भोपाल– मुस्ताअली बोहरा।। साल 2002 के गुजरात दंगों में एक हजार से ज्यादा लोगों की जानें गईं, हजारों लोग प्रभावित हुए, करोड़ों रूपये की संपत्ति को नुकसान पहुंचा। गोधरा कांड और इसके बाद हुए गुजरात दंगों में शामिल आरोपियों को सजा भी हुई। इधर, सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का राजनीति में कद और बढ़ गया। वे मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक जा पहुंचें। ये मोदी की कार्यशैली और शख्सियत ही थी कि उनका कद पार्टी से भी बड़ा हो गया। भाजपा के चुनाव चिन्ह की बजाए मोदी के चेहरे पर वोट मिलने लगे। हालांकि, जिस गुजरात दंगे के बाद मोदी नेशनल पाॅलिटिक्स में आए उन्हीं दंगों को न रोक पाने के आरोप भी उन्हीं पर लगे थे। उनकी सरकार में मंत्री रहीं माया कोडनानी इन्हीं कारणों से सालों तक इसकी सजा भुगतती रहीं। गैरभाजपाई नेताओं का कहना था कि दंगों में भूमिका के कारण ही मोदी ने कोडनानी को मंत्री पद से नवाजा था। ये और बात है कि खुद मोदी ने दंगों को लेकर कभी भी कोई अफसोस नहीं जताया। बात उन अफसरों की जिन्होंने गुजरात दंगों में मोदी की भूमिका पर सवाल उठाए थे। जिन अफसरों ने भी मोदी पर सवाल खड़े थे या तो उन्हें किनारे लगा दिया गया या वो खुद ही किनारे हो गए।ऐसे ही अफसरों में सबसे पहला नाम है संजीव भट्ट का। आईआईटी मुंबई से पोस्ट ग्रेजुएट संजीव भट्ट वर्ष 1988 में भारतीय पुलिस सेवा में आए और उन्हें गुजरात काडर मिला। वो राज्य के कई जिलों, पुलिस आयुक्त के कार्यालय और अन्य पुलिस इकाइयों में काम चुके हैं। दिसंबर 1999 से सितंबर 2002 तक वे राज्य खुफिया ब्यूरो में खुफिया उपायुक्त के रूप में कार्यरत थे। गुजरात के आंतरिक सुरक्षा से जुड़े सभी मामले उनके अधीन थे। इनमें सीमा सुरक्षा और तटीय सुरक्षा के अलावा अति वीवीआईपी लोगों की सुरक्षा भी शामिल थी, इस दायरे में मुख्यमंत्री की सुरक्षा भी आती थी। संजीव भट्ट नोडल अफसर भी थे, जो कई केंद्रीय एजेंसियों और सेना के साथ खुफिया जानकारियों का आदान-प्रदान भी करते थे। संजीव भट्ट ने गुजरात दंगों की जांच करने वाली एसआईटी और नानावटी आयोग से कहा था कि वे उस मीटिंग में मौजूद थे जिसमें गोधरा कांड के बाद नरेन्द्र मोदी ने कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों से दंगाइयों से नरमी से निपटने को कहा था। इसके बाद संजीव भट्ट को निलंबित कर दिया गया था। जून 2019 में भट्ट को सन 1990 के एक मामले में निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। गुजरात काडर के बर्खास्त आईपीएस अफसर संजीव भट्ट को स्थानीय कोर्ट ने 30 साल पुराने एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उन्हें नार्कोटिक्स के एक मामले में पैसा उगाही के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। संजीव भट्ट वही अफसर हैं, जिन्होंने 2002 में हुए गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था कि दंगों की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल पर उन्हें भरोसा नहीं है। भट्ट ने मार्च 2011 में कोर्ट में हलफनामा दायर कर तत्कालीन मुख्यमंत्री पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि गोधरा कांड के बाद 27 फरवरी 2002 की शाम मुख्यमंत्री के आवास पर हुई बैठक में वे मौजूद थे। इसमें मोदी ने कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों से कहा था कि हिंदुओं को अपना गुस्सा उतारने का मौका दिया जाना चाहिए। हालांकि तब तत्कालीन मोदी सरकार की ओर से कहा गया था कि इस बात के सबूत नहीं हैं कि संजीव भट्ट इस बैठक में मौजूद थे। संजीव के हलफनामे के बाद वे मोदी सरकार के निशाने पर आ गये थे। बाद में संजीव भट्ट को बगैर अनुमति के ड्यूटी से अनुपस्थित रहने और सरकारी वाहन का दुरुपयोग करने के आरोप में 2011 में निलंबित कर दिया गया था। उसी दौरान भट्ट की गिरफ्तारी भी की गई थी। उनके परिवार ने उनकी जान की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। उनकी पत्नी श्वेता भट्ट ने उस समय आरोप लगाया था कि संजीव के खिलाफ घाटलोदिया पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया और इसके बाद उन्हें क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया। मुझे उनकी जान की चिंता है। गिरफ्तारी के मामले में श्वेता भट्ट ने कहा था कि पुलिसकर्मियों ने बिना किसी सूचना के हमारे घर की दो घंटों से अधिक समय तलाशी ली। वे संजीव को अपने साथ ले गए। श्वेता भट्ट के मुताबिक गिरफ्तारी के दूसरे दिन भी पुलिस उनके घर की तलाशी लेने पहुंची थी लेकिन वारंट के बारे में पूछने पर पुराना वारंट दिखाया गया। उन्होंने पुलिस के आला अधिकारियों को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई थी। 30 सितम्बर 2011 को संजीव भट्ट को उनके घर से गिरफ्तार किया गया था। ये गिरफ्तारी उनके मातहत काम कर चुके एक कॉन्सटेबल केडी पंत की ओर से दर्ज पुलिस रिपोर्ट के आधार पर की गई थी। इस रिपोर्ट में संजीव भट्ट पर आरोप लगाए गए थे कि उन्होंने दबाव डालकर मोदी के खिलाफ हलफनामा दायर करवाया था।संजीव का मामला यहीं खत्म नहीं हुआ बल्कि साल 2015 में आए एक कथित सेक्स वीडियो को लेकर संजीव भट्ट को पहले गुजरात सरकार ने कारण बताओ नोटिस जारी किया और फिर अगस्त 2015 में बर्खास्त कर दिया। नोटिस में कहा गया कि वे अपनी पत्नी के अलावा किसी अन्य महिला के साथ रिश्ते पर सफाई दें। भट्ट ने कथित सेक्स वीडियो में खुद के होने से इंकार किया था और कहा था कि वीडियो में मौजूद आदमी उनकी तरह दिखता है, पर वे स्वयं उसमें नहीं हैं। तब उन्होंने गुजरात सरकार पर राजनीतिक द्वेष से कार्रवाई करने का आरोप लगाया था। वीडियो के मामले में उनका कहना था, यह वीडियो सबसे पहले मई 2014 में सामने आया था। इसे तेजिंदर पाल बग्गा के ट्विटर अकाउंट से अपलोड किया गया था। तब बग्गा नमो पत्रिका के संपादक थे और दक्षिणपंथी संगठन भगत सिंह क्रांति सेना से जुड़े हुए थे। संजीव भट्ट की परेशानियां यहीं खत्म नहीं हुई। उन्हें 5 सितम्बर 2018 को सीआईडी ने गिरफ्तार कर लिया। उस समय कहा गया कि सन 1998 पालनपुर ड्रग प्लांटिंग केस में हाईकोर्ट के आदेश के बाद उनकी गिरफ्तारी हुई। उनके साथ सात अन्य लोगों की भी गिरफ्तारी हुई थी। आरोप में कहा गया था कि संजीव भट्ट जब बनासकांठा के डीसीपी थे, उस वक्त एक वकील को नार्कोटिक्स के झूठे मामले में फंसाने का आरोप लगा। उस वक्त करीब 8 ऐसे नार्कोटिक्स मामले थे जिसमें विवाद हुआ था। इनमें कुछ आरोपी राजस्थान के थे। राजस्थान के आरोपियों ने संजीव भट्ट पर झूठा केस दायर कर उनसे पैसे ऐंठने का आरोप लगाया था। संजीव के साथ ही उनके परिवार ने भी काफी मुश्किलें झेंली थी। इन्हीं सब घटनाक्रम के बीच संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट्ट और उनके बेटे शांतनु की कार एक ट्रक की टक्कर में क्षतिग्रस्त हो गई थी। इस दुर्घटना में दोनों बाल बाल बच गए थे, श्वेता ने उस समय किसी साजिश की आशंका जताई थी। संजीव भट्ट के अलावा और भी अफसर हैं जिनको मोदी के कोप का भाजन बनना पड़ा। इन्हीं में से एक हैं आरबी श्रीकुमार। रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक आरबी श्रीकुमार ने एसआईटी के सामने गुजरात सरकार के खिलाफ दस्तावेज सौंपे थे। ये पहले पुलिस अधिकारी थे, जिन्होंने नानावटी-शाह आयोग के सामने मोदी के खिलाफ गवाही दी थी। इसके बाद गुजरात सरकार ने उनका प्रमोशन रोक दिया। उन्होंने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के सामने इसे चुनौती दी, जिसने सितंबर 2006 में श्रीकुमार के पक्ष में फैसला दिया था। राहुल शर्मा (पूर्व डीआईजी) ने जांच एजेंसियों को गुजरात दंगों के दौरान कुछ भाजपा नेताओं की फोन पर हुई बातचीत की सीडी दी थी। फरवरी 2015 में राहुल शर्मा ने पुलिस की नौकरी छोड़ दी, बाद में वे गुजरात हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। ये तो हुई अफसरों की बात, इनके अलावा जिन्होंने भी मोदी के खिलाफ आवाज़ बुलंद की उनका अंजाम भी कुछ अच्छा नहीं हुआ। ईडी और सीबीआई सहित अन्य जांच एजेंसियों की कार्रवाई को खंगाला जाए तो साफ हो जाता है कि किस तरह दुश्मनों को ठिकाने लगाया जाता है। जो टक्कर लेने का माद्दा रखते हैं वो डटे रहते हैं और जो कमजोर होते हैं या जिनके दामन पर दाग होता है वो सियासी पाला बदल लेते हैं। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन खूंखार चीते का वध एवं स्वतंत्रता आन्दोलन की रणनायिका को नहीं मिला वह सम्मान जिसकी वह हकदार थी बायपास रोड़ तेजाजीनगर पर हत्या को हादसे का रूप देने वाला 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