भोपाल– मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक

“हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्त्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिये तथा इसके समस्त नागरिकों को-
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिये तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिये दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवंबर, 1949 ई. को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”
 भारतीय संविधान की इस प्रस्तावना में हर शब्द का गहरा अर्थ है। भारतीय संविधान को विश्व में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। प्रस्तावना के नाम से भारतीय संविधान का सार, अपेक्षाएँ, उद्देश्य उसका लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है। प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है, इसी कारण हम भारत के लोग…. इस वाक्य से प्रस्तावना शुरू होती है। प्रस्तावना में शामिल हम भारत के लोग, संप्रभुता, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणतंत्र, स्वतंत्रता, न्याय, समता और बंधुता आदि शब्दों का आज भी प्रासंगिक है। भारत तेजी से विकास की ओर अग्रसर हो रहा है लेकिन देश के भीतर जो स्थितियां और परिस्थितियां हैं वो संविधान की प्रस्तावना के अनुरूप हैं ?, क्या मजहब के नाम हो रहे बवाल से हम भारत के लोग वाली भावना साकार हो रही है ?, क्या सभी को न्याय मिल पा रहा है?, क्या समता और बंधुता की भावना पहले से ज्यादा मजबूत हुई है? ऐसे की कई सवाल हैं जो इस गणतंत्र दिवस पर हमारे समक्ष खड़े हैं। गण और तंत्र दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं लिहाजा हमारा भी दायित्व है कि हम अपने अधिकारों के प्रति जितने जागरूक हैं उतने ही अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहे और भारत को विश्वगुरू बनाने में अपना योगदान दें।  
संविधान निर्माता, भारत रत्न डॉ. बीआर अम्बेडकर के बारे में देश के पहले राष्ट्रपति डाॅ. राजेंद्र प्रसाद ने 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में कहा था कि स्वतंत्र भारत के संविधान शिल्पी डा. अम्बेडकर ने अपनी बुद्धि, प्रतिभा और योग्यता की हर कीमत चुका कर देश को एक नया संविधान भेंट किया। संसार में ऐसी मानसिक ऊंचाई और शाश्वत प्रतिभा के धनी कर्मठ महापुरुष कभी-कभी ही अवतरित होते हैं। डाॅ प्रसाद के ये शब्द महज बाबा साहब की तारीफ नहीं थी बल्कि ऐसा सच था जो हमेशा कायम रहेगा। 6 दिसंबर 1956 को 63 साल की उम्र में आंबेडकर के निधन के थोड़ी देर बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा, संविधान बनाने में डॉ आंबेडकर से ज्यादा ध्यान किसी और ने नहीं दिया और न ही किसी और ने उतनी परेशानी उठाई। आयरलैंड का संविधान लिखने वाले आयरिश नेता इमोन डी वलेरा ने भी संविधान बनाने काम के लिए डॉ आंबेडकर के नाम की सिफारिश वाइसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से की थी।
   जब गणतंत्र की बात होती है तो वो बिना संविधान के पूरी नहीं हो सकती और जब संविधान की बात होगी तो बाबा साहब का जिक्र सहसा आ ही जाएगा। डॉ. अंबेडकर ने भारत के संविधान का प्रारूप बनाने में कितनी मेहनत थी कि इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, महान विद्वान बाबा साहब ने ऐसा संविधान तैयार किया जो जाति-धर्म, या जन्मस्थान अथवा किसी ऐसे आधार पर किसी भी भारतीय के साथ भेदभाव नहीं करता। अलबत्ता शोषित-वंचित वर्गों को सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक रूप से मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें सशक्त बनाने का अवसर देता है। बाबा साहब ने अमानवीय कुरीतियों जैसे छूआछूत, जातिगत भेदभाव, अपमान आदि को खुद भोगा था। इसी वजह से उन्होंने शोषित और वंचित वर्ग के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक उत्थान के साथ समाज से सम्मान दिलाने, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए आजीवन संघर्ष किया। बाबा साहब का मानना था कि जातियां आपसी द्वेष बढ़ाती हैं। अत इस अवरोध को दूर करना होगा क्योंकि यदि बंधुभाव ही नहीं रहेगा तो समता और स्वाधीनता सब अस्तित्वहीन हो जाएंगे। बाबा साहब का कहना था कि मैं चाहता हूं कि लोग सर्वप्रथम भारतीय हों व अंत तक भारतीय रहें, भारतीय के अलावा कुछ भी नहीं।
  संविधान को लागू हुए सात दशक से भी ज्यादा का वक्त हो चुका है। इस दौरान संविधान में भी 125 से ज्यादा संशोधन हो चुके हैं, कई पुराने कानूनों को खत्म किया जा चुका है, कई नई धाराएं जोड़ी जा चुकी हैं। संविधान समीक्षा और संविधान निर्माता बाबा साहब के नाम पर कई मर्तबा संसद से लेकर सड़क तक बवाल हो चुका है। संविधान समीक्षा के नाम पर पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों पर निशाना साधने और खामियां गिनाने की जो परम्परा चल रही है उससे आमजन भी विचलित है। आखिर संविधान में अब तक जो भी संशोधन हुए हैं वो संसद में ही पारित हुए हैं तो फिर इन पर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं। संविधान के नाम पर जो कुछ हुआ उसकी कल्पना तो बाबा साहब ने भी नहीं की होगी। इतना जरूर है कि आज जो भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था दिख रही है वह बाबा साहब के संविधान की ही देन है।   
  बहरहाल, कमोबेश ये सवाल भी ज़हन में आ ही जाता है कि क्या ये ठीक वैसा ही संविधान है जैसा बाबा साहब बनाना चाहते हैं। संविधान को अंगीकार करने से पहले इसमें जितने संशोधन हुए उससे ये माना जा सकता है कि बाबा साहब की कल्पनाओं जैसा ये संविधान शायद नहीं है। बाबा साहब की भारतीय संविधान को लेकर जो कल्पना था उसकी झलक अखिल भारतीय अनुसूचित जाति परिसंघ के ज्ञापन में मिलती है। संयुक्त राज्य भारत का संविधान शीर्षक से वह उनके संपूर्ण वाङ्मय के खंड 2 में संकलित भी है। कई अन्य आलेखों में भी डॉ अम्बेडकर ने संविधान को लेकर अपनी सोच जाहिर की है। बावजूद इसके बाबा साहब मानते थे यदि इसी संविधान को सहीं तरीके से अमल में लाया जाए तो देश और समाज को सशक्त बनाया जा सकता है। संविधान निर्माण का काम पूरा होने के बाद डाॅ. आम्बेडकर ने कहा था कि मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मजबूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था। खैर, आज तो हालात ये हैं कि राजनीतिक दल अपने-अपने फायदे के लिए संविधान और बाबा साहब दोनों के अनुयायी या हितैषी होने का दंभ भर रहे हैं लेकिन दर हकीकत किसी से छिपी हुई नहीं है। आखिर में इतना ही कि आइए, इस गणतंत्र दिवस पर संकल्प लें कि बाबा साहब के बताए रास्ते पर चलते हुए हम सब मिलकर भारत को विश्वगुरू बनाएंगे।

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