(आलेख : बादल सरोज)

रंगों के त्यौहार होली को इस बार जितना बेरंग और बदरंग किया गया, वैसा पिछले 70 सालों की तो छोड़िए, इस पर्व के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। हमेशा की तरह लोकरंग की फाग में पगी हिलोरों की फुहार आने की बजाय होली के आने के दो दिन पहले से ही तनाव की गरम लू के थपेड़े देश की एकता को झुलसाने लगे। मस्जिदें कहीं पीले तो कहीं हरे और नीले तिरपालों से ढांपी जाने लगी। शुरुआत संभल से हुई, लेकिन सिर्फ वहीँ तक ही संभली नहीं रही ; बात शाहजहांपुर, मुरादाबाद से होते हुए उत्तर प्रदेश के बाकी जिलों तक भी पहुंची और मस्ती और आल्हाद का उत्सव ढंकी-ढंपी इबादतगाहों के अंधेरों से घिर गया। किसी की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ? क्या अचानक मुसलमानों को होली के त्यौहार और रंग से वितृष्णा हो गयी, और जैसा कि बताया गया, उन्हें लगने लगा कि रमजान का महीना चल रहा है और उस रोज जुमा भी है और ऐसे में कहीं रंग की एकाध बूँद भी अगर पड़ गयी, तो मस्जिदें नापाक हो जायेंगी और इस फ़िक्र में उन्होंने खुद तिरपाल तान कर उन्हें ढांक दिया? नहीं!! ऐसी कोई मांग किसी इंतजामिया कमेटी की तरफ से नहीं उठाई गयी, ऐसा कोई सार्वजनिक दावा इन्हें ढँकवाने का कारनामा कर दिखाने वालों ने भी नहीं किया। संभल की कोई 500 साल पुरानी जामा मस्जिद से शुरू हुआ भारत की साझी और समृद्ध विरासत का तिरपालीकरण पूरे यूपी में जहां भी हुआ, वहां मस्जिदों या मुसलमानों की मांग पर या उनकी मर्जी से नहीं हुआ। इस बारे में मीडिया ने जो झूठ और अर्धसत्य फैलाया, वह भी उसी योजना का हिस्सा था, जिसकी असलियत खुद जागरण में छपी खबर ने उजागर कर दी। सांप्रदायिक हिंदुत्व के सबसे उग्र पैरोकार और प्रचारक इस अखबार ने छापा कि “मस्जिदों को तिरपाल ओढ़ाने के लिए पुलिस और प्रशासन ने कहा था और यह काम पुलिस की निगरानी और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में अंजाम दिया गया।“

जो हुआ, वह न तो स्वतःस्फूर्त था न अचानक ही हुआ था। पूरी तरह से योजनाबद्ध था। इसके लिए पहले फिज़ा बिगाड़ कर माहौल गर्माया गया। संभल का चीफ पुलिस वाला बोला कि ‘जुमे तो साल में 52 बार आते हैं, होली तो एक बार आती है।’ बयान का इरादा साफ़ था और उसे उसी तरह हवा और तवज्जोह भी दी गयी। इरादा जुमे की नमाज और होली को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने का था और इस तरह यह आभास देने का था कि जैसे मुसलमान होली के विरुद्ध हैं और इतने कट्टर हैं कि अपने जुमे के फितूर में हिन्दुओं के त्यौहार को भी नहीं मनने देना चाहते। कहा जाने लगा कि हर जुमे के दिन मस्जिद जाकर नमाज़ अदा करना जरूरी है क्या? जुहर की 12 रकात की नमाज़ घर में भी तो पढ़ी जा सकती है, वगैरा-वगैरा से शुरू हुआ बयानों का आक्रमण मंत्रियों के और उग्र होते वक्तव्यों तक गया। इसे उग्र से उग्रतर, असभ्य से असभ्यतम बनाते हुए यूपी के दो-दो मंत्रियों ने यूपी के ही नागरिकों के एक बड़े हिस्से को ‘सफ़ेद टोपी’ वाला बताते हुए उन्हें ‘तिरपाल का हिजाब और नकाब पहनने’ की सलाह तक दे डाली। और फिर ‘जिनपे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे’ के अंदाज में, खुद जिन पर कानून व्यवस्था बनाए रखने का जिम्मा था, वे मुख्यमंत्री योगी कूद पड़े। उकसावे वाला गैर जरूरी बयान देने वाले पुलिस अफसर को डांटने-फटकारने की बजाय वे उसे पुचकारते हुए उसकी पहलवानी का बखान करने तक आ गए। गोरखपुर पहुँचते-पहुँचते तो उन्होंने ‘बटेंगे तो कटेंगे’ और ’80 बनाम 20′ के जुमलों की जुगाली शुरू कर दी। इन सब बकवासों को रोकने और देश को आश्वस्त करने के लिए जिन्हें हस्तक्षेप करना था, वे इस बारे में कुछ भी बोलने की बजाय टैरिफ पर धमकाने वाले राष्ट्रपति ट्रम्प की तारीफ़ में सवा तीन घंटे की विरुदावली का पॉडकास्ट रिकॉर्ड करवाते रहे।

अव्वल तो ये कि यह पहली बार नहीं हुआ था कि होली और रमज़ान एक ही महीने में पड़े हों, ऐसा भी नहीं है कि इन दोनों के बीच तनाव या टकराव की कोई परम्परा रही हो। हाँ, इसका उलटा जरूर रहा है। सल्तनत से लेकर मुगलों तक का इतिहास ऐसी होलियों के वृतांतों से भरा पड़ा है, जिन्हें इस्लाम में विश्वास करने वाले बादशाहों ने खुद भी मनाया और अपने साम्राज्य में भी मनवाया। हर कालखंड का साहित्य भरा पड़ा है ऐसे गीतों से, जिनमें होली हरियाई हुई है और ये होरी गीत, कवितायें रचने वालों में सिर्फ आगरे वाले नज़ीर अकबराबादी, बृज वाले रसखान या अवध से विदर्भ तक के सूफी संत और औलिया भर नहीं है, लगभग हर वह शायर, कवि शुमार है, जो धर्म और आस्था के हिसाब से हिन्दू नहीं था। फिर इस हंगामे की वजह क्या थी? वजह वही थी, जो इन दिनों सत्ता पर काबिज गिरोह का एकमात्र मकसद है : भारत को बांटना और हिन्दू और मुसलमान के बीच में भेद-विभेद को बढ़ाना। उनके सदियों पुराने अपनापे को कमजोर करना, हजारों साल पुरानी साझी रवायत पर ठंडा पानी उड़ेलना और अपने ही देश के एक धार्मिक समुदाय के प्रति लोगों में अविश्वास, दुराव और कटुता पैदा करना। यह पूरा होली कांड उसी स्क्रिप्ट के मुताबिक़ गढ़ा भी गया और अमल में भी उतारा गया। मस्जिदें तिरपाल से ढँकवाने वाले भी वही थे और “देखो हमारे त्यौहार पर इनने कैसे अपनी मस्जिदें ढांप ली” का शोर मचाकर पीड़ितों को ही अपराधी बनाने वाले भी वही लोग थे। इस तरह एक समुदाय को दूसरे समुदाय के सामने असहिष्णु ठहराकर उन्हें खलनायक साबित किया जा रहा था।

नीयत मुस्लिम समुदाय को साझे जनजीवन के दायरों से बाहर खदेड़ना था। इस मुहिम में यह काम भी पूरी योजना के साथ किया गया। आमतौर से होली की शुरुआत आठ दिन पहले डांड़ा गाड़ने – जिस जगह होली जलाई जानी है, उस स्थान पर अरंडी के पेड़ की एक टहनी रोप कर होलाष्टक बनाने – से की जाती है, उसके बाद पखवाड़े भर गाँव-बस्ती के लोग उसे कंडों, उपलों, सूखी-गीली लकड़ियों और दीगर जलाऊ सामग्रियों से भरते जाते हैं। इस बार इस कुनबे ने यह काम थोड़ा पहले से शुरू कर दिया। अरंडी की टहनी के डांड़े की जगह कोई सवा तीन सौ पहले फौत हो गए औरंगजेब को लाकर पधरा दिया। वैसे हिन्दू कर्मकांड की परम्पराओं में पितरों को पितृ-पक्ष में याद किये जाने का रिवाज है, लेकिन भाई लोगों ने औरंगजेब को माघ और फागुन में ही स्मरण करना प्रारम्भ कर दिया। उसे उसके जीते जी भी जितना याद नहीं किया गया होगा, उससे भी ज्यादा लगाव के साथ भक्त लोग उसकी तस्वीरें उठाये औरंगजेबियापा मचाये देश भर में घूमने लगे। उसे इतनी शिद्दत के साथ याद करने लगे कि कृपणता की हद तक की अपनी किफायतों के लिए जाना जानेवाला औरंगजेब यदि इनकी कातर पुकार पर फिर जीवित हो गया होता, तो इन बटुकों पर इतनी अशर्फियाँ और खिलअतें लुटाता कि इतिहास में दर्ज उसकी कंजूसी का जिक्र ही पुराना पड़ जाता।

अचानक से औरंगजेब कहाँ से आ टपके? औरंगजेब तो इस कुनबे का ताजा बहाना है, असली काम तो देश के भीतर रार मचाना है और उसे टकराव तक पहुंचाना है, ताकि देश और बाहर शर्मसार कर देने वाली जिस तरह की दुविधाओं और जटिलताओं में भारत को फंसा दिया गया है, उसकी तरफ लोगों का ध्यान ही न जा सके। लोग सवाल करना तो दूर, उस बारे में विचार ही न कर सकें। लोग उलझ जाएँ और अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की घुड़कियों से डरे सहमे मोदी द्वारा टैरिफ एकदम घटा कर कुछ मामलों में लगभग जीरो पर लाने के शर्मनाक समर्पण और इस तरह देश के उद्योग-धंधों, खेती-किसानी और रोजगार का भट्टा बिठाने के आत्मघाती अपकर्म की बजाय औरंगजेब के कर्मों की कल्पित गाथाओं में विचरण करते रहें। संघ-आरएसएस – के चहेते देश के वाणिज्य मंत्री के अमरीका के लिए बाजार खोजने वाले में बदल जाने के बयान पर गुस्सा होना भूल जायें और भारत की विदेश नीति और निर्यात सम्भावनाओं की खुदती कब्र पर क्षुब्ध और आक्रोशित होने की बजाय औरंगजेब की 317 वर्ष पुरानी कब्र खोदे जाने के इन फर्जी राष्ट्रभक्तों के पराक्रम पर पुलकित होते रहें। उन्माद इस कदर बढ़ा दिया जाए कि दुनिया के सबसे विवादित और संदेहास्पद चरित्र वाले मूल्यविहीन धनपिशाच एलन मस्क का भारत के इन्टरनेट पर कब्जा कराने वाले करार और उसका जूनियर पार्टनर बनने के लिए अम्बानी और एयरटेल के तैयार होने पर ध्यान ही न जाए, इन्टरनेट उपभोक्ताओं के दुनिया के सबसे बड़े बाजार भारत और उसकी सुरक्षा पर पड़ने वाले उसके खतरनाक प्रभावों के बारे में सोचा ही न जा सके। होली पर जुमा और जुमे पर मस्जिदों पर तिरपाल इसलिए चढ़ाए जा रहे हैं, ताकि शेयर मार्किट के भरभराकर गिरने से उठी कई लाख करोड़ रुपयों की बर्बादी की धूल छुपाई जा सके। जिन मंझोले और छोटे निवेशकों का दिवाला पिटा है, उन्हें हिंदुत्व के इस ताजातरीन शौर्य के झुनझुने से बहलाया जा सके।

जो हो रहा है और हर गुजरते दिन के साथ जिस रफ़्तार से तेज हो रहा है, वह चंद मुगालते पालने से थमने या अपने आप रुकने वाला नहीं है। तिरपाल और त्रिशूलों के बीच होली के त्यौहार के शांतिपूर्वक गुजर जाने के बाद कुछ सदाशयी इंसानों द्वारा ली गयी राहत की साँस अच्छी बात है। कोई बड़ा अघट नहीं घटा, जैसा तूमार खड़ा किया गया था, उससे जैसी आशंकाएं उपजी थीं, वैसा कुछ नहीं हुआ, इस पर सुकून का इजहार अच्छी बात है। मगर इसे जरूरत से ज्यादा पढ़कर आश्वस्त हो जाना एक मुगालता पालना है। साम्प्रदायिकता के दिल-दिमाग में हावी होने, सोच-विचार का तरीका बन जाने के लिए हिंसा या दंगों का होना अनिवार्य नहीं है। यदि जिस स्तर और तीव्रता का विरोध जरूरी है, उसे न किया जाये, तो यह कुत्सित विचार दीमक की तरह फैलता है और सब कुछ हड़प कर लेता है। होली और जुमे को लेकर नागपुर हैडक्वार्टर वालों द्वारा खड़ी की गयी वितंडा औरंगजेब के बहाने नए आयाम तलाशते-तलाशते नागपुर पहुँच चुकी है। नित नए मुद्दे उछाले जा रहे हैं ; इधर केदारनाथ की भाजपा विधायिका ने केदारनाथ और चार धाम की यात्रा के पूरे रूट से “गैर-हिंदुओं” को हटाने का फतवा जारी कर दिया है। उधर भाजपा के ही एक और विधायक कब्रों के औचित्य पर ही सवाल उठा रहे हैं। मतलब यह कि बात सिर्फ औरंगजेब की कब्र की नहीं है, दूर तलक सारी कब्रों तक जानी है। जो धोखाधड़ी वक्फ बोर्ड ख़त्म करने के बहाने शुरू की गयी है, वह अब कब्रिस्तानों की जमीनों तक जानी है। संभल के एक हजार साल से लग रहे मेले पर प्रतिबन्ध के बाद न जाने कितने मेले निशाने पर आयेंगे और उनके बहाने ‘हिंदू’ जगाये जायेंगे।

जब खतरे वास्तविक होते हैं, तो उनसे मुकाबला भी उन्हीं के मैदान में जाकर सचमुच के संघर्षों में करना होता है। इस देश की जनता ने ऐसा किया है और उसी किये के चलते यह देश अब तक अंधेरों की गर्त में गुम होने से बचा है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक ऐसी तैय्यारियाँ शुरू होने की खबरें आने लगी हैं। देश के मजदूरों ने कॉरपोरेट और फासीवाद के देसी संस्करण हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकता के गंठजोड़ के खिलाफ नया मोर्चा खोला है, जिसकी परिणिति 20 मई की देशव्यापी आम हड़ताल में होगी। किसान संगठन और उनके सभी साझे मोर्चे इसे गाँव-गांव तक अमल में लायेंगे। अगले पखवाड़े मदुरै में होने वाला सीपीएम का राष्ट्रीय महाधिवेशन – पार्टी कांग्रेस – राजनीतिक मंच पर इसे सुद्रढ़ बनाने के रास्ते तलाशेगा। कुल जमा यह कि भारत दैट इज इंडिया को भारत बनाये रखने के लिए मेहनतकश और जागरूक भारतीय लड़ेंगे और जैसा कि इतिहास है, जब लड़ेंगे तो यकीनन जीतेंगे।

(लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94242-31650)

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