भोपाल– मुस्ताअली बोहरा पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब ……. लेकिन जनाब हमारे देश में तो स्कूल बढ़ने की बजाए घट रहे हैं। ये भी दिलचस्प बात है कि केन्द्र सरकार ने उच्च शिक्षा के लिए आईआईटी, आईआईआईटी और आईआईएम जैसे नए संस्थान खोले हैं लेकिन जब तक स्कूली शिक्षा ही पूरी नहीं होगी तो विद्यार्थी यहां तक पहुंचेंगे कैसे। पिछले एक दशक में देश में जितना कर्ज बढ़ा उसके मुकाबले उतना विकास नहीं हुआ। हां, कभी गौ तस्करी तो कभी लव जेहाद या फिर मंदिर के नीचे मस्जिद ढूंढने में कतिपय लोगों की उर्जा जरूर खर्च हुई। लोग सरकार से रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी और जरूरी सहुलियतों की अपेक्षा करते हैं और ये सहुलियतें उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी भी है फिर चाहे सरकार किसी भी पार्टी की ही क्यों ना हो। जिस तरह से नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में बतौर मुख्यमंत्री काम किया था उससे उनके प्रति अपेक्षाएं भी ज्यादा थी और यही वजह थी कि लोगों ने देश की बागडोर उनके हाथों में सौंपी। अब, एक लंबा समय गुजर चुका है और यही वजह है कि मोदी सरकार ने किस क्षेत्र में कितना काम किया इसकी चर्चा होने लगी है। जहां तक शिक्षा का सवाल है तो मोदी सरकार में शिक्षा का बजट तो बढ़ा है लेकिन उतना नहीं जितनी उम्मीद थी। पिछले एक दशक में शिक्षा पर खर्च 30 हजार करोड़ रूपये बढ़ा है। हैरत की बात तो ये है कि देश में स्कूल बढ़ने की बजाए कम हो गए हैं। मोदी सरकार के पहले देश में 15 लाख 18 हजार स्कूल थे जो घटकर 14 लाख 89 हजार हो गए। देश में अभी भी करीब तीस प्रतिशत महिलाएं और 15 प्रतिशत पुरूष अनपढ़ है। दस में से 6 लड़कियां दसवीं से ज्यादा नहीं पढ़ पा रही हैं। वहीं दस से पांच पुरूष ऐसे हैं जो दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ रहे हैं। स्कूली शिक्षा में भले ही सुधार नहीं हुआ हो लेकिन हायर एजुकेशन में थोड़ा सुधार हुआ है। विश्विद्यालयों की तादाद 11 सौ से ज्यादा हो गई है।इधर, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब शुरूआती आठ सालों में 202 केन्द्रीय विद्यालय थे जबकि मोदी के कार्यकाल में आठ सालों में 159 केवी ही बनाए गए। अपै्रल 2022 तक कुल 1249 केन्द्रीय विद्यालय थे। 2014-15 से 2021-22 के बीच मोदी के कार्यकाल में 159 केवी बनाए गए यानि तब हर साल 20 स्कूल शुरू हुए। दूसरी तरफ, 2004-05 से 2011-12 तक मनमोहन कार्यकाल के शुरूआती आठ साल में 202 स्कूल शुरू हुए यानि हर साल 25 से ज्यादा स्कूल शुरू हुए। हालांकि, हाल ही में मोदी सरकार ने नए केवी खोलने को लेकर मंजूरी दी है। यहां ये बताना लाजमी होगा कि केन्द्रीय विद्यालय में प्रवेश के लिए केन्द्र सरकार ने सांसद कोटा खत्म कर दिया है। इस कोटे के जरिए हर सांसद केन्द्रीय विद्यालय में प्रवेश के लिए 10 नामों की सिफारिश कर सकते थे। मार्च 2022 में कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में ये मसला उठाया था। उन्होंने या तो कोटा बढ़ाने या खत्म करने की बात कही थी और सरकार ने इस कोटे को खत्म करने का फैसला लिया था।भले ही स्कूली शिक्षा की ओर सरकार का ध्यान कम हो लेकिन उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पूरा जोर लगाया जा रहा है। वर्ष 2014 के बाद से उच्च शिक्षा के नए संस्थान स्थापित किए गए हैं जिनमें 7 आईआईटी, 16 आईआईआईटी, 7 आईआईएम, 15 एम्स और 390 विश्वविद्यालय शामिल हैं। अहम सवाल ये है कि जब तक गरीब और मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों की स्कूली शिक्षा पूरी नहीं हो पाएगी तो विद्यार्थी इन उच्च शिक्षा संस्थानों तक कैसे पहुंच पाएंगे। जहां तक आर्थिक मोर्चे का सवाल है तो पीएम मोदी के कार्यकाल में बेरोजगारी, नोटबंदी और आधे-अधूरे तरीके से गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) व्यवस्था लागू करने जैसे आरोप विपक्ष लगाता रहा है। वहीं भाजपा का कहना है कि कांग्रेस राज में टेलीकाॅम और कोयला घोटाले सहित कई घोटाले सामने आ चुके हैं। इसके अलावा जब पूरी दुनिया कोविड महामारी से गुजर रही थी तब भी मोदी सरकार ने न सिर्फ दुनिया के दूसरे देशों की भी मदद की बल्कि भारत की अर्थ व्यवस्था को थामें रखा। मोदी सरकार के अब तक कार्यकाल में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का जीडीपी नीचे आया है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार यूपीए सरकार के दस सालों में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का औसत 15 से 17 फीसदी के बीच था। वहीं मोदी सरकार के कार्यकाल में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का जीडीपी 13 प्रतिशत तक आ गया है। वो भी तब जब खुद मोदी ने दुनिया के विकसित देशों में कई बार यात्रा की, मेक इन इंडिया जैसी मुहिम चलाई गई और उत्पादन से जुड़ी छूट पर अरबों डॉलर खर्च किए गए। एचडीआई यानि मानव विकास सूचकांक के मामले में भी निराशा ही हाथ लगती है। यह सूचकांक, स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रगति, शिक्षा तक पहुंच और व्यक्ति के जीवन स्तर में प्रगति का मानक है। सन 2004 से 2013 के बीच भारत के एचडीआई मूल्य में 15 फीसदी का सुधार हुआ। हालांकि यूएनडीपी के ताजा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2014 और 2021 के बीच इसमें केवल 2 फीसदी का सुधार हुआ। 2019 तक एचडीआई में, यूपीए के पांच सालों के 7 फीसदी के मुकाबले केवल 4 फीसदी का सुधार रहा है। मानव विकास सूचकांक में भी भारत की रैंकिंग गिरी। सन 2004 में कुल 191 देशों में भारत 131 पायदान पर था, जबकि 2021 में वो 132 पर आ गया।कुल मिलाकर, मोदी सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों में उतना ध्यान नहीं दिया जितनी जरूरत थी। मोदी सरकार उच्च शिक्षा को बढ़ावा दे रही है और इसकी सराहना की जानी चाहिए लेकिन सरकार की मंशा तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक बुनियादी शिक्षा यानि स्कूली शिक्षा पर मुकम्मल ध्यान नहीं दिया जाए। उम्मीद तो यही है कि स्कूलों के उन्नयन, रिक्त पड़े पदों पर योग्य शिक्षकों की भर्ती, सरकारी स्कूलों में किताबी ज्ञान के अलावा स्किल डेव्हलपमेंट या रोजगारमूलक कोर्स शुरू करने की ओर ध्यान दिया जाएगा। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like 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