प्रकाशनार्थ


(आलेख : बादल सरोज)

भारत में आम तौर से तीन दिन कुछ विशेष माने जाते हैं । ये सभी भारतीयों के होते हैँ। इन तीन दिनों में, जो अमूमन नहीं बोलते, वे भी मेल-मिलाप, शांति, एकजुटता, देश और उसके संविधान की ताकत वगैरा-वगैरा की बातें बोलते हैं। गाँव, कस्बे, शहर, बसाहटें इसी तरह के गानों–गीतों से गूँजती रहती हैं। देश प्रेम उफान पर होता है। ये दिन – 26 जनवरी गणतंत्र दिवस, 15 अगस्त स्वतन्त्रता दिवस और 2 अक्टूबर गांधी जी का जन्म दिवस – पवित्रता की इस हद तक पावन माने जाते हैं कि इस दिन शराब और मांसाहार की दुकाने भी बंद रखे जाने का चलन है।

मगर नफरती अफीम के थोक व्यापारियों ने सारी शर्म और हया छोड़कर, क़ानून-विधान को तोड़कर इन दिनों को भी – इन दिनों को खासतौर से – जहरखुरानी के दिनों में बदल कर रख दिया है। इस बार की 26 जनवरी से कुनबे ने जो तूमार खड़ा किया है, वह अब तक जारी है। यह जिस तरह उत्तरोत्तर तेज से तेजतर किया जा रहा है, उससे लगता है कि आने वाले दिनों में इसे एक अंधड़ में बदले जाने की पूरी तैयारी है : लगता है संघ की 100 वी सालगिरह इसी तरह मनाई जाने वाली है।

असम के मुख्यमंत्री – जिन्हें स्वयं अमित शाह ने देश के सबसे भ्रष्ट और बेईमान मुख्यमंत्री का तमगा दिया था, जिनके घोटालों और भ्रष्टाचार का पोथन्ना वे आमसभाओं में लहरा-लहरा कर दिखाया करते थे, वही — हिमंता विषशर्मा — इन दिनों इनके पोस्टर बॉय और आग लगाऊ प्रवक्ता बने हुए हैं। ठीक गणतंत्र दिवस के अगले दिन तिनसुकिया के डिगबोई में भाषण देते हुए उन्होंने हिन्दू असमियों का आव्हान किया कि वे मुसलमानों को हर तरह से परेशान करें और उनका जीना मुहाल कर दें। इसके तरीके सुझाते हुए उन्होंने कहा कि अगर रिक्शे वाला मियां 5 रूपये माँगता है, तो उसे सिर्फ 4 रूपये दो।

उन्होंने यह भी कहा कि ‘लोग मुझे जितना चाहे गाली दे, मेरा काम मियां लोगों की ज़िंदगी मुश्किल बनाना है।’ वे यहीं तक नहीं रुके और बोले कि ‘हिमंता बिस्वा शर्मा और भाजपा सीधे तौर पर मियां समुदाय के खिलाफ है।’ उन्होंने लोगों से भी मियां समुदाय को ‘परेशान करने’ की अपील की। उनका कहना था कि ‘जब तक उन्हें परेशानी नहीं होगी, वे असम नहीं छोड़ेंगे।’ इसी भाषण में उन्होंने एलान किया कि असम में विशेष गहन संशोधन – एसआईआर – प्रक्रिया के दौरान 4 से 5 लाख ‘मियां’ वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाएंगे।

ये बयान सिर्फ आपत्तिजनक ही नहीं हैं, बल्कि आपराधिक और दण्डनीय भी हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की कम-से-कम पांच धाराएं इन पर लागू होती हैं : इनमें धारा 196 (समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाले कृत्य), 197 (राष्ट्रीय एकता के प्रतिकूल बयान), 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से किए गए दुर्भावनापूर्ण कृत्य), 302 (धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से बोले गए शब्द) और 353 (सार्वजनिक उपद्रव को बढ़ावा देने वाले बयान) शामिल है।

इन सबके तहत गिरफ्तारी के साथ जनप्रतिनिधित्व क़ानून के हिसाब से इस व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद से हटाया जाना चाहिए, विधायकी छीनी जानी चाहिए और आगामी 6 वर्षों के लिए चुनाव लड़ने और मतदान करने के अधिकार से भी वंचित कर दिया जाना चाहिए।

मगर बजाय ऐसा कुछ करने के देश के गृहमंत्री ने स्वयं असम पहुंचकर इस जहरीले प्रचार में अपनी आवाज भी मिला दी। बिहार और झारखण्ड की तरह असम में भी घुसपैठिया राग से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की। 30 जनवरी को एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि, ‘आज, असम की दूसरी राजधानी से मैं वादा करता हूं कि अगर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के नेतृत्व में भाजपा सरकार तीसरी बार सत्ता में आती है, तो हर अवैध प्रवासी को चिह्नित कर असम से बाहर निकाला जाएगा।‘ उन्होंने दावा किया कि ‘घुसपैठियों की संख्या शून्य से बढ़कर 64 लाख हो गयी — कुछ अखबारों में छपी खबरों में इसे 74 लाख बताया गया है।

उन्होंने दावा किया कि असम के सात जिलो — धुबरी, बारपेटा, दरांग, मारिगांव, बोंगाईगांव, नौगांव और गोलपारा — में घुसपैठिए बहुसंख्यक बन गए। इन जिलों में घुसपैठियों की आबादी जरा भी नहीं थी। कांग्रेस के 20 साल के अंदर यहां 64 लाख घुसपैठिये की आबादी हो गई। यह बात वे अमित शाह कह रहे थे, जो खुद पिछले साढ़े ग्यारह वर्षों से इस देश के गृह मंत्री हैं और जिसे ‘एक बार फिर जिता कर’ असम को घुसपैठिया मुक्त बनाने’ का वादा कर रहे हैं, वह हिमंता विषशर्मा ही असम का मुख्यमंत्री है। मगर ऐसा बोलते हुए वे सिर्फ उकसावेपूर्ण गलत बयानी ही नहीं कर रहे थे, बल्कि सरासर झूठ भी बोल रहे थे।

जिन कथित 74 लाख घुसपैठियों का दावा गृह मंत्री ने किया, वह कितना झूठा है, यह असम में हुई एनआरसी – नागरिकता की जांच के बाद हुए रजिस्ट्रेशन – ने उजागर कर दिया था। सघन से भी सघनतम हुई इस नागरिकता पड़ताल के बाद 31 अगस्त 2019 को असम एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित हुई। इसमें कुल मिलाकर 19 लाख 6 हजार लोग ऐसे निकले थे, जो अपनी नागरिकता के प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाए थे। ध्यान रहे, नागरिकता प्रमाण प्रस्तुत न कर पाने का मतलब अवैध नागरिक या विदेशी होना नहीं है।

बहरहाल इनमें भी, जिन्हें हिमंता मियाँ भाई और अमित शाह घुसपैठिया कहते हैं, उनकी संख्या ज्यादा नहीं निकली। खुद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 2024 में दिए गए एक बयान में माना था कि नागरिकता सूची से बाहर किए गए 19 लाख लोगों में लगभग 12 लाख गैर-मुस्लिम (जिनमें अधिकांश हिंदू हैं) शामिल हो सकते हैं। नजरिया अनुमान के अनुसार इनमे कोई 5 लाख बंगाली हिन्दू, करीब 2 लाख कोच–राजबोंगशी सहित असमिया हिंदू और डेढ़ लाख से अधिक गोरखा शामिल है। बाकी आदिवासी समुदाय के थे। अन्य रिपोर्ट्स और छनकर आये आंकड़ों में भी नागरिकता सूची से बाहर रह गए असमियाओं में हिंदू और अन्य समुदायों का आंकड़ा 7 लाख से 12 लाख के बीच बताया गया है।

उभरते जनरोष और पांसा सही जगह न पड़ते देख मोदी सरकार ने सीएए – नागरिकता संशोधन अधिनियम का झुनझुना बजाया और कहा कि जो “वास्तविक” भारतीय नागरिक, विशेषकर हिंदू, सूची से बाहर रह गए हैं, उन्हें इस कानून के माध्यम से सुरक्षा प्रदान की जाएगी। मगर यह तो साफ हो ही गया कि विदेशी घुसपैठ का जो हल्ला मचाया गया था वह बेबुनियाद था ; बदनीयत से भरा था।

इतने जाहिर उजागर तथ्यों से भरे सत्य के बाद भी इस कदर झूठ की बाढ़ क्यों लाई जा रही है? घुसपैठिया जाप क्यों किया जा रहा है? इसलिए कि इस कुनबे और उसके पाले-पोसे कारपोरेट मीडिया ने घुसपैठिया को मुसलमान का समानार्थी शब्द बना दिया है। सौ साल पहले जिस मुसलमान विरोधी घृणा को उकसाने के जरिये मनु के राज की बहाली के लिए समग्र हिन्दू एकता बनाने की परियोजना शुरू की गयी थी, वह मुस्लिम आबादी के इलाकों को पाकिस्तान का संबोधन देते हुए घुसपैठिया को संज्ञा बनाने तक आ पहुंची है।

बंगाल में इसी भाजपा के नेता शुभेंदु अधिकारी पुराने हिन्दू महासभाइयों की तरह ‘कोई मुसलमान मुझे वोट न दे’ से होते हुए अब अपने पास मदद के लिए आने वाले मुस्लिम नागरिकों को ‘पहले धर्मपरिवर्तन करके हिन्दू बनो, उसके बाद मेरे पास आओ।‘ जैसी हिदायतें सार्वजनिक रूप से दे रहे हैं। भस्मासुर अब घुसपैठिया मन्त्र जपता हुआ तेजी से समाज में कटुता पैदा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। कभी धर्मनिरपेक्षता उसके निशाने पर हुआ करती थी – अब गणतन्त्र, संविधान और देश की एकता को विखंडित करना उसका इरादा है।

जहरीली मुहिम देश भर में अपना असर दिखा रही है। उत्तराखंड के कोटद्वार में एक मुस्लिम दुकानदार को हिंदुत्व समर्थकों द्वारा दुकान का नाम बदलने के लिए परेशान किया जा रहा था, जब दीपक कुमार नाम के एक युवा ने उनका विरोध किया, तो उत्पाती हुड़दंगिये ही नहीं, भाजपा की सरकार भी उसके खिलाफ सक्रिय हो गयी। संघ से जुड़े संगठनों के लोग दीपक के जिम पर प्रदर्शन करने पहुंच गए। पुलिस ने बजाय संरक्षण देने के दीपक के ख़िलाफ़ ही एफआईआर दर्ज कर ली।

हिमाचल प्रदेश के नूरपुर के एक बाज़ार में इसी कुनबे से जुड़े एक उन्मादी द्वारा दो कश्मीरी शॉल विक्रेताओं को परेशान करने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है। इस मामले में भी, आखिरी खबर मिलने तक, पुलिस ने इस संबंध में एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया था।

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद ज़िले के दुतकैया गांव में इसी तरह के उकसावे पर सैकड़ों लोगों की भीड़ ने भी लाठी, ईंट, पत्थर और केरोसिन की बोतलें लेकर गाँव के 10 मुस्लिम परिवारों पर हमला कर दिया। वाहनों और घरों में आगजनी कर दी। ध्यान देने की बात यह है कि इस घटना में कम से कम छह पुलिस कर्मी घायल हुए। पुलिस ने दंगे के सिलसिले में तो दो एफआईआर दर्ज कर भी लीं, लेकिन छग सरकार की हिदायत के चलते पुलिस बल पर हमला करने वालों के ख़िलाफ़ फिलहाल कोई केस दर्ज नहीं किया है।

ऐसी घटनाएं और भी हैं – यहाँ सिर्फ तीन को दर्ज किया है और इन तीनों में समानता यह है कि तीनों ही मामलों में सरकार, प्रशासन और पुलिस बलवा करने वाले अपराधियों के साथ, उनके संरक्षक और मददगार की भूमिका में था।

बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है । सरकार हर अवसर, हर मौके , हर प्रतीक को अपने एजेंडे के अनुरूप ढालने और उसे साम्प्रदायिक विभाजन का जरिया बनाने में लगी है। इस बार की गणतंत्र दिवस की परेड में देश के राष्ट्र गान वन्दे मातरम का कुछ इसी तरीके और इरादे के साथ काम पर लगाया गया। इस बार बंगाल चुनावों के हिसाब से खासतौर से इसे न सिर्फ इस्तेमाल किया गया बल्कि सर्वोत्कृष्ट झांकी और इसके री-मिक्स को सबसे बेहतर गाने के रूप में भी सम्मानित किया गया।

अब मुहिम सिर्फ मैदानी नहीं रही है, उसे वैचारिक रूप से भी ठीये पर पहुंचाया जा रहा है। गांधी शहादत दिवस पर संघ के विचारक कहे जाने वाले राम माधव का इंडियन एक्सप्रेस में छपा लेख इसका एक उदाहरण है। इस लेख में वे गांधी की महानता के लिए कुछ शब्द लिखने के साथ उनकी कथित दुविधाओं का ब्यौरा देते हुए उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे के काम को भी एक तरह से सही बताने तक जा पहुचते हैं।

वे लिखते हैं कि “30 जनवरी 1948 को, नाथूराम गोडसे ने एम.के. गांधी की हत्या उन अपराधों के लिए की, जिनके लिए वह गांधी को जिम्मेदार मानता था। उसने गांधी पर “देश के विभाजन पर सहमति देकर घोर विश्वासघात” करने का आरोप लगाया। उसका तर्क था कि यदि गांधी ने ईमानदारी से पाकिस्तान का विरोध किया होता, तो न तो एम.ए. जिन्ना और न ही अंग्रेज इसे बना पाते।“ इसके बाद वे “यह तो निर्विवाद है कि गोडसे ने गांधी की हत्या करके गलत किया।“ कहने के बाद वे सवाल उठाते हैं कि “…..लेकिन क्या गांधी की हत्या करने के पीछे उसके कारण भी गलत थे?” राम माधव कोई छोटे-मोटे हाशिये के व्यक्ति – फ्रिंज एलिमेंट – नहीं हैं। इसलिए उनका यह गोडसे जस्टिफिकेशन सामान्य कहकर नहीं टाला जा सकता। यह भोपाल की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा के कहे का सुधरा हुआ रूप ही कहा जाना चाहिए। प्रज्ञा के बयान पर उन्हें ‘दिल से कभी माफ़ नहीं करूँगा’ कहने वाले मोदी इस बार चुप है। इसी बात पर नहीं, हर बात पर चुप हैं।

न तो साम्प्रदायिक उन्माद का यह ज्वार अपने आप है, ना हीं प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी ही अनायास है। कॉर्पोरेट हित की धुरी पर चल रही दिवालिया विदेश नीति ने चंद देसी-विदेशी धनपिशाचों के मुनाफे की खातिर देश को भंवर में फंसा दिया है। इतना असहाय और निरुपाय, इतना लाचार यह देश कभी नहीं रहा।

इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के साथ ट्रेड डील — व्यापार करार — का एलान किया है। अमरीकी कृषि और डेरी उत्पादों के लिए बाजार खुला छोड़ देने की इस डील का पहले से ही लड़खड़ा रही खेती-किसानी पर जो विनाशकारी प्रभाव पड़ने वाला है, उसकी तुलना अंग्रेजी राज में की गयी ग्रामीण अर्थव्यस्था की तबाही से ही की जा सकती है। रही-सही कसर अमरीका से आने वाले उत्पादों पर शून्य टैरिफ़ और महंगे तेल से पूरी हो जायेगी। इसके बाद जो बचेगा वह वही हिन्दू राष्ट्र होगा, जिसे बनाने का सपना संघ सौ साल से साधे हुए है। इसीलिए बात बात पर चिल्ल-पौ करने वाला संघ मुसक्का मारे बैठा है।

डील जितनी खराब है, उतना ही खराब इसके एलान का तरीका और ट्रम्प द्वारा इस्तेमाल की गयी भाषा है। कोई भी सार्वभौम राष्ट्र इस पर सख़्त आपत्ति करता। छोटे से छोटा देश भी अपनी गरिमा की हिफाजत करता। मगर 140 करोड़ के प्रतिनिधि बने बैठे आत्ममुग्ध की घिग्गी बंधी हुई है। विक्टोरिया और एलिजाबेथोँ के आगे नतमस्तक, शरणागत, आज अमरीका के सबसे दुष्ट नेतृत्व के पांवों में लहालोट हुये पड़े हैँ। इन सबसे ध्यान बंटाना है, इसलिए उन्माद भड़काना है।

इतिहास बताता है कि हुकमरानों ने जब-जब धोखे दिए हैं, हथियार डाले हैं, तब-तब अवाम ने मोर्चे संभाले हैं। इस बार भी मेहनतकशो की अगुआई में देश का अवाम इन दोनों साजिशों के विरुद्ध अड़ने और लड़ने को तैयार है। मजदूर-किसानों के साझे मोर्चो का 12 फ़रवरी की हड़ताल इसी तरह का एक मोर्चा है।

(लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)

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