संकलन एवं आलेख-मुस्ताअली बोहराअधिवक्ता एवं लेखकभोपालइज्तेमा का नाम आते ही ज़हन में ऐसे लोगों का हुजुम कौंध जाता है जो तब्लीगी जमात से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। कोरोना काल के पहले ही कम ही लोगों को तब्लीगी जमात की मालूमात थी। लेकिन, दिल्ली में इज्तेमा और फिर कोरोना फैलाने के आरोपों के बाद तब्लीगी जमात की चर्चा देश भर में होने लगी। इतना ही इस जमात पर पाकिस्तान से लेकर सऊदी अरब तक चरमपंथ को फैलाने और आतंकियों को पनाह देने के आरोप भी लगे। तमाम आरोपों और विवादों के बावजूद तब्लीगी जमात आज भी अपने उसी काम में मशरूफ है जिसके लिए उसे जाना जाता है यानि मुसलमानों को पारंपरिक इस्लाम से जोड़ने का काम। तब्लीगी जमात की शुरुआत 1926-1927 में भारत के मेवात हुई थी। भारत के मेवात में देवबंदी इस्लामी विद्वान मौलाना मोहम्मद इलियास अल-कांधलवी ने की थी। इसका मकसद था मुसलमानों में इस्लामिक अकीदे को मजबूत करना, मुस्लिम समाज में प्रचारकों का समूह स्थापित करना जो मुसलमानों को इस्लाम की मूल बातों पर चलने और धार्मिक नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित करे। पूरी तरह से गैर-राजनीतिक इस जमात का मकसद पैगंबर मोहम्मद के बताए गए इस्लाम के बुनियादी अरकान (सिद्धातों) कलमा, सलात (पांच वक्त की नमाज), इल्म-ओ-जिक्र (मज़हबी बातें करना), इकराम-ए-मुस्लिम (मुसलमानों का सम्मान और एक दूसरे की मदद), इखलास-ए-नीयत (नीयत का साफ होना) और तफरीग-ए-वक्त या दावत-ओ-तबलीग (दावत और तब्लीग के लिए समय निकालना) का प्रचार करना है। दरअसल, मौलाना इलियास को ये महसूस हुआ कि कई मुसलमान इस्लामिक रीति-रिवाजों, परंपराओं का पालन सहीं ढंग से नहीं कर रहे हैं। लिहाजा, मुसलमानों को हिदायत देने, सीख देने की मंशा से तब्लीगी जमात की बुनियाद रखी गई। जमात के प्रचारक मुसलमानों से पैगंबर मोहम्मद साहब की तरह ज़िन्दगी गुजारने के लिए कहते हैं। वो मुसलमानों से पैगंबर की तरह कपड़े पहनने पर जोर देते हैं (पजामा या पेंट टखने से ऊपर होना चाहिए), पुरुष आमतौर पर अपने ऊपरी होंठ को शेव करें और लंबी दाढ़ी रखें। मोहम्मद इलियास कांधलवी ने मुसलमानों को सच्चे मुसलमान बनने, सही रास्ते की तरफ आने और बुराई से बचने के लिए कहा। तबलीगी जमात के लोग गैर मुसलमानों को इस्लाम अपनाने या इस्लाम के रीति-रिवाज अपनाने या मानने के लिए नहीं कहते बल्कि मुसलमानों को इस्लामिक तौर तरीके मानने और नबी साहब के बताए रास्ते पर चलने का कहते हैं। तब्लीगी जमात का कहना है कि पैगंबर मोहम्मद ने सभी मुसलमानों को अल्लाह का संदेश देने का आदेश दिया है और तब्लीगी इसे अपनी जिम्मेदारी मानते हैं। ब्रिटिश भारत में यह संगठन तेजी से विकसित हुआ। नवंबर 1941 में आयोजित इसके वार्षिक सम्मेलन में 25 हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए। विभाजन के बाद, पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान में बांग्लादेश) में भी तबलीग जमात का विस्तार हो गया। तब्लीगी जमात की सबसे बड़ी राष्ट्रीय शाखा बांग्लादेश में है। ये जमात दुनिया के 150 से भी ज्यादा देशों में मौजूद है। तब्लीगी जमात के प्रचारक खुद को छोटी-छोटी जमातों या गु्रप में बांट लेते हैं और मुस्लिम घरों या बस्तियों में मुसलमानों को इस्लामिक परंपराओं का पालन करने की समझाइश देते हैं, कुरान में लिखी बातें समझाकर कुरान की तिलावत करने, नबी मोहम्मद साहब की जिन्दगी को आदर्श बनाने और उनके बताए रास्तों पर चलने की समझाइश देते हैं। View this post on Instagram जमात से जुड़े लोग दुनिया भर में सफर करते रहते हैं। इस यात्रा के दौरान वे स्थानीय मस्जिदों में रुकते हैं। यहां बता दें कि उर्दू में इस्तेमाल होने वाले जमात शब्द का मतलब किसी एक खास मकसद से इकट्ठा होने वाले लोगों का समूह है। तब्लीगी जमात का सालाना जलसा इज्तेमा है। हर साल इस इज्तिमा का आयोजन देश के अलग-अलग हिस्सों में किया जाता है। तब्लीगी जमात के संदर्भ में ये माना जा सकता है कि ऐसे लोगों का समूह जो कुछ दिनों के लिए खुद को पूरी तरह तब्लीगी जमात को समर्पित कर देता है। तबलीगी जमात के मरकज से ही अलग-अलग हिस्सों के लिए तमाम जमातें निकलती है। तबलीग का काम करते समय जमात के सदस्यों को छोटे-छोटे समूहों में बांट दिया जाता है। इस दौरान जमात से जुड़े लोग वे मुस्लिम बाहुल्य बस्तियों, गांवों और शहरों में जाकर लोगों के बीच इस्लाम की बातें फैलाते हैं। जमात में आठ से दस लोग शामिल होते हैं, जमात में एक मुखिया होता है जिसको अमीर-ए-जमात कहा जाता है। जमात से लोग तयशुदा वक्त के लिए जुड़ते हैं। कोई तीन दिन के लिए, कोई दस दिन, कोई चालीस दिन, कोई चार महीने के लिए तो कोई साल भर के लिए शामिल जमात में शामिल होता है। ये तयशुदा वक्त खत्म होने के बाद अपने घर की ओर लौट जाते हैं। ये लोग तबलीग के अलावा अपना वक्त नमाज, कुरान की तिलावत, हदीस पढ़ने और अल्लाह के जिक्र में गुजारते हैं। हर दो साल में देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इज्तिमे का आयोजन किया जाता है जिसमें लाखों लोग जुटते हैं। उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर में भी इज्तिमे का आयोजन किया जाता है। तबलीग जमात की स्थापना की जरूरत क्यूं पड़ी इसके पीछे कुछेक वजह बताई जातीं हैं। तबलीग जमात की शुरूआत मुसलमानों को अपने मजहब से जोड़े रखने और पारंपरिक इस्लाम के प्रचार के लिए की गई। कुछ जानकारों का कहना है कि मिशनरी के प्रभाव और मुसलमानों के मिशनरी से जुड़ने के कारण तबलीग की नींव पड़ी। हरियाणा के मंेवात इलाके में मुसलमानों की बड़ी आबादी थी। 20वीं सदी में इस इलाके में मिशनरी में काम शुरू किया। तब बहुत से मेव मुसलमानों ने मिशनरी के काम से प्रभावित होकर इस्लाम छोड़ दिया। यहीं से इलियास कांधलवी को मेवाती मुसलमानों के बीच जाकर इस्लाम को मजबूत करने का ख्याल आया। उस समय तक वह सहारनपुर के मदरसा मजाहिरुल उलूम में पढ़ा रहे थे। वहां से पढ़ाना छोड़ दिया और मेव मुस्लिमों के बीच काम शुरू कर दिया। सन 1927 में तब्लीगी जमात की स्थापना की ताकि गांव-गांव जाकर लोगों के बीच इस्लाम की शिक्षा का प्रचार प्रसार किया जाए। दूसरी वजह, आर्य समाज के घर वापसी अभियान को बताया जाता है। एक दशक से भी अधिक समय से पहले नवंबर 1922 में तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा ने सुल्तान खलीफा महमद षष्ठ को हटा कर अब्दुल मजीद आफंदी को खलीफा बनाया। साथ ही उसके सारे राजनीतिक अधिकार खत्म कर दिए गए। तब मोहम्मद अली जिन्ना और गाँधीजी की खिलाफत कमेटी ने सन 1924 में विरोध प्रदर्शन के लिए एक प्रतिनिधिमंडल तुर्की भेजा। मुस्तफा कमाल ने इस प्रतिनिधि मंडल की अनदेखी की और मार्च 1924 को उन्होंने खलीफा का पद खत्म कर दिया। मुगल काल में कई लोगों ने इस्लाम कबूल कर लिया था लेकिन बाद में ये लोग वापस अपने पुराने धर्म में लौट रहे थे। ब्रिटिश काल के दौरान आर्य समाज की ओर से घर वापसी अभियान चलाया गया यानि जिन लोगों ने इस्लाम कुबूल कर लिया था उन्हें वापस हिन्दू बनाया जाने लगा। तब, मुसलमानों को अपने मजहब में बनाए रखने और उन्हें दीनी तालीम देने के मकसद से मौलाना इलियास कांधलवी ने इस्लाम की शिक्षा देने का काम शुरू किया। हरियाणा के नूंह से मौलाना इलियास ने इस काम की शुरूआत की थी। ये एक तरह का धार्मिक सुधार आंदोलन था जिसे अब तब्लीगी जमात के नाम से जाना जाता है। तबलीग जमात की मुहिम के तहत इससे जुड़े लोग या प्रचारक जगह-जगह इकट्ठा होकर इज्तिमा करने लगे। नमाज के साथ दुआ और दीन की बातें सिखाई जाने लगी। मुलसमानों को नबी साहब की जिन्दगी के बारे बताया जाने लगा। इस सब का असर ये हुआ कि लोगों का इस्लाम में अकीदा बना रहा। मुसलमानों में इस्लामिक परंपराओं और मूल इस्लामी प्रथाओं के प्रचार के लिए शुरू की गई तब्लीग जमात का विवादों और आरोपों से भी नाता रहा है। भारत में तब्लीग जमात उस वक्त चर्चा में आ गई जब कोरोना काल में जमातियों पर नियम तोड़ने के आरोप लगे। इसके अलावा सऊदी अरब ने आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाते हुए इस पर प्रतिबंध लगा दिया। बताया जाता है कि तब्लीगी जमात को कुछ मध्य एशियाई देशों जैसे उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और कजाकिस्तान में प्रतिबंधित कर दिया गया है। आलमी तबलीगी इज्तिमे में पाकिस्तान को शामिल नहीं किया गया। बांग्लादेश और पाकिस्तान के जमाती अलग-अलग इज्तिमा में भाग लेते हैं। सन 2021 में सउदी अरब ने तबलीगी जमात पर यह कहकर प्रतिबन्ध लगा दिया था कि वह आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। बहरहाल, तब्लीगी जमात पर आरोपों के बावजूद ना तो जमात का काम रूका और ना जमातियों के हौंसले कम हुए। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन आराध्या पोरवाल ने जीती जूनियर नेशनल स्क्वैश चैंपियनशिप-2025 महागठबंधन आगे, पर नतीजा अभी दूर है!