भोपाल – मुस्ताअली बोहरा। इस वक्त पूरे देश की निगाहें सदन पर टिकी हुई हैं। आम आदमी को सरकार से काफी उम्मीदें हैं। वहीं विपक्ष को लेकर इस बात का भरोसा का है कि वो जनसरोकारांे से जुड़े मुददे सदन के भीतर उठाएगा। हालांकि पिछले दिनों में लोकसभा में कुछेक मसलों पर चर्चा तो हुई लेकिन असल मुद्दों पर पक्ष और विपक्ष दोनों भटके हुए नजर आ रहे हैं। लोकसभा में संविधान को लेकर जो बहस हुई उससे भी सत्ता पक्ष और विपक्ष का नजरिया सामने आ गया। आरक्षण के मसले पर हुई बहस के दौरान विपक्ष ने सत्ता पक्ष पर आरक्षण की व्यवस्था के खिलाफ होने का आरोप लगाया। इन आरोपों के जवाब में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आरक्षण की जो व्यवस्था अभी लागू है, उनकी सरकार उस पर आंच नहीं आने देगी, लेकिन धर्म के आधार पर आरक्षण देने की कोई भी कोशिश वह सफल नहीं होने देगी। इसके अलावा सत्ता और विपक्ष दोनों ने एक दूसरे पर मनमानी करने और लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाने के आरोप लगाए। कांग्रेस ने पिछले दस सालों को आधार बनाकर भाजपा को घेरने की कोशिश की वहीं भाजपा ने आजादी के बाद से करीब पांच दशक तक सत्ता एक ही परिवार के हाथों में रहने और मनमानी का आरोप कांग्रेस पर लगाया। इमरजेंसी का पुराना आरोप भी उछला। लोकसभा में संविधान और संवैधानिक मूल्यों को लेकर कौन समर्पित है और कौन इस पर राजनीति कर रहा है, इस पर बहस होती रही। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जहां सावरकर के सहारे बीजेपी पर निशाना साधा वहीं पीएम मोदी ने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की गलतियां गिनाईं। खैर, सदन में राजनीतिक बहस का स्तर इतना कमतर नहीं होना चाहिए। जनसरोकारों से जुड़े मसलों, सरकारी योजनाओं, खूबियों-खमियों पर बहस होना चाहिए ना कि इस बात पर कि पंडित नेहरू ने क्या किया या बाबा साहब ने। View this post on Instagram संसद में गृह मंत्री अमित शाह के डा. आंबेडकर को लेकर दिए गए बयान पर हंगामा हो गया है। इस हंगामे का आधार यह है कि गृह मंत्री ने यह कह कर आंबेडकरजी का अपमान कर दिया कि यदि आंबेडकर, आंबेडकर करने वाले इतना नाम भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता। इसी बयान को बाबा साहब का अपमान करने वाला माना जा रहा है। वैसे, बाबा साहब के अनुयायियों के लिए वे किसी भगवान से कम हैं भी नहीं। सदन के भीतर और बाहर इस मामले को लेकर बवाल खड़ा हो गया है। बहरहाल, लोकसभा के भीतर मुद्दों-मसलों को लेकर बहस तो होती ही रहती है और सत्ता-विपक्ष के बीच आरोपों-प्रत्यारोंपों का सिलसिला भी चलता रहता है। लेकिन, इस बहस के दौरान महापुरूषों को घसीटा जाना आमजन के लिए टीस भरा होता है। चाहे वह पंडित जवाहर लाल नेहरू हो या फिर बाबा साहब या फिर इनके समकालीन कोई और नेता या महापुरूष सभी ने इस देश को उचाईयों तक पहुंचाने में अपना योगदान दिया है। ये और बात है कि राजनीतिक तरीके से हर कोई हर किसी के काम या योगदान से इत्तेफाक रखे या ना रखे। लोकसभा हो या राज्यसभा हो या फिर विधानसभा किसी भी सदन में किसी महापुरूष को लेकर टीका-टिप्पणी नहीं हो चाहिए, कम से कम इतना सम्मान तो उन्हें दिया ही जा सकता है। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन जनविरोधी पूंजीवादी राजनीति के खिलाफ वैकल्पिक वामपंथी राजनीति को स्थापित करेगी माकपा : डॉ. डोम सुपर स्पेशियलिटी सुविधाओं का विस्तार करने के लिये सरकार प्रतिबद्ध: उप मुख्यमंत्री शुक्ल