(आलेख : बादल सरोज) उधर : 25 नवम्बर को अयोध्या में 22 महीने पहले ‘प्राण प्रतिष्ठित’ किये जा चुके मन्दिर पर पूरा कुनबा इत्ती चौड़ाई और उत्ती लम्बाई का भगवा ध्वज फहरा कर हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की ओर कदमचाल तेज कर रहा था और इधर : उसी दिन, लगभग उसी समय मध्यप्रदेश की संस्कारधानी कहे जाने वाले जबलपुर में भगवा ध्वज हाथ में लिए कुछ ‘वीर और वीरांगनायें’ हिन्दू राष्ट्र के नाम पर लाठी तलवारें और न जाने क्या-क्या अस्त्र-शस्त्र लेकर एक धरने से लौट रहे लोगों को मार, पीट और घसीट रहे थे। धरना देने वाले दो रोज पहले सम्राट अशोक – भारत के इतिहास के एक महत्वपूर्ण शासक – के नाम पर लगी साहित्य प्रदर्शनी पर इसी गिरोह द्वारा हल्ला बोले जाने, संविधान सहित भारतीय सभ्यता के अलग-अलग कालखंडों को बयान करने वाली, भारतीय वांग्मय की धरोहर मानी जाने वाली किताबें नष्ट किये जाने का विरोध और दोषियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर धरना दे रहे थे। दोनों ही हमले ठीक पुलिस कण्ट्रोल रूम और थाने के एकदम करीब और इस तरह मप्र पुलिस की निगहबानी और निगरानी में हुए। जबलपुर बहुत कुछ खासियतों के साथ मप्र उच्च न्यायालय का मुख्यालय होने की विशेषता रखता है और इसीलिये स्वयं को न्याय का प्रांगण भी समझता है। ऐसे जबलपुर में इतना सब घटता रहना और संविधान, लोकतंत्र, क़ानून व्यवस्था और बाकी सबका हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना संयोग नहीं है : यह उसी दिन अयोध्या में फहराए गए ध्वज की छाया में रची जा रही भविष्य की झांकी है। अयोध्या में भगवा ध्वज फहराते हुए अत्यंत अलंकृत और प्रांजल हिंदी में मोदी जिस रामराज्य की बात कर रहे थे, वह गांधी का रामराज्य नहीं था। गांधी कहते थे कि “मैं पठानों के बीच जाता हूँ, तो खुदा के राज की बात करता हूं, इसाईयों के बीच गॉड के राज की बात करता हूँ : मेरे लिए रामराज्य का मतलब धार्मिक राज्य नहीं है। मेरे रामराज्य का अर्थ एक आदर्श, न्यायपूर्ण, अहिंसक और लोकतांत्रिक समाज है, जिसमे सत्य, अहिंसा, समानता और सादगी प्रमुख हों। जहाँ सरकार का उद्देश्य जनता की सेवा करना हो।‘’ उन्होंने कहा था कि “किसी देश में यदि सारे के सारे लोग एक ही धर्म को मानने वाले हों, तब भी उसे धर्म के नाम पर नहीं चलाया जाना चाहिए।“ मोदी अयोध्या में जिस रामराज्य की बात कर रहे थे, वह हिंदी पट्टी में राम को घर-घर पहुंचाने वाले गोस्वामी तुलसीदास का “दैहिक, दैविक, भौतिक तापा/ रामराज काहुहि नहीं व्यापा” वाला वह रामराज्य भी नहीं था, जिसे परिभाषित करते हुए उन्होंने रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड में लक्ष्मण को समझाते समय राम के मुंह से कहलवाया है कि “जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी / सो नृप अवसि नरक अधिकारी”। यह चाणक्य का ‘प्रजा सुखे, सुखं राज्ञं’1– प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है, वाला राम राज्य भी नहीं था। वे जिस रामराज्य की दुहाई देकर उसे राम के साथ जोड़कर स्वीकार्य बनाने की कोशिश कर रहे थे, वह वही हिन्दू राष्ट्र है, जिसे 1947 में इस देश के अपार बहुमत ने ठुकराया था और जिसे देश ने अपने 7 हजार वर्षों के लिखित इतिहास में कभी स्वीकार नहीं किया। यह “भारत दैट इज इंडिया” यानी हिन्दोस्तान में रची-बसी समावेशी सहजीवन की विरासत वाला नहीं, आरएसएस की अभारतीय धारणा वाला रामराज्य है। इस राम-राज्य के लिए जिन राम को गढ़ा गया है, वे राम भी वाल्मीकि या तुलसी के राम नहीं है, सहज, सरल, वीतरागी और मर्यादा मानने वाले राम तो बिलकुल नहीं है : प्रत्यंचा ताने क्रोधित ऐसे राम हैं, जिनका दो सौ से अधिक रामायणों में किसी भी रामकथा के किसी भी अध्याय, सर्ग, सोरठे या चौपाई में जिक्र तक नहीं मिलता। ये मोदी और उनके कुनबे के राम हैं। हालांकि होने को तो जिसे वे राम का ध्वज बता रहे थे, वह ध्वज भी राम का नहीं है। जब कुनबा बहुत छोटा था, उस वक़्त इस हिन्दूराष्ट्री धारा के बड़े रहे रामराज्य परिषद् के सर्वेसर्वा करपात्री जी महाराज ने अनेक बार कहा और लिखा है कि “भगवा आरएसएस संगठन के ध्वज का रंग है। उसे समूचे सनातन धर्म का प्रतीक मान लेना गलत है। वेद-पुराण-शास्त्र मे कहीं भी इस बात का प्रमाण नही है कि भगवा समस्त सनातन हिंदू धर्म का प्रतीक है!” अपनी बात के समर्थन में उन्होंने राम-रावण युद्ध से महाभारत में कृष्ण सहित अलग-अलग लोगों के अलग-अलग ध्वजों सहित कई पौराणिक उदाहरण भी दिए थे। इस तरह किसी धर्माचार्य या धर्मगुरु की दिखावटी मौजूदगी के बिना संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत की उपस्थिति में करपात्री जी के शब्दों में संघ के रंग वाले ध्वज में कोविदार का वृक्ष और थोड़ा सा श्रृंगार जोड़कर जो फहराया गया, वह उन्हीं के ‘संकल्पों, सपनों’ वाला राज ; हिन्दू राष्ट्र है!! ‘सत्य की महत्ता, समता और सामाजिक सदभाव’ के विशेषणों के साथ वे जिस उत्पाद को बेच रहे थे, वह ठीक उसके उलट गुण धर्म वाला फासीवाद का भारतीय संस्करण है। एक रंगी, एकरस, एकांगी समाज वाला राष्ट्र, जो रंग-बिरंगी, समावेशी, विविधताओं में गुंथे ‘अनेकता में एकता’ के प्रतीक अब तक के भारत की संगति में नहीं, उसका एकदम विलोम है। एक ऐसा राष्ट्र जो धर्मसम्मत नहीं, मनुसम्मत है : एक ऐसा समाज जहां ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’ प्रतिबंधित है। प्रधानमंत्री मोदी ने संघ प्रचारक के नाते दिए अपने भाषण में कई सदियों बाद गुलामी से मुक्ति के जिस जागरण की बात की, वह आधुनिकता की ओर ले जाने वाला रेनेसां – नवजागरण – नहीं है, यह पीछे की ओर, अँधेरे के काल में वापस ले जाने वाला रिवाईवलिज्म – पुनरोत्थान – है। उनका प्राचीन और पुरातन गौरव और परम्परा भी चुनिन्दा है। उसमें धरती के इस हिस्से पर जन्मा समूचा प्रबोधन भी नहीं है। वे विचार नहीं है, जिन्होंने समय-समय पर सामाजिक जड़ता को तोड़ने और जहालत के झाड़-झंखाड़ साफ़ करने के औजारों की भूमिका निबाही। समाज को बुद्धि और विवेक, तर्क और संवाद, ज्ञान और विश्लेषण का सलीका दिया और इस तरह नये सृजन, आविष्कार और अनुसंधानों के लिए राह खोली। जबलपुर में उसी की एक झांकी मंचित की जा रही थी। यहाँ जिन किताबों को “देवी देवताओं के बारे में की गयी आपत्तिजनक टिप्पणियों” वाली बताकर उत्पात मचाया गया, वे धरा के इस हिस्से पर जन्मे और दुनिया के बहुत बड़े हिस्से को प्रभावित करने वाले असाधारण मनीषी गौतम बुद्ध और उनकी विचार-परम्परा की किताबें थीं। इस देश में शिक्षा और सामजिक क्रान्ति के अग्रदूतों में से एक जोतिबा फुले और आधुनिक भारत के शिल्पकारों में से एक डॉ. बी आर अम्बेडकर का साहित्य था। उनकी ‘रिडल्स ऑफ़ हिन्दुइज्म’ तथा ‘एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ जैसी किताबें थीं। गरज यह कि भारतीय विमर्श का वह हिस्सा, जिसने जड़ता को तोड़ने और अँधेरे को काफी हद तक चीरने में युगांतरकारी भूमिका निबाही है, ठीक वही इनके निशाने पर है। यह मानना गलतफहमी होगी कि यह आधार सिर्फ बुद्ध, महावीर, जोतिबा या अम्बेडकर भर पर लागू होगा, इसके दायरे में श्वसनवेद, मांडूक्य और छान्दोग्य जैसे आधे से अधिक उपनिषद् और दो-ढाई के अलावा बाकी का षडदर्शन और सारे का सारा आधुनिक सृजन आयेगा। इनके पहले वाले पहले भी ऐसा कर चुके हैं, जिन्होंने बाकियों की तो छोडिये, ऋग्वेदिक देवताओं के गुरु वृहस्पति को भी नहीं बख्शा और उनका लिखा चिंदी-चिंदी बिखेर दिया। विदेशी गुलाम मानसिकता और विदेशी विचारों की घुसपैठ को खत्म करने की बात असल में कुछ हजार वर्षों में हासिल सभ्य समाज की स्थिति को उलटने की कोशिश है। यह बात कहाँ तक जायेगी, इसका संकेत स्वयं उन्होंने लोकतंत्र और संविधान को विदेशी बताकर जाहिर करा दिया है। लार्ड मैकाले के बहाने जो कहा गया और जिस महान भारतीय शिक्षा परम्परा की बहाली का संकेत दिया गया, वह कैसी थी, किनके लिए थी, कितनी थी, इसके उल्लेखों से ग्रन्थ के ग्रन्थ भरे हुए हैं। इस वर्णाश्रम आधारित शिक्षा की महानता दिखाने के लिए आईटी सैल के जरिये सन 1811 में साढ़े सात लाख गुरुकुलों के होने का बेबुनियाद दावा किया जाता है। मगर सचाई आंकड़ों से बयान होती है। आंकड़े ये बताते है कि 15 अगस्त 1947 को भारत की साक्षरता दर केवल 12% थी। 1951 में हुई पहली राष्ट्रीय जनगणना में साक्षरता दर 18.33% दर्ज की गई। महिला साक्षरता दर और भी कम, केवल 8% थी और हर तीन बच्चों में से केवल एक को ही प्राथमिक विद्यालय में नामांकन का अवसर मिलता था। उच्च स्तर की शिक्षा के हाल तो और भी खराब थे। 15 अगस्त 1947 को भारत में कुल 636 कॉलेज थे। विश्वविद्यालयों की संख्या को लेकर अलग-अलग स्रोतों में थोड़ी भिन्नता है, लेकिन तब भी यह संख्या 17 से 20 के बीच ही रहती है, जिनमें कुछ प्रमुख ब्रिटिश काल के दौरान स्थापित हुए थे। इनमें पढने वाले छात्र सिर्फ सवा दो लाख के करीब थे। यह आजादी के बाद – स्वतन्त्रता आन्दोलन में उठी मांगों और जनतांत्रिक हस्तक्षेप का नतीजा था कि 2011 की जनगणना में साक्षरता दर बढ़कर 74.04% हो गई है। वे क्या करना चाहते है, यह उस नई शिक्षा नीति से साफ़ दिखाई देता है, जिसे इनके राज में लाया गया है। डार्विन सहित वैज्ञानिकों का तिरस्कार, शिक्षा को अंधविश्वास से भरकर, फलित ज्योतिष से लेकर अच्छी पत्नी कैसे बनें, जैसे विषय और मनु का महात्म्य विषयों में जोड़कर अभी उसकी दिशा बदली जा रही है। सार्वजनिक खर्च को सिकोड़ कर उस तक पहुँच बाधित की जा रही है। विश्वविद्यालयों पर हर तरह के हमले किये जा रहे हैं : इनके चलते दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा संस्थानों की दुर्गत की खबरे सामने आने लगी हैं। लार्ड मैकाले उस जमाने के औपनिवेशिक प्रशासन को चलाने के लिए जिस तरह के प्रशिक्षित भारतीयों की आवश्यकता थी, उस तरह की शिक्षा प्रणाली लाये थे। मगर उसी शिक्षा को हासिल करने वालों ने दुनिया को देखना-समझना शुरू कर दिया। आधुनिकता का बोध और विश्लेषण का विवेक पाया। वे ही आगे चलकर उसी औपनिवेशिक सत्ता को खत्म करने वाली लड़ाई के नायकों में शामिल हुए। मोदी और उनका कुनबा उसे निशाने पर लेकर एक बार फिर भारत के अवाम को नागरिकता बोध से वंचित प्रजा में बदलना चाहते हैं। यह ध्वज उसी की शुरुआत का शंखनाद करता है। मानव समाज का इतिहास गवाह है कि इस तरह के ध्वज जब-जब उठे हैं, तब-तब मनुष्यता आगे की दिशा में नहीं बढ़ी, पीछे की ओर ही फिसली है। पता नहीं, मोदी और कुनबे को पता है कि नहीं पता कि धर्मध्वज का शाब्दिक अर्थ भी वही है, जो वे उसे उठाकर-दिखाकर कर रहे हैं। कोई 135 वर्ष पहले 1890 में भाषाविद वामन शिवराम आप्टे द्वारा रचे गए पहले संस्कृत–अंग्रेजी और उसके बाद संस्कृत-हिंदी के शब्दकोष में इसका अर्थ ‘धर्म के नाम पर पाखंड रचने वाला, छद्मवेशी’ बताया है। यही बात मोनियर विलियम्स के ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस द्वारा 1899 में प्रकाशित संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोष में भी दर्ज है, जिनके मुताबिक़ धर्मध्वज का अर्थ ‘दिखावा करने में सिद्धहस्त, पाखंडी और कपटी’ होता है। 25 नवम्बर को अयोध्या में यही हो रहा था – जबलपुर में उसके सार को अमल में लाया जा रहा था। वे जिस “गौरवशाली अतीत” की ओर वापस ले जाकर जिस “महान हिन्दू एकता” वाला राष्ट्र स्थापित करना चाहते हैं, उसका आधार खुद उनके मुताबिक़ मनुस्मृति पर आधारित सामाजिक ढांचा होगा। उन्हें उससे एक मिलीमीटर कम मंजूर नहीं है। मनुस्मृति क्या कहती है, यह दोहराने की आवश्यकता नहीं – हाल के दिनों में इसके बोलवचन चर्चाओं में आते रहे हैं : तब भी एक वाक्य में कहें, तो एक ऐसा समाज, जहां अधिकार वर्णों के आधार पर निर्धारित होंगे और नतीजे में सारी महिलायें और आबादी के विराट हिस्से अधिकारों से वंचित होंगे : उनके हिस्से में सिर्फ कर्तव्य आयेंगे। मोदी ने अपने पूरे भाषण में इसीलिए कहीं भी अधिकार का शब्द नहीं उच्चारा, जब भी बोला, कर्तव्य ही याद दिलाया। ऐसा समाज भारत देख चुका है और इसकी भारी कीमत अदा कर चुका है। साफ़ है कि इस बात का सीधे-सीधे इस्लाम या इसाइयत के साथ कोई संबंध नहीं है, असली एजेंडा तो समाज के उस हिस्से का पुनर्गठन है, जो मोटा-मोटी उस धार्मिक पहचान का है, जिसे ‘हिन्दू’ कहा जाता है। हिन्दू कहने में भी एक झोल है, इसलिए कुनबा इन दिनों उसकी जगह सनातनी कहने लगा है। अब इस बड़ी और आभासीय छतरी के नीचे खुद को खड़ा मानकर, जिन्हें जितने भी झांझ-मंजीरे बजाना हैं बजा लें, कितने भी त्रिपुंड लगाना हैं, लगा लें, रहना वहीँ हैं, जहां रहने की मनु महाराज ने कही है। धर्मध्वज लहराने वाले सबकी समानता, बराबरी, समता और नागरिकता को विदेशी अवधारणा पर आधारित गुलाम मानसिकता मानते हैं। उनके द्वारा स्थापित किये जाने वाले हिन्दू राष्ट्र में सारे हिन्दुओं के बराबर होने का मुगालता जिनने पाला है, वे जानें, कुनबे ने तो ऐसा कभी कहा नहीं । (लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 9425006716) View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन इंदौर में एमडी ड्रग्स की बड़ी खेप बरामद, 24 घंटे में तीन तस्कर गिरफ्तार नागरिक परिक्रमा