को बजरंग दल का अध्यक्ष बताने वाला गुंडा गाली-गलौज और मारपीट कर रहा है। एक और चिंताजनक विडियो है, जिसमे स्कूल बस में वापस लौट रही छोटी-छोटी बच्चियां अपनी ही सहपाठी एक मुस्लिम बच्ची के बारे में अनर्गल बोल रही हैं। यह आपराधिक ध्रुवीकरण कितना नीचे तक जा चुका है, इसका एक उदाहरण सर्वोच्च न्यायालय के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयाँ ने दिया, जब उन्होंने बताया कि किस तरह मुसलमान जैसा लगने वाला नाम होने की वजह से एक पीएचडी छात्रा को मकान देने से साफ़ मनाकर दिया गया। यह कही दूरदराज नहीं, राजधानी दिल्ली का विस्तार कहे जाने वाले नोयडा में हुआ। 

कुनबा जानता है कि एक बार ‘हिन्दू खतरे में’ का जुमला चेप कर कुछ भी टेपा जा सकता है। इसलिए गुजरात सरकार ने इस संशोधन के साथ वही आजमाने की कोशिश की है। मगर मसला लव जिहाद नहीं है, इरादा लोकतंत्र के तिरस्कार, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की नींव पर खड़े सभ्य समाज के ढाँचे के नकार और संविधान के धिक्कार का है। अब तक के हासिल के उस संहार का है, जिसे कुनबा मध्ययुगीन समाज में लौटने का ‘धर्मयुद्ध’ कहता बताता है। असल मकसद मुसलमानों या ईसाईयों, सिखों या बौद्धों का नहीं है, उस ब्राह्मण धर्म की बहाली का है, जिसके आधार पर राष्ट्र बनाना और चलाना संघ अपना लक्ष्य और ध्येय मानता है। हाल में यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ मचाये उत्पात ने, जिसे हिन्दू कहा जाता है, उस आबादी के उस विराट बहुमत को उसकी  ‘हैसियत’  दिखाने में अपनी पूरी ताकत झोंक देने वालों ने  इसी ‘ब्राह्मण धर्म’ की दुहाई दी थी। अब वे बेगानी शादी में बिन बुलाये ही पुरोहिताई करके महिलाओं को मनु की अंधेरी कंदरा में धकेल देना चाहते हैं।

गुजरात क़ानून बनाकर ऐसा करना चाहता है, तो यूपी में योगी की सरकार बिना कानून बनाये ही युगल दम्पत्तियों का जीना मुहाल किये हुए है। बारह अंतर्धार्मिक जोड़ों – जिनमे 7 में युवती मुस्लिम और युवक हिदू, 5 में युवती हिन्दू और युवक मुस्लिम समुदाय से थे – के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को आईना दिखाया है। इन बारहों मामलों में किसी ने भी धर्म नहीं बदला था, इसके बावजूद सरकार उन्हें धर्म परिवर्तन कनून के नाम पर परेशान कर रही थी। हाईकोर्ट ने साफ किया कि इस देश में वयस्कों को विवाह करने, साथ रहने का अधिकार है, किसी व्यक्ति, परिवार या सरकार को उसमे टांग अड़ाने का अधिकार नहीं है। ऐसा किया जाना देश की विविधता के लिए खतरनाक होगा। राज्य का कर्तव्य है कि वह उनके जीवन और स्वतन्त्रता के अधिकार की हिफाजत करे। अदालत के हस्तक्षेप से भले यह रुक गया हो, मगर इससे संघ और भाजपा की मंशा उजागर हो जाती है।

विवाह और अपना अच्छा जीवन साथी चुनने तथा बुरे जीवन साथी  से मुक्ति पाने के प्रश्नों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इस पूरे विचार समूह की समझदारी क्या है, इसके लिए डॉ आंबेडकर द्वारा लाये गए हिन्दू कोड बिल पर इनके रुख पर निगाह डालना जरूरी है। डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने  11 अप्रैल 1947 को  संविधान सभा के सामने हिंदू कोड बिल पेश किया। यह बिल हिंदू महिलाओं को तलाक का अधिकार, संपत्ति में उत्तराधिकार और अंतर्जातीय विवाह जैसे कानूनी अधिकार देने के प्रावधान करता था। इस तरह ऐसी तमाम कुरीतियों को दूर करना चाहता था, जिन्हें अपनी महान धार्मिक परंपरा के नाम पर कुछ कट्टरपंथी जिंदा रखना चाहते थे। जैसे ही इस क़ानून का मसौदा रखा गया, वैसे ही आरएसएस, सावरकर की अगुआई वाली हिन्दू महासभा और ऐसे ही कुछ संगठन इसके खिलाफ कपड़े फाड़ने पर आमादा हो गए। इसे हिंदू समाज की ‘धर्मसम्मत’ सामाजिक संरचना और कानूनों में राज्य का हस्तक्षेप बताने लगे। तत्कालीन सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने अगस्त 1949 के अपने एक भाषण में कहा कि ‘आंबेडकर जिन सुधारों की बात कर रहे हैं, वे भारतीयता से बहुत दूर हैं। इस देश में विवाह और तलाक जैसे सवाल अमेरिकी या ब्रिटिश मॉडल से नहीं सुलझेंगे। हिंदू संस्कृति और कानून के अनुसार, विवाह एक ऐसा संस्कार है, जिसे मृत्यु के बाद भी बदला नहीं जा सकता।‘  आरएसएस के मुखपत्र  ‘ऑर्गनाइज़र’ में इसे “हिंदू कानून, संस्कृति और धर्म पर एक क्रूर और अज्ञानी आक्षेप” कहा। ये सब मिल-मिलाकर आन्दोलन में उतर गए। दिसंबर 1949 में आरएसएस ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक  विरोध सभा की गयी, जिसमें इस हिन्दू कोड बिल को “हिंदू समाज पर परमाणु बम”  और ‘रोलेट एक्ट’ तक बताया गया। इसके बाद संघ स्वयंसेवकों ने संसद पर प्रदर्शन किया और नेहरू-अंबेडकर के पुतले जलाए। इनकी मांग थी कि हिंदू कानून शास्त्रों के अनुसार ही चलें, न कि लैंगिक समानता के उन आधुनिक  सिद्धांतों पर, जिन्हें यह बिल लेकर आ रहा है। रामलीला मैदान की इस सभा में इस आन्दोलन के एक प्रमुख  नेता करपात्री महाराज ने बाबा साहब की जाति को लेकर और उनके द्वारा लिखे जा रहे संविधान के बारे में घोर जातिवादी टिप्पणी भी की थी।

विवाह संस्था के प्रति इस कुनबे का रुख सिर्फ अंतर्धार्मिक विवाहों के विरोध तक ही सीमित नहीं है, वे अंतर्जातीय विवाहों के भी सख्त खिलाफ है। इस बारे में अनेक बार संघ और जिन्हें वह अपना विचारक मानता है, उनके लिखे-कहे में दोहराया जाता रहा है। इस संबंध में संघ, जिन्हें गुरु जी मानता है, उन एम एस गोलवलकर के दो उद्धरण ही काफी है। पहला उद्धरण मनुस्मृति सम्मत वर्णाश्रम की महानता को लेकर हैं, जिसमे वे कहते हैं कि “आज हम अज्ञानता के कारण वर्ण व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश करते हैं। लेकिन इसी व्यवस्था के माध्यम से ही संपत्ति के प्रति लालसा को नियंत्रित करने का एक बड़ा प्रयास किया जा सका… समाज में कुछ लोग बुद्धिजीवी होते हैं, कुछ उत्पादन और धन कमाने में कुशल होते हैं और कुछ श्रम करने में सक्षम होते हैं। हमारे पूर्वजों ने समाज में इन चार व्यापक विभाजनों को देखा था। वर्ण व्यवस्था का अर्थ इन विभाजनों का उचित समन्वय और व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार समाज की सेवा करने में सक्षम बनाना है, जिसके लिए वंशानुगत रूप से उन कार्यों का विकास होता है, जिनके लिए वह सबसे उपयुक्त है। यदि यह व्यवस्था जारी रहती है, तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए जन्म से ही आजीविका का साधन आरक्षित हो जाता है।” (ऑर्गेनाइज़र , 2 जनवरी, 1961, पृष्ठ 5 और 16)

दूसरे में तो वे सामाजिक व्यवहार की सारी सीमाओं को ही लांघ जाते हैं। 17 दिसंबर, 1960 को गुजरात विश्वविद्यालय के समाज विज्ञान विभाग के छात्रों के बीच बोलते हुए वे कहते हैं कि ‘आज तो पारस्परिक प्रजनन – क्रॉस ब्रीडिंग —  के प्रयोग केवल पशुओं पर ही किए जाते हैं। लेकिन मनुष्यों पर ऐसे प्रयोग करने का साहस तो आज के तथाकथित आधुनिक वैज्ञानिकों में भी नहीं दिखता ….. किन्तु हमारे पूर्वज इस मामले में कितने महान थे कि उन्होंने यह साहसी नियम बनाया था कि किसी भी वर्ग की विवाहित महिला की पहली संतान का पिता नम्बूदिरी ब्राह्मण होना चाहिए, और उसके बाद ही वह अपने पति से संतान उत्पन्न कर सकती थी। आज इस प्रयोग को व्यभिचार कहा जाएगा, लेकिन तब ऐसा नहीं था, क्योंकि यह नियम केवल पहली संतान तक ही सीमित था। (ऑर्गेनाइज़र, 2 जनवरी, 1961, पृष्ठ 5)।
यह सिर्फ पुरानी बातें नहीं हैं। संघ के वर्तमान सरसंघचालक भी इसे बीच-बीच में दोहराते रहते हैं। लिव इन और समलैंगिक विवाहों को लेकर उनकी राय जगजाहिर है। अभी कुछ वर्ष पहले ही उन्होंने  कहा था कि विवाह एक ‘सामाजिक अनुबंध’ है, जिसके तहत पति और पत्नी के बीच एक समझौता होता है। इस अनुबंध के अनुसार, पत्नी को घर संभालना चाहिए और पति की जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए। बदले में, पति का धर्म है कि वह पत्नी की सुरक्षा करे और उसकी सभी जरूरतों को पूरा करे। जब तक पत्नी घर की जिम्मेदारी निभाती है, पति को उसे साथ रखना चाहिए। यदि वह इस अनुबंध का पालन नहीं करती है, तो पति उसे छोड़ सकता है।‘ ध्यान रहे, उन्होंने ऐसी ही या कैसी भी स्थिति आने पर पत्नी द्वारा पति को छोड़ने की बात भूले से भी नहीं कही। सोच का यही तरीका है, जो बलात्कारों को लेकर कभी इलाहाबाद, कभी कलकत्ता, तो हाल ही में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जुगुप्सा जगाने वाले महिला विरोधी फैसलों और गुजरात हाईकोर्ट द्वारा पति के पत्नी को थप्पड़ मारे जाने को हिंसा न मानते हुए ‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति’ के सूत्र में पति महोदय को भी अभयदान देने के सिद्धांत में दिखाई देता है।

गुजरात सरकार के कानूनों में किये जाने वाले बदलाव को इन संदर्भों के साथ, इस सबकी पृष्ठभूमि में देखने से प्रस्तावित संशोधन का असली मंतव्य समझा जा सकता है। अपने सौवें वर्ष में संघ उस हर अनकिये को करना चाहता है, जिसे इस देश की जनता ने उसे नहीं करने दिया था। इसे रोकना है, तो उसी जनता को जोर से ना कहना होगा।

*(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)*

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