भोपाल– मुस्ताअली बोहरा अधिवक्ता एवं लेखक ।। कभी भगवान की तरह पूजे जाने वाले आसाराम बापू फिलहाल 31 मार्च तक अंतरिम जमानत पर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत दी है। इधर, डिस्कवरी चैनल की कल्ट ऑफ फियर-आसाराम बापू के नाम से डॉक्यूमेंट्री आने के बाद चैनल और उसमें काम करने वाले लोगों को निशाने पर लिया जाने लगा है। डिस्कवरी कम्युनिकेशंस ने अपने कर्मचारियों को दी जा रही धमकियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिका में कहा गया है कि 29 जनवरी को इस डॉक्यूमेंट्री सीरीज के जारी होने के बाद से लगातार डिस्कवरी के अधिकारियों और कर्मचारियों को धमकी मिल रही है। कुछ जगह पर उसके दफ्तरों के बाहर आसाराम बापू के समर्थकों की भीड़ भी जमा हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को सुनते हुए केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों को डिस्कवरी से जुड़े लोगों की सुरक्षा का निर्देश दिया। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि आसाराम बापू पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री, जो बलात्कार के मामलों में जीवन भर की सजा काट रहे हैं, सार्वजनिक रिकॉर्ड, अदालत के आदेशों और गवाहों के बयान पर आधारित थी। इस डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण के बाद से कर्मचारियों को धमकियां दी जा रहीं हैं। इस मामले की गंभीरता को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अभी अंतरिम पुलिस सुरक्षा का आदेश तो दे दिया है लेकिन इस मामले ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। सबसे अहम बात तो ये है कि यूं तो कभी कोई नियम-कानून के दायरे में रहकर भी सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट कर देता है तो उस पर मुकदमा दर्ज कर लिया जाता है लेकिन जब न्यायालय द्वारा आरोपी को सजा दे दी जाती है और उस पर लगा आरोप सिद्ध हो जाता है, तब ऐसे बलात्कारी पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री के खिलाफ कैंपेन पर कोई भी कार्यवाही क्यों नहीं की जाती। डिस्कवरी के अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ धमकी और हेट कैंपेन के खिलाफ सरकार की चुप्पी क्यों है। पाठकों को याद होगा जब नरेन्द्र मोदी के खिलाफ या योगी आदित्यनाथ के खिलाफ सोशल मीडिया पर लोकतांत्रिक दायरे में रहकर की गई टिप्पणीयों पर भी संबंधित लोगों को हिरासत में ले लिया गया था। दूसरी तरफ, हेट कैंपेन चलाने वाले लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। तो क्या इसे सरकार की एकतरफा नीति माना जाए। क्या ये माना जाए कि जो लोग सरकार से सवाल करते हैं या चुनौती देते हैं उनके खिलाफ ही कानूनी कार्रवाई होती है? बतौर उदाहरण, यति नरसिम्हानंद पर कानूनी रूप से कोई कार्यवाही नहीं की गई जिन्होंने उत्तराखंड के एक समारोह में मुस्लिमों के खिलाफ सीधे हमले के तैयारी की बात कही थी। उन लोगों के खिलाफ कोई कैंपेन नहीं चला जिन्होंने ये कहा कि जो महाकुंभ में नहीं जाएगा वो देशद्रोही है। आखिर, सरकार की ऐसी दोहरी नीति क्यूं है। View this post on Instagram जाने आसाराम बापू का मामला आसाराम बापू को एक नाबालिग से बलात्कार के मामले में अदालत ने दोषी करार दिया है और आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अप्रैल 1941 में मौजूदा पाकिस्तान के सिंध इलाके के बेरानी गांव में पैदा हुए आसाराम का असली नाम असुमल हरपलानी है। सिंधी व्यापारी समुदाय से संबंध रखने वाले आसाराम का परिवार सन 1947 में विभाजन के बाद भारत के अहमदाबाद शहर में आ गया। साठ के दशक में उन्होंने लीलाशाह को अपना आध्यात्मिक गुरु बनाया। बाद में लीलाशाह ने ही असुमल का नाम आसाराम रखा। सन 1972 में आसाराम ने अहमदाबाद से लगभग 10 किलोमीटर दूर मुटेरा कस्बे में साबरमती नदी के किनारे अपनी पहली कुटिया बनाई। इसके बाद आसाराम की ख्याति गुजरात के अन्य शहरों के साथ ही देश के दिगर राज्यों में फैलते गई। आसाराम के प्रवचन सुनने के लिए आने वालों में ज्यादातर गरीब, पिछड़े और आदिवासी तबके के लोग होते थे। आसाराम प्रवचन के साथ ही आसाराम अपने पास आने वाले लोगों को उपचार के नाम पर देसी दवाएं भी देते थे। धीरे धीरे उनके समर्थकों और भक्तों की संख्या बढ़ते गई और इसमें मध्यमवर्गीय तबके के लोग भी शामिल हो गए। आसाराम के साथ ही उनके बेटे नारायण सांई ने देश-विदेश में चार सैकड़ा से ज्यादा आश्रम खड़े कर लिए। आसाराम के पास करीब दस हजार करोड़ की संपत्ति का खुलासा हुआ था। जांच में आश्रम निर्माण में गैर कानूनी तरीके से जमीन हड़पने के मामले भी सामने आए थे। मोदी से लेकर कमलनाथ तकसन 1990 से लेकर 2000 के दशक तक उनके भक्तों की सूची में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के लालकृष्ण आडवाणी, नितिन गडकरी, एमपी के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती, पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, प्रेम कुमार धूमल और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से लेकर दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और मोतीलाल वोरा जैसे दिग्गज कांग्रेस नेता तक शामिल थे। ये नेता तब आसाराम के समर्थकों के रूप में मौजूद वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए उनके दर्शन को जाते थे। लेकिन सन 2008 में आसाराम के मुटेरा आश्रम में दो बच्चों की हत्या का मामला सामने आते ही नेताओं ने उनके किनारा करना शुरू कर दिया। एक के बाद एक लगते गए आरोप जिस आसाराम के सामने बड़े बड़े राजनेता शीश झुकाते थे, उसी आसाराम का सितारा तब गर्दिश में आ गया जब दो बच्चों के अधजले शरीर बरामद हुए। 5 जुलाई 2008 को आसाराम के मुटेरा आश्रम के बाहर मौजूद साबरमती नदी के सूखे तल में 10 साल के अभिषेक वाघेला और 11 साल के दीपेश वाघेला के अधजले शरीर बरामद हुए थे। अहमदाबाद में रहने वाले इन चचेरे भाइयों के अभिवावकों ने मौत के कुछ ही दिन पहले उनका दाखिला आसाराम के गुरुकुल नाम के स्कूल में करवाया था। इस मामले की जांच के लिए तत्कालीन राज्य सरकार ने डीके त्रिवेदी कमीशन का गठन किया था। इस बीच सन 2012 में राज्य पुलिस ने मुटेरा आश्रम के सात कर्मचारियों पर गैर-इरादतन हत्या के आरोप तय किए। मामले की सुनवाई अहमदाबाद के सत्र न्यायालय में हुई। इसी तरह आसाराम के एक भक्त ने उनके खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करवाया था। अगस्त 2013 में आसाराम के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करवाने वाला शाहजहांपुर निवासी पीड़िता का पूरा परिवार घटना से पहले तक आसाराम का कट्टर भक्त था। पीड़िता के पिता ने अपने खर्चे पर शाहजहांपुर में आसाराम का आश्रम बनवाया था। उन्होंने अपने बच्ची को आसाराम के छिंदवाडा स्थित गुरुकुल में पढ़ने के लिए भेजा था। 7 अगस्त 2013 को पीड़िता के पिता को छिंदवाडा गुरुकुल से एक फोन आया। फोन पर उन्हें बताया गया कि उनकी 16 साल की बेटी बीमार है। अगले दिन जब पीड़िता के माता पिता छिंदवाडा गुरुकुल पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि उनकी बेटी पर भूत-प्रेत का साया है जिसे आसाराम ही ठीक कर सकते हैं। 14 अगस्त को पीड़िता का परिवार आसाराम से मिलने उनके जोधपुर आश्रम पहुँचा। मुकदमे में दायर चार्जशीट के अनुसार आसाराम ने 15 अगस्त की शाम 16 साल की बच्ची को ठीक करने के बहाने से अपनी कुटिया में बुलाकर बलात्कार किया। पीड़िता के परिवार का कहना था कि इस घटना के पहले तक तो वो आसाराम को भगवान की तरह मानते थे। परिवार के मुताबिक उन्हें पैसों की पेशकश की गई और इसे ठुकरा दिया तो उन्हें जान से मार देने की धमकी भी दी गई थी। आसाराम पर यही तक आरोप नहीं थे। 28 फरवरी 2014 की सुबह आसाराम और उनके बेटे नारायण साई पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली सूरत की दो बहनों में से एक के पति पर सूरत में ही जानलेवा हमला हुआ था। इसके बाद एक पखवाड़े के भीतर ही अगला हमला राकेश पटेल नाम के वीडियोग्राफर पर हुआ। इसके कुछ दिनों बाद ही दिनेश भगनानी नाम के तीसरे गवाह पर सूरत के कपड़ा बाजार में तेजाब फेंका गया। ये तो गनीमत रही कि ये तीनों गवाह इन जानलेवा हमलों के बाद भी बच गए। इसके बाद 23 मई 2014 को आसाराम के निजी सचिव के तौर पर काम कर चुके अमृत प्रजापति पर हमला किया गया। मारी गई गोली के जख्म से कुछ दिनों बाद अमृत की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद शाहजहांपुर के पत्रकार नरेंद्र यादव पर हमला किया गया। अज्ञात हमलावरों ने उनकी गर्दन पर हंसुए से दो वार किए। लंबे उपचार और ऑपरेशन के बाद नरेंद्र को नई जिन्दगी मिली। जनवरी 2015 में गवाह अखिल गुप्ता की मुजफ्फरनगर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। एक महीने बाद आसाराम के सचिव के तौर पर काम कर चुके राहुल सचान पर जोधपुर अदालत में गवाही देने के तुरंत बाद अदालत परिसर में ही जानलेवा हमला हुआ था। इसके बाद अगला हमला 13 मई 2015 को गवाह महेंद्र चावला पर पानीपत में हुआ था। महेन्द्र इस हमले में बाल बाल बच गए। जोधपुर कोर्ट में पीड़िता के पक्ष में कृपाल सिंह ने गवाही दर्ज करवाई थी। इसके बाद कृपाल सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। आसाराम ने खुद को बचाने के लिए प्रख्यात वकीलों की फौज खड़ी कर दी थी। इन वकीलों में राम जेठमलानी, राजू रामचंद्रन, सुब्रमण्यम स्वामी, सिद्धार्थ लूथरा, सलमान खुर्शीद, केटीएस तुलसी और यूयू ललित आदि शामिल रहे।बहरहाल, उम्र के आखिरी पड़ाव में चल रहे आसाराम एक बार फिर कल्ट ऑफ फियर-आसाराम बापू के नाम से प्रसारित हुई डॉक्यूमेंट्री से चर्चा में आ गए। हालांकि, इस चर्चा के साथ ही विवाद तब जुड़ गया जब डॉक्यूमेंट्री से जुड़े लोगों को धमकियां मिलने लगीं। ये मामला भी अदालत में है। आगे क्या होता है ये जानना दिलचस्प होगा। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन बाणसागर कालोनी बैकुण्ठपुर में S N 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