(आलेख : सुभाष गाताड़े, अनुवाद : संजय पराते)

हिंदू और मुस्लिम वर्चस्ववादियों के बीच ‘उद्देश्य की एकता’ देखी गई है, जो खुद को ‘अपने समुदाय’ का एकमात्र प्रवक्ता मानते हैं।¹

“धर्मनिष्ठ व्यक्ति मुझे काफ़िर समझता है, और काफ़िर सोचता है, (मैं) मुसलमान हूँ/ काफ़िर सोचता है कि मैं संत हूँ, और संत मुझे काफ़िर समझते हैं/ दोनों पक्षों की बात सुनकर, मैं चकित हूँ/ मैं वह विषय हूँ, जिसे समझना कठिन है/ अगर कोई समझने को इच्छुक हो, तो मैं आसान हूँ।”²

ऐसे बहुत कम मौके आते हैं, जब सरकारों से जुड़ी साहित्यिक अकादमियाँ भीड़ के दबाव में झुक जाती हैं। ऐसे मौके और भी कम आते हैं, जब वे उस कार्यक्रम को भी रद्द कर देते हैं, जिसका आयोजन उन्होंने बड़े धूमधाम से किया था।

पश्चिम बंगाल में ऐसा नजारा देखने को मिला, जब पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी ने एक कार्यक्रम को अचानक स्थगित कर दिया, जिसमें ‘भारतीय सिनेमा में उर्दू’ विषय पर चर्चा होनी थी और जो लगातार चार दिनों तक चलता रहता। इस कार्यक्रम में प्रमुख जीवित उर्दू कवियों में से एक जावेद अख्तर को भी मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था। इस घटना को घटे दस दिन से भी अधिक समय हो गया है।

कोलकाता के दो प्रमुख इस्लामिक संगठनों, जमीयत उलेमा-ए-हिंद और वाहियान फ़ाउंडेशन ने इस आमंत्रण का विरोध किया था, क्योंकि वे अख्तर के धर्म संबंधी विचारों को समस्याग्रस्त मानते थे और वे उन्हें “धर्म और ईश्वर के विरुद्ध बोलने वाला” मानते हैं।

अख्तर घोषित रूप से नास्तिक हैं और सार्वजनिक मंचों पर इसके बारे में खुलकर बोलते हैं, जिससे ये लोग नाराज़ हो गए हैं।

इन संगठनों ने यहां तक धमकी दी थी कि अगर सरकार उनकी माँग नहीं मानती है, तो वे वैसा ही राज्यव्यापी आंदोलन शुरू कर देंगे – जैसा बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन के खिलाफ किया गया था और जैसा कि सभी जानते हैं, इस आंदोलन के कारण उन्हें वर्ष 2007 में राज्य छोड़ना पड़ा था।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती थीं, क्योंकि राज्य विधानसभा के चुनाव अब ज़्यादा दूर नहीं हैं।

असीमित आक्रोश?

कार्यक्रम के अचानक स्थगित/रद्द होने से लेखकों, कार्यकर्ताओं और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़ी हस्तियों में आक्रोश की भावना पैदा हुई है। चिंतित नागरिकों ने इस ‘शर्मनाक’ कृत्य की निंदा की है और उर्दू अकादमी चलाने वाले ‘मूर्खों’ पर सवाल उठाए हैं, “जो इस भाषा की उत्पत्ति तक नहीं जानते या जो उर्दू को मुस्लिम पहचान से जोड़ने पर तुले हुए हैं।” राजनीतिक विकल्प को गढ़ने के लिए ‘आहत भावनाओं’ का यह हथियारीकरण भी विश्लेषकों की नज़रों में आया है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस पूरे तमाशे का स्पष्ट परिणाम यह है कि इसने धर्म और नैतिकता के इन स्वयंभू संरक्षकों की आवाज को केंद्र में ला दिया है, उनके संकीर्ण विश्व दृष्टिकोण को उजागर कर दिया है और यह प्रदर्शित कर दिया है कि वे उस दूसरे पक्ष के संरक्षकों का प्रतिरूप प्रतीत होते हैं, जो हास्य कलाकार कुणाल कामरा या मुनव्वर फारुकी से लेकर लोक गायिका नेहा राठौड़ या अकादमिक ‘मेडुसा’ आदि को निशाना बनाते हैं, क्योंकि वे उनके विचारों और उनके साहस और असम्मान को, जिसके वे वाहक हैं, समान रूप से आपत्तिजनक मानते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि अख्तर के कोलकाता कार्यक्रम के स्थगित/प्रभावी रूप से रद्द होने से चरम हिंदुत्ववादियों को बेहद खुशी हुई होगी।

इन लोगों के लिए भी अख्तर हिंदुत्व के मित्र नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने बार-बार इस धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के गौरवशाली इतिहास को त्यागकर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के उनके प्रयासों की आलोचना और निंदा की है।

एक ही पंख के पक्षी?

जैसा कि पुरानी कहावत है, ‘एक ही पंख के पक्षी एक साथ रहते हैं’, धार्मिक वर्चस्ववादियों के बीच भी इसी प्रकार की तनातनी देखने को मिलती है – भले ही वे एक-दूसरे के प्रति स्पष्ट विरोध रखते हों – विभिन्न अवसरों पर।

जैसा कि पुरानी कहावत है, ‘एक ही पंख के पक्षी एक साथ रहते हैं’, धार्मिक वर्चस्ववादियों के बीच भी कई मौकों पर एक-दूसरे के स्पष्ट विरोध के बावजूद, इसी तरह की एक अजीबोगरीब तनातनी देखने को मिलती है।

ऐसी ‘उद्देश्य की एकता’ विशेष रूप से तब देखने को मिलती है, जब राज्य ऐसे कानूनों का मसौदा तैयार करता है, जो किसी की आस्था को प्राथमिकता देने से इनकार करते हैं। ऐसे सभी कदम जो मूलतः धर्म को राजनीति से अलग करने को बढ़ावा देते हैं, उनके लिए अभिशाप हैं। चूँकि वे स्वयं को ‘अपने समुदाय’ का एकमात्र प्रवक्ता मानते हैं, इसलिए वे हमेशा आपत्तियाँ उठाने में सबसे आगे रहते हैं।

पंजाब सरकार जिस ‘ईशनिंदा विरोधी कानून’ को लागू करना चाहती है, उस पर चल रही बहस पर गौर कीजिए। जैसा कि हम जानते हैं, प्रस्तावित पंजाब पवित्र धर्मग्रंथों के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम विधेयक, 2025 (पीपीओएचएस अधिनियम) को हाल ही में राज्य विधानमंडल ने आगे की चर्चा के लिए एक समिति को भेज दिया है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 2015 में अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का बोलबाला था, जिनकी विश्वदृष्टि एक खास धर्म से जुड़ी थी। उन्होंने ईशनिंदा के खिलाफ ‘सख्त कानून’ बनाने की पहल की थी।

हमारे संविधान के विशेषज्ञों या हमारे संविधान की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को कायम रखने के इच्छुक लोगों/संस्थाओं ने ऐसे कदमों का – ‘ईशनिंदा कानून की तरह’ के क़दम का – कड़ा विरोध किया है, लेकिन न तो हिंदुत्व दक्षिणपंथियों ने और न ही मुस्लिम दक्षिणपंथियों ने इस कदम का विरोध करना आवश्यक समझा है।

इस कानून की सभी धर्मनिरपेक्ष आलोचनाएं उनके कानों को संगीत की तरह लगती है : जैसे कि इस कानून की यह आलोचना कि यह कानून राज्य को धर्म से और अधिक दूर करने के बजाय, यह कानून “सांप्रदायिकता की पकड़ को और मजबूत करेगा, तथा सभी पक्षों पर धार्मिक चरमपंथियों के हाथ मजबूत करेगा।”

इसी तरह, “अल्पसंख्यकों और कमज़ोर वर्गों के ख़िलाफ़, उन्हें परेशान करने, बदला लेने और व्यक्तिगत व व्यावसायिक झगड़ों को निपटाने के लिए — ये सभी मामले, जो ईशनिंदा से पूरी तरह असंबद्ध हैं”, जैसे शब्दों का दुरुपयोग उन्हें अटपटा नहीं लगता।

शायद, हम सर्वोच्च न्यायालय के 2013 के उस फ़ैसले को भी याद कर सकते हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति ए.पी. शाह की अगुआई में एक बेहद प्रगतिशील फ़ैसला दिया था और जिसने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को मूलतः पलट दिया था। याद करें कि इस दौरान कैसे दक्षिणपंथी लोगों ने और भगवा से लेकर हरे तक की विभिन्न विचारधाराओं के रूढ़िवादी तत्वों ने इस प्रगतिशील फ़ैसले का विरोध करने के लिए हाथ मिलाया था।

बाद में, जब सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को पुनः अपराध घोषित कर दिया, तो अनेक स्वयंभू धर्मगुरुओं और नैतिकता के पैरोकारों ने स्वयं को निर्दोष महसूस किया और यहां तक कि एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर भारतीय दंड संहिता की धारा 377 पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया, क्योंकि उनके अनुसार यह ‘न केवल इस देश की पूर्वी परंपराओं, नैतिक मूल्यों और धार्मिक शिक्षाओं के अनुरूप था, बल्कि यह पश्चिमी संस्कृति के आक्रमण और पारिवारिक व्यवस्था तथा सामाजिक जीवन के ताने-बाने के विघटन की आशंकाओं को भी दूर करता है। ये आशंकाएं 2009 के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश, जिसमें समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था, का अपरिहार्य परिणाम है।’ इस प्रकार, विभिन्न धर्मों के संतों द्वारा प्रदर्शित सौहार्द्र हम सबके लिए देखने लायक था।

किसी को आश्चर्य हो सकता है कि क्या उन्होंने कभी अपने अनुयायियों के लिए वास्तविक भौतिक सरोकार के किसी मुद्दे पर एक साथ आने की ऐसी ही उत्सुकता दिखाई हो, या जब सड़कों पर लोगों को ‘हम’ बनाम ‘वे’ के खेमों में बांटने वाली नफ़रत का प्रदर्शन हो रहा था।

यादों की राह पर सफ़र

यह प्रसंग 80 साल पहले के उस दौर की याद दिलाता है, जब भारत अभी भी ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के अधीन था और शारदा अधिनियम लागू करने की बात चल रही थी, जिसके तहत 14 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी पर रोक लगा दी गई थी। आज बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि इस अधिनियम को लागू करने की शुरुआती प्रेरणा फुलमोनी नामक एक बाल-वधू की मृत्यु पर मुखर तबकों द्वारा महसूस की गई घृणा से आई थी, जिसकी शादी अपने से कहीं ज़्यादा उम्र के व्यक्ति के साथ कर दी गई थी। तब ‘पवित्र’ और ‘दोनों धर्मों के पवित्र’, यानी हिंदू और मुसलमान, एकजुट होकर यह घोषणा करने आए थे कि वे ‘अपनी गहरी आस्थाओं और अपने सबसे प्रिय अधिकारों पर इस तरह का आघात’ नहीं होने देंगे।

यहाँ जवाहरलाल नेहरू द्वारा इस विषय पर लिखे गए लेख को याद करना समीचीन होगा, जो मॉडर्न रिव्यू (दिसंबर 1935) में प्रकाशित हुआ था।

‘कुछ साल पहले मैं बनारस में था… हमने ब्राह्मणों को दाढ़ी वाले मौलवियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मार्च करते देखा… और विजय पताकाओं में से एक दैदीप्यमान झंडे पर लिखा हुआ00000था, ‘हिंदू-मुस्लिम एकता की जय’। यह शारदा अधिनियम के विरुद्ध दोनों धर्मों के कट्टरपंथियों का संयुक्त विरोध था।

वह आगे कहते हैं:

‘हम पर आपत्तिजनक नारे लगाए गए और कुछ धक्का-मुक्की भी हुई। तभी जुलूस टाउन हॉल पहुँचा और इस या उस कारण से पत्थरबाज़ी शुरू हो गई। तभी एक होशियार युवक ने कुछ पटाखे फोड़े और इसका रूढ़िवादी लोगों की कतारों पर असाधारण प्रभाव पड़ा। ज़ाहिर है, यह सोचकर कि पुलिस या सेना ने गोलियाँ चलाई हैं, वे तितर-बितर हो गए और असाधारण तेज़ी से वे भाग गए। कुछ पटाखे जुलूस को भगाने के लिए काफ़ी थे…’। [सामाजिक एवं धार्मिक सुधार, अमिय पी. सेन, ओयूपी, पृष्ठ 118 में उद्धृत]

नेहरू पश्चिम में शिक्षित उदारवादियों द्वारा इस उद्यम का समर्थन करने की अनिच्छा और सामाजिक सुधार के मुद्दे पर उनके दृष्टिकोण पर भी ध्यान देते हैं। इस संदर्भ में, वे इस्लाम की एकजुटता के नेता सर मुहम्मद इकबाल को उद्धृत करते हैं, जो रूढ़िवादी हिंदुओं से पूरी तरह सहमत थे: ‘मैं नए संविधान में समाज सुधारकों से सुरक्षा की रूढ़िवादी हिंदुओं की माँग की बहुत सराहना करता हूँ। वास्तव में, यह माँग सबसे पहले मुसलमानों द्वारा की जानी चाहिए थी।’ (वही).

संदर्भ-स्रोत :

  1. [https://www.newsclick.in/rightwing-rightwing-bhai-bhai-who-fears-javed-akhtar]
  2. [https://www.editorji.com/entertainment-news/javed-akhtars-couplet-cause…]

(सुभाष गाताडे दलित आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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