1. फूल तो बरसाने दो यारो

मोदी विरोधियो तुम और कितना गिरोगे। मोदी का विरोध करते–करते‚ कभी देश का, तो कभी धर्म का विरोध करने लगने की बात पुरानी पड़ गई। अब तो पट्ठे मोदी जी के विरोध के चक्कर में फूलों का विरोध करने तक चले गए हैं। ऐसे शोर मचा रहे हैं जैसे मोदी जी के रोड शो में फूल बरसाने के लिए कर्नल सोफिया कुरैशी के परिजनों को बुलावा देकर सरकार ने कोई भारी गुनाह कर दिया हो। बात हो रही है फूल बरसाने की और भाई लोग शोर मचा रहे हैं‚ सेना के अपमान का। सेना से जुड़े लोगों से फूल बरसवाना‚ सेना का अपमान भला कैसे हो गयाॽ

राजा की सवारी निकलती है‚ तो उसका स्वागत करना प्रजा का धर्म है। और फूल बरसा कर स्वागत करना पुरानी भारतीय परंपरा है। सिर्फ पुरानी ही नहीं‚ देवताओं द्वारा भी बाकायदा अनुमोदित परंपरा है। खुश होकर देवता लोग जब–तब स्वर्ग से क्या बरसाते हैं – फूल। फिर पब्लिक को रोज–रोज राजा जी की सवारी पर फूल बरसाने का मौका थोड़े ही मिलता है। और ऑपरेशन सिंदूर नाम भले ही हो‚ पर था तो युद्ध अभियान। राजा जी युद्ध अभियान में जीत कर आएं‚ तब तो प्रजा का डबल–डबल फूल बरसाना बनता है। इसमें किसी कर्नल सोफिया कुरैशी को आड़े नहीं आना चाहिए। तब तो और भी नहीं, जब उसके नाम में कुरैशी लगा हुआ हो।
आतंकवादियों की बहन मान लिए जाने का खतरा हमेशा सिर पर मंडराता रहता है। रही बात सोफिया कुरैशी के परिवार के एक फौजी परिवार होने की तो‚ फौजी परिवार भी तो प्रजा का ही हिस्सा हैं‚ बल्कि फौजी अभियान के बाद फूल बरसवाने में फौजियों और फौजी परिवारों को तो सबसे आगे रहना चाहिए। खबरिया चैनलों पर‚ युद्ध तो युद्ध, शांति के समय में भी‚ गला फाड़ कर चिल्लाने के लिए जब सेना से जुड़े लोगों को विशेषज्ञ कह कर बुलाया जाता है‚ तब तो कोई नहीं कहता है कि सेना का अपमान हो गया। फिर सोफिया कुरैशी के परिवार के सौ–दो सौ ग्राम फूल बरसाने से सेना का अपमान कैसे हो जाएगाॽ
वैसे भी कौन-सा किसी को पकड़ कर जबर्दस्ती फूलों की बारिश कराई गई है। और यह कौन बोला कि रोडशो में फूल बरसवाना फूलों का अपमान है। फूलों की तो सार्थकता ही राजा जी के मुकुट में सजने में है। सो‚ फूल तो बरसाने दो यारो‚ वह भी टनों के हिसाब से।


2. सौदा है सौदा

हम तो पहले ही कह रहे थे कि ट्रम्प वाले मामले में मोदी जी एक्स-वाली पालिसी ही सही थी। अगला कुछ भी बोलता रहे, आप कुछ बोलो ही मत। बस चुप रहो। गलत थोड़े ही कहते हैं कि एक चुप, हजार बोलतों को हराए। एक बोलते को हराने में एक चुप को क्या टैम लगना था? मगर भक्त लोग नहीं माने, नहीं समझे। मोदी जी की जय-जय तो करते रहे, पर उनकी पालिसी नहीं मानी। उल्टे मोदी जी के ही पीछे पड़ गए कि ट्रम्प बार-बार बोल रहा है कि वॉर रुकवाने वाला पॉ पॉ तो वही है। भारत और पाकिस्तान के बीच ताजा वॉर उसी ने रुकवाई है। और वह भी तगड़ा बिजनस देने के वादे के बदले में। यह भारत तो भारत, मोदी जी का भी अपमान है। सब सच-सच बोलकर मोदी जी उसका मुंह बंद क्यों नहीं करा देते?

मोदी जी ने फिर भी ट्रम्प के मामले में मुंह नहीं खोला, तो भी विरोधियों तो विरोधियों, भक्तों तक के मुंह बंद नहीं हुए। हार कर मोदी जी को ही मंझले सरकारी अफसरों को ट्रम्प की बात काटने के लिए प्रेस वार्ताओं में उतारना पड़ा। पर इससे बात बनने की जगह और बिगड़ गयी। इधर सरकारी अफसर खंडन करें और उधर ट्रम्प पहले से भी ज्यादा जोर से, अपने वार रुकवाने वाला पॉ पॉ होने का दावा दोहराए। और सातवीं-आठवीं बार दावा करने के बाद भी, जब इधर से मंझले सरकारी अफसरों ने नो नो करना बंद नहीं किया, तो ट्रम्प ने चिढक़र अपना ब्रह्मास्त्र चला दिया। बाकायदा अदालत में एक बयान में लिखित रूप में यह दावा दोहराया दिया गया कि ना मोदी, ना कोई और, दुनिया में आज अगर कोई वॉर रुकवाने वाला पॉ पॉ है, तो ट्रम्प है। अमरीकी ही सही, पर बात अब कोर्ट-कचहरी तक पहुंच गयी है। अब हमारे बिचले दर्जे के अफसरों की ना-ना को भला कौन सुनेगा? और मोदी जी ट्रम्प के जवाब में कुछ भी नहीं बोलने की अपनी पालिसी बदलेंगे नहीं।

वैसे हम तो कहते हैं कि यह झगड़ा सिरे से ही गलत है। विपक्षी खामखां में डियर फ्रेंड के खिलाफ मोदी जी को उकसा रहे हैं और मोदी जी उसकावे में नहीं भी आएं तब भी, आमने-सामने से नहीं, तो दाएं-बाएं से सही, फ्रेंडशिप में तो विरोधी खटास डाल ही रहे हैं। वर्ना इस बार वॉर रुकवाने वाला पॉ पॉ ट्रम्प बन भी जाए, तो इसमें हमें कोई आफत तो आ नहीं जाएगी। आखिर, फ्रेंड ही फ्रेंड की लड़ाइयां छुड़वाता है। वैसे भी मोदी जी ने ऑपरेशन सिंदूर का नामकरण किया था, वह खुद इस वार को रुकवाते भी तो कैसे? इंडियन पब्लिक क्या कहती? बिहार के चुनाव में और उसके आगे बंगाल, असम आदि-आदि के चुनावों में क्या होता?

रही बात ट्रम्प के धंधे का लालच देकर लड़ाई रुकवाने की, तो इस पर हुज्जत करना तो और भी बेतुकी बात है। विरोधी क्या कहना चाहते हैं — ट्रम्प के बड़े सौदों के वादे के बिना ही भारत को लड़ाई रोकने के लिए राजी हो जाना चाहिए था? क्या वाकई? मुफ्त में ही? अगर लड़ाई यूं ही सेंत-मेंत में रुक जाती, तो हम किस मुंह से सिंदूर की कीमत की बात करते? वैसे भी जब सिंदूर की कीमत बताने और दिखाने की बात आ गयी, तो सौदा तो खुद-ब-खुद आ ही जाएगा। फिर मोदी जी ने सिंदूर तो अपनी नसों में अब दौड़ाया है, अपनी नसों में व्यापार दौड़ रहा होने की ब्लड रिपोर्ट तो उन्होंने गद्दी पर बैठते ही दे दी थी। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सौदा है, सवाल यह होना चाहिए कि सौदे में क्या-क्या है? सिर्फ राष्ट्र सेठ की मुकद्दमे से छुट्टी या कुछ और भी।


3. पॉ पॉ वही जो वॉर रुकवाए

ट्रंप जी की ये वाली बात सही नहीं है। कह रहे हैं कि वॉर रुकवा दी। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच वॉर रुकवा दी। एक बार नहीं‚ बार–बार कह रहे हैं ; अब तक एक दर्जन बार तो कह ही चुके हैं कि हिन्दुस्तान–पाकिस्तान की वॉर रुकवा दी। यानी अब तो उन्हें पॉ पॉ मानना ही पड़ेगा। सिंपल है – पॉ पॉ वही जो वॉर रुकवाए!

पर हम हिन्दुस्तान वाले भी इतनी आसानी से ट्रंप जी को पॉ पॉ कबूल करने को तैयार नहीं हैं। पाकिस्तान वाले चाहें तो कबूल कर लें‚ पर हम हिन्दुस्तान वाले पॉ पॅा कबूल करने को तैयार नहीं हैं। फिर चाहे इसके लिए हमें ट्रंप जी के वॉर रुकवाने से ही इंकार क्यों न करना पड़ेॽ माना कि सबसे पहले ट्रंप जी ने ही वॉर रुकने का ऐलान किया था ; अचानक वॉर रुकने का ऐलान किया था ; उनके पीछे–पीछे भारत और पाकिस्तान ने भी वॉर रुकने का ऐलान किया था। फिर भी हम ट्रंप जी को सिर्फ इसलिए पॉ पॉ नहीं मानने वाले कि उन्होंने वॉर रुकवा दी। मान ही नहीं सकते।

हमारे पास पहले ही एक ठो पॉ पॉ हैं। हमारे यहां पॉ पॉ की कोई वेकेंसी ही नहीं है। बल्कि हम तो यह भी नहीं मानते हैं कि ट्रंप जी ने वॉर रुकवा दी। बल्कि वॉर रुकी ही कहां हैॽ सुना नहीं मोदी जी ने क्या कहा ; ऑपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं हुआ है। ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ पॉज हुआ है। अब कुछ खत्म नहीं होगा‚ ज्यादा से ज्यादा पॉज होगा; यही नया नॉर्मल है। जब चुनाव मोड कभी खत्म नहीं होता‚ उसमें सिर्फ पॉज होता है‚ तो मोदी जी की वॉर ही कैसे रुक जाएगीॽ वॉर पॉज कराने के लिए ट्रंप जी अंकल तो फिर भी बन सकते हैं‚ पर पॉ पॉ नहीं। क्योंकि पॉ पॉ तो वही, जो वॉर रुकवाए!

हम तो कहेंगे कि पॉ पॉ कहलाने और वॉर रुकवाने में सीधा कनैक्शन ढूंढना ही गलत है। वह कनैक्शन तो सिर्फ मोदी जी के लिए था और वह भी यूक्रेन–रूस वॉर रुकवाने के मामले में। वह वॉर भी नहीं रुकी‚ पर मोदी जी पॉ पॉ जरूर हो गए। सो‚ वॉर कोई भी रुकवाए‚ पॉ पॉ मोदी जी ही रहेंगे। पर ट्रंप जी को यह बात कौन समझाएॽ उनने तो एक ही रट लगा रखी है–पॉ पॅा वही जो वार रुकवाए!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।)

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