(आलेख : मोहम्मद सलीम, अनुवाद : संजय पराते)

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) सचमुच तभी सक्रिय होते हैं, जब चुनाव नज़दीक होते हैं।

केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की गई छापेमारी से लोग काफी उत्तेजित हैं। ऐसा बार-बार होता है, लेकिन न तो आरोप पत्र दाखिल किया जाता है और न ही सज़ा सुनाई जाती है। चुनाव खत्म होने के बाद सब कुछ खत्म हो जाता है।

ईडी और सीबीआई मुख्य दोषियों को गिरफ्तार करने के बजाय उनके अपराधों पर पर्दा डाल रही हैं। शारदा चिट फंड घोटाला हुए 12 साल हो गए हैं। नारद घोटाला हुए ग्यारह साल बीत चुके हैं। फिर भी दोषियों पर मुकदमा नहीं चलाया गया है।

ईडी या सीबीआई को राजनैतिक औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। कहीं एजेंसियां बहुत ज़्यादा सक्रिय हैं, तो कहीं वे पूरी तरह निष्क्रिय रहती हैं। हम भ्रष्टाचार की जांच के पक्ष में हैं। लेकिन हम राजनैतिक सौदेबाजी के लिए जांच एजेंसियों के इस्तेमाल के खिलाफ हैं। हम केंद्रीय एजेंसियों के दुरूपयोग के खिलाफ हैं। ये एजेंसियां काबिल हैं, लेकिन उन्हें आज़ादी से अपना काम नहीं करने दिया जा रहा है।

शारदा केस में सीबीआई ने अदालत के आदेश पर जांच शुरू की थी, लेकिन एक दशक से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी आज तक किसी को सज़ा क्यों नहीं मिली? हमारी आपत्ति जांच के खिलाफ नहीं है। दोषी को पकड़ा जाए — हमने शुरू से ही यही मांग की है। हम ऐसी जांच की मांग करते हैं, क्योंकि जनता का पैसा लूटा गया है। लेकिन ईडी, सीबीआई और दूसरी एजेंसियों का इस्तेमाल करके भाजपा राजनैतिक फायदा उठाने की कोशिश करती है। यह बार-बार देखा गया है। चुनाव हारने के बाद भी वे पार्टियों को तोड़कर सरकारें बनाते हैं। इसी दुरुपयोग का हम विरोध कर रहे हैं। लोग जानते हैं कि इस सौदेबाजी में दोनों पक्ष शामिल हैं। अगर कोई भ्रष्टाचार करता है, तो उसे सज़ा मिलनी चाहिए। ईडी या सीबीआई जैसी एजेंसियों को राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। अन्यथा, भ्रष्ट लोग सिर्फ़ पार्टियां बदलते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार खत्म नहीं होता।

इसलिए, कोलकाता में इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पैक) नाम के एक वोट व्यवसायी के परिसर में जो कुछ भी हुआ, वह पुराने नाटक का एक नया संस्करण है।

एक तरफ, ऐसी कार्यवाहियों से लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ सज़ा वाले एक्शन का भ्रम पालने का शिकार हो जाते हैं, हालांकि अब तक आरोपियों का कुछ नहीं बिगड़ा है। इस समय की गई कार्यवाही का दूसरा पहलू यह है कि यह लोगों के असली मुद्दों को दबा देती है। जब बंगाल की जनता अपनी रोज़ी-रोटी से जुड़े असली मुद्दों पर लड़ने के मूड में है, तभी ईडी कोलकाता में मौके पर पहुँच गई।

बंगाल में असली मुद्दे क्या हैं? भारी बेरोज़गारी एक मुद्दा है। बड़े पैमाने पर पलायन एक मुद्दा है। पश्चिम बंगाल के परेशान प्रवासी मज़दूरों दूसरी जगहों पर अपने जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उन्हें परेशान किया जा रहा है, तंग किया जा रहा है और यहाँ तक कि उनकी हत्या भी की जा रही है। जो एसआईआर चल रहा है, वह साफ तौर पर असली मतदाताओं को बाहर निकालने की कारगुज़ारी है, जिसमें असमानताओं के बारे में अजीब दावे किए जा रहे हैं। मतदाता सूची को ठीक करने के नाम पर चलाई जा रही ऐसी गलत प्रक्रिया में हाशिये पर पड़े, गरीब और कमज़ोर तबके के लोग बलि का बकरा बन रहे हैं। अदालत के बार-बार फैसलों के बावजूद मनरेगा में 100 दिनों के काम की मज़दूरी अभी भी नहीं दी जा रही है। ग्रामीण गरीब कामकाजी महिलाएँ सूक्ष्म वित्त (माइक्रोफाइनेंस) कंपनियों के एजेंटों का सामना करते हुए बहुत परेशानी में हैं।

इन सब पर पर्दा डालने के लिए, भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसी जांच-पड़ताल की इस कार्रवाई का नाटक रचा गया है, ताकि राजनीतिक ध्रुवीकरण को मज़बूत किया जा सके।

छापामारी के दौरान दस्तावेजों को ज़ब्त करके पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और राज्य पुलिस ने एक आपराधिक काम किया है। इसी प्रकार की पिछली घटनाओं को याद करें। आरोप है कि मुख्यमंत्री ने भवानीपुर के एक पुलिस स्टेशन से बदमाशों को छुड़वाया था। आर जी कर अस्पताल में सबूतों को नष्ट करने के लिए टीएमसी के गुंडों ने तोड़फोड़ की थी। राजीव कुमार को पुलिस कमिश्नर के उसके कार्यकाल के दौरान सीबीआई की पूछताछ से बचाने के लिए मुख्यमंत्री अपने काफिले के साथ सड़कों पर थीं। उसी पटकथा पर बार-बार तमाशा किया जा रहा है। यह सब राजनीतिक हंगामा खड़ा करने के लिए किया जा रहा है। बहरहाल, ऐसी तमाशेबाजी को अब कोई तवज्जो नहीं मिलेगी, न ही लोग इस पर विश्वास करेंगे।

जब ईडी एक निजी कंपनी की तलाशी ले रही थी, तो राज्य पुलिस ने आकर दस्तावेज छीने और उन्हें एक ऐसी गाड़ी में लादा, जो न तो पुलिस की थी और न ही सरकार की। राज्य पुलिस के अधिकारियों, जिसमें राज्य पुलिस के महानिदेशक और कोलकाता के पुलिस कमिश्नर भी शामिल थे, के ऐसे गैर-कानूनी कामों ने इसे और भी ज़्यादा शर्मनाक बना दिया। वह गाड़ी 27 फरवरी, 2023 को टीएमसी पार्टी की संपत्ति के तौर पर पंजीकृत की गई थी। मुख्यमंत्री ने गुरुवार (8 जनवरी) को ‘आई-पैक’ ऑफिस का जिस तरह ज़िक्र किया, उससे ऐसा लगता है कि वह टीएमसी का पार्टी ऑफिस है।

प्रशांत किशोर की ‘आई-पैक’ ने चुनाव जीतने के लिए भाजपा की मदद की थी। बाद में उन्होंने पश्चिम बंगाल में टीएमसी के लिए काम किया था। अब इस कंपनी को प्रशांत किशोर के सहकर्मी प्रतीक जैन चला रहे हैं। कोयला तस्करी, पशु तस्करी, सोने की तस्करी और शिक्षक भर्ती घोटाले सहित कई भ्रष्ट तरीकों से कमाया गया काला धन इस संस्था में लगाया गया है। मौजूदा भ्रष्ट सरकार को बनाए रखने के लिए, टीएमसी ने ‘आई-पैक’ का इस्तेमाल मतदाता सूची में हेरफेर करने से लेकर मतदान केंद्रों और यहां तक कि मतगणना केंद्रों पर भी वोट लूटने के लिए किया है। मतदाता सूची के मौजूदा सारांश समीक्षा (समरी रिवीजन) के दौरान, ‘आई-पैक’ के कर्मचारी भेष बदलकर काम करते पाए गए थे। उन्होंने राज्य सरकार के कर्मचारियों-जैसा व्यवहार किया और उनके पास चुनाव आयोग के कर्तव्य-निर्वहन के लिए नियुक्ति पत्र भी मिले। यही वह तरीका है, जहां एक ओर मतदाता सूची में फर्जी नाम डालने की व्यवस्था की जा रही थी, वहीं दूसरी तरफ आम लोगों को परेशान किया जा रहा था। एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान टीएमसी की यही भूमिका थी। चुनाव आयोग और ईडी को इन सब बातों की जानकारी है, लेकिन दोनों में से किसी ने भी इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। ‘कालीघाटेर काकू’ के आवाज के नमूनों का मिलान होने के बाद ईडी ने ‘लीप्स एंड बाउंड्स’ की संपत्तियों को जब्त कर लिया, लेकिन अब तक भतीजे के घर पर कोई छापा नहीं पड़ा है। मुख्यमंत्री द्वारा ‘आई-पैक’ के दस्तावेजों को ठिकाने लगाने के बाद, वे फिर से कोई प्रभावी कदम उठाने में नाकाम रहे हैं।

दस दिनों के अंदर प्रधानमंत्री का राज्य का दौरा तय है। क्या कोई उम्मीद कर सकता है कि वह केंद्रीय एजेंसियों के खिलाफ राज्य प्रशासन के इस्तेमाल के बारे में कोई कार्रवाई करेंगे? 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले, मोदी ने राज्य में टीएमसी शासन और केंद्र में भाजपा शासन के ‘दो लड्डूओं’ का वादा किया था। हमें याद है, पिछले चुनाव से पहले उन्होंने भ्रष्ट लोगों को जेल भेजने की बात कही थी। फिर भी, मुख्यमंत्री को बचाया गया है और मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, भ्रष्ट लोग एक-एक करके जेल से बाहर आ गए हैं।

जो तमाशा होना था, वह हो गया। इसने दिखाया कि ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए कैसे किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री भी इसी तरह राज्य के पुलिस प्रशासन का इस्तेमाल कर रही हैं। इस माहौल में, जब शासक पार्टी के लोग खुले आम भ्रष्टाचार और गंभीर अपराध करते हैं, तब भी किसी भी दोषी को सही सज़ा नहीं मिलती। इसलिए, हम कहते हैं कि यह सिर्फ़ एक ‘सेटिंग’ है। हमें राजनीति को ध्रुवीकृत करने की इस कोशिश को तोड़ना होगा। हमें लोगों के मुद्दों को उठाना होगा।

(लेखक प. बंगाल माकपा के सचिव और पोलिट ब्यूरो सदस्य तथा पूर्व सांसद हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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