भोपाल — मुस्ताअली बोहरा।। भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले महायुति गठबंधन ने महाराष्ट्र में एक तरफा जीत हासिल कर ली। सूबे का सीएम कौन बनेगा, शरद पवार और उद्धव ठाकरे की राजनीति का क्या होगा ऐसे ही कई सवाल हैं जिनका जवाब वक्त दर वक्त मिलता जाएगा। लेकिन, फिलहाल जो चीज सबके ज़हन में कौंध रही है वो ये है कि आखिर महाराष्ट्र में बीजेपी ने ऐसा चमत्कार कैसे कर दिया। दरअसल, हिन्दुत्व के अलावा जिस मुद्दे से बीजेपी के लिए वोट बटोरे वो था लाडली बहिन योजना। ये वही योजना है जिसने मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चैहान को प्रदेश में लंबे समय तक सीएम के रूप में टिकाए रखा था। इसी योजना के बूते ही मध्प्रदेश में अभी भी भाजपा की सरकार है, ये और बात है कि अब शिवराज केन्द्र में मंत्री हैं और मप्र के सीएम डाॅ मोहन यादव। खैर, लाडली लक्ष्मी योजना की ही तरह महाराष्ट्र में लाडली बहिन योजना लागू की गई थी जिसने पूरी हवा ही पलट दी। इसी साल लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी को बढ़त मिली थी, इससे लग रहा था कि विधानसभा चुनाव में भी उसे जीत मिल सकती है लेकिन ऐसा हुआ नहीं। करीब पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव की झटके से उबरकर बीजेपी ने अपने लिए विधानसभा चुनाव की राह आसान की। महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं जिसमें कांग्रेस के नेतृत्व वाले महाविकास अघाड़ी ने 30 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन को 18 सीटें मिली थीं। बीजेपी ने महाराष्ट्र की कुल 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें से उसने नौ सीटें जीती थीं। लोकसभा में भाजपा और उसके गठबंधन के रिजल्ट को देखते हुए ही विधानसभा चुनाव का अंदाजा लगाया जा रहा था। लेकिन भाजपा ने सबसे बड़ा दल बनकर सबको हैरत में डाल दिया। माना जा रहा है कि लाड़ली बहिन योजना और हिंदुत्व की रणनीति से भाजपा ने जीत की राह आसान की। लाड़ली बहिन योजना में ढाई करोड़ महिलाओं के अकाउंट में चार महीने का पैसा डाला गया। इससे महिलाओं को भाजपा के प्रति आकर्षित करने में सहायता मिली। इसके तहत हर महीने महिलाओं को 1500 रुपये देने का प्रावधान किया गया था। इस योजना का फायदा 21 से 60 साल की महिलाएं उठा सकती हैं जिनके परिवार की सलाना आय 2.5 लाख रुपये से कम है। इसके साथ ही बंटेंगे तो कटेंगे नारा चलाया गया जिसकी वजह से कुछ हद तक हिंदू वोट एकजुट हुआ। बताया जा रहा है कि लोकसभा की अपेक्षा इस बार विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदान का प्रतिशत काफी घटा जिससे महाविकास अघाड़ी को नुकसान हुआ। जो दलित वोट छिटक गया था वो वापस बीजेपी गठबंधन के साथ जुड़ गया। इसके साथ ही आरक्षण के लिए सब-कैटेगरी बनाई गई जिसके बाद बौद्ध वोटर भी भाजपा से जुड़े। इसके अलावा ओबीसी मतदाताओं को जोड़ने, किसानों को मनाने पर भी काम किया गया। दिलचस्प बात ये भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने कम रैलियां कीं। लोकसभा चुनाव में जहां-जहां पीएम ने रैली की थी, वहां-वहां भाजपा की हार हुई थी, इसी वजह से इस बार रैलियों में कमी की गई। स्थानीय नेताओं से चुनाव प्रचार करवाया गया और उन्होंने रैलियों, सभाओं को संबोधित किया। जहां तक महाविकास अघाड़ी का सवाल है लाडली बहिन योजना की आलोचना करना भारी पड़ गया। महाविकास अघाड़ी के सहयोगी दल भी अलग-अलग नजर आए। वो आम मतदाता का भरोसा जीतने में कामयाब नहीं हो सके। कांग्रेस-शिवसेना में कथित तकरार दिखी। कांग्रेस और सहयोगी दल के नेताओं के भाषण में स्थानीय मुद्दे नदारद रहे। इसके अलावा शरद पवार का रसूख भी कम दिखा, उनके प्रति वो सहानुभूति नजर नहीं आई जो लोकसभा चुनाव में दिखी थी। महाराष्ट्र में भाजपा ने हिंदुत्व के एजेंडे को कायम रखा। हिन्दुओं और विभिन्न जातियों को जोड़ने की रणनीति में भाजपा आगे रही जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के पास इसका कोई तोड़ नहीं था। बहरहाल, भाजपा ने तो खेला कर दिया। इधर, ढाई साल पहले शिवसेना से अलग होकर एकनाथ शिंदे ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी, लिहाजा शिंदे का राजनीति भविष्य भी अब तय होगा। वहीं उद्धव ठाकरे की शिवसेना दमदारी के साथ वापस आएगी ऐसा लग रहा था, लेकिन ये हो नहीं सका। कुल मिलाकर, इस बार के चुनाव ने सूबे की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी है। आगे आगे देखिए होता है क्या ……….। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’ साधते सीकरी के असाधु और असंत गूगल मैप के भरोसे दौड़ी कार, हुआ हादसा 3 की मौत… गूगल मैप पर न करे भरोसा….!