भोपाल, मप्र। मुस्ताअली बोहरा अधिवक्ता एवं लेखक भगवान श्रीराम की पावन नगरी अयोध्या में भले ही भाजपा को रामजी से जीत का आशीर्वाद ना मिला हो लेकिन हरियाणा में राम रहीम का सहारा जरूर मिल गया। चुनाव से ऐन पहले मिली पैरोल और उसके बाद डेरे के ब्लाॅकों में हुई नाम चर्चा ने पांसा पलट दिया। हरियाणा और जम्मू कश्मीर के चुनावी नतीजे आ गए। नतीजे अप्रत्याशित हैं भी और नहीं भी खासकर हरियाणा विधानसभा चुनाव के। अप्रत्याशित इसलिए क्योंकि यहां जाट-किसान नाखुश बताए जा रहे थे, अग्निवीर योजना को लेकर भी युवाओं में कुछ पाॅजिटिव नहीं था, इसके अलावा कांग्रेस ने जोरदार प्रचार किया था। इन सबके बावजूद हरियाणा में भाजपा की ऐतिहासिक तीसरी जीत हुई। चुनावी नतीजे अप्रत्याशित इसलिए नहीं हैं क्योंकि पीएम नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता सिर चढ़कर बोल रही है, केन्द्रीय मंत्री अमित शाह और रणनीतिकार धमेन्द्र प्रधान की सधी हुई रणनीति, बारीकी से उम्मीदवार चयन, कार्यकर्ताओं और नेताओं की बात सुनने से लेकर उनका मनोबल बढ़ाने तक, जिन बूथों पर भाजपा कमजोर दिख रही थी ऐसे बूथों की पहचान कर उन क्षेत्रों में जोरदार प्रचार, एंटी इनक मबैसी को दूर करने और नाम वापसी के अंतिम दिन से पहले तक बागियों को मनाने तक का काम किया गया और नतीजा सामने दिख गया। भाजपा की जीत में डेरा सच्चा सौदा के चीफ और बलात्कार और हत्या के मामले में सजा काट रहे गुरमीत राम रहीम सिंह का भी योगदान माना जा रहा है। View this post on Instagram राम रहीम को वोटिंग से ठीक पहले पैरोल मिली थी। हरियाणा के आधा दर्जन जिलों में राम रहीम सिंह के अच्छे खासे समर्थक हैं और इन जिलों में भाजपा का प्रदर्शन भी बेहतर रहा है। वोटिंग के पहले ही डेरा सच्चा सौदा के मुख्यालय में सत्संग हुआ था। इसी सत्संग में बीजेपी को वोट देने का संदेश गुपचुप तरीके से दिया गया था। राम रहीम ने पैरोल पर बाहर आते ही डेरे के सभी ब्लाॅक में नाम चर्चा का कार्यक्रम रखा था जिसमें राम रहीम के अनुयायियों को ये संदेश दिया गया था। इससे पहले भी राम रहीम लोकसभा चुनाव में भाजपा को समर्थक दे चुका था। भाजपा ने सोची समझी रणनीति के तहत मनोहर लाल खट्टर को सीएम बनाया था और इस बार छह महीने पहले ही नायब सिंह सैनी को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। बीजेपी ने गैर जाट वोट बैंक को साधने की कोशिश की जो कामयाब रही। ओबीसी के अलावा अनुसूचित जाति वर्ग और महिलाओं को भी भाजपा ने काफी हद तक अपने पक्ष में कर लिया। बीजेपी ने चुनावी प्रचार भी नया साल शुरू होते ही प्रारंभ कर दिया था। गांव-गांव में मोदी सरकार की नीतियों और योजनाओं का प्रचार किया गया। भाजपा ने आधा सैकड़ा से ज्यादा नए चेहरों को चुनावी समर में उतारा जबकि कांग्रेस ने दर्जन भर से ज्यादा ऐसे लोगों को टिकट दी पहले चुनाव हार चुके थे। नायब सिंह सैनी की सीएम पद पर उम्मीदवार घोषित करने और नए चेहरों को टिकट दिया जाना भाजपा के लिए मुफीद साबित हुआ। लोकसभा चुनावों के विपरीत, इस बार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। भारतीय राष्ट्रीय लोकदल ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया, जबकि जननायक जनता पार्टी ने आजाद समाज पार्टी के साथ हाथ मिलाया। विपक्षी खेमे में बिखराव और निर्दलीय प्रत्याशियो ने भाजपा को फायदा पहुंचाया। कांग्रेस के लिए उसका अति आत्मविश्वास और भाजपा को कमतर आंकना भी भारी पड़ गया। भाजपा के खिलाफ वोट बंट गए और कांग्रेस के हाथ से जीत फिसल गई। बीजेपी ने पूरी ताकत और उत्साह के साथ चुनाव लड़ा। डेढ़ सैकड़ा से ज्यादा रैलियां की, खुद पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भी चुनावी सभाओं को संबोधित किया। चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी आंतरिक कलह से परेशान रही। पार्टी में भूपेंद्र हुड्डा, कुमारी शैलजा और रणदीप सुरजेवाला जैसे विभिन्न गुट उभरकर सामने आए। कुमारी शैलजा और रणदीप सुरजेवाला इतने नाराज थे कि चुनाव प्रचार में भी कम दिलचस्पी दिखाई। ऐसा नहीं है कि भाजपा में सब कुछ अच्छा था। विरोध तो खटटर का भी था लेकिन भाजपा ने इसे काफी पहले ही भांप लिया था और यही वजह थी कि उन्हें हटाकर सैनी को सीएम पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया था। कांग्रेस सिर्फ भूपेंद्र हुड्डा पर डिपेंड रही जबकि भाजपा ने खटटर, सैनी के साथ ही मप्र के मुख्यमंत्री डाॅ मोहन यादव, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ तक को चुनावी समर में तैनात कर दिया। बीजेपी में टिकट वितरण सभी पैमानों को देखकर किया गया तो कांग्रेस में हुडडा की पसंद पर टिकट बांट दिए।बहरहाल, भाजपा ने हरियाणा जीतने के लिए तमाम हथकंडे इस्तेमाल किए जो संभव थे। इसी की एक कड़ी थी राम रहीम की चुनाव से ठीक पहले पैरोल। राम रहीम की हरियाणा और पंजाब सहित दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में अच्छी पैठ हैं। राम रहीम को पैरोल मिलते ही इसका अंदाजा तो सभी को हो गया था कि वो कुछ बड़ा करने वाला है। हरियाणा के आधा जिलों में उसके समर्थकों की इतनी तादाद है कि वो चुनावी परिणाम को किसी के भी पक्ष में कर सकते हैं। बताया जाता है कि वोटिंग के ठीक पहले डेरा सच्चा सौदा के मुख्यालय में सत्संग हुआ था जिसमें समर्थकों या अनुयायियों को बीजेपी के फेवर में वोट करने का गुप्त संदेश दिया गया था। ये संदेश सीधे तौर पर या खुले तौर पर नहीं था बल्कि राम रहीम के करीबियों ने लोगों को दिया। ये कोई पहला मौका नहीं था बल्कि सन 2014 के लोकसभा चुनाव में भी डेरा सच्चा सौदा ने खुले तौर पर भाजपा का समर्थन किया था। इसके अगले ही साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी भाजपा के लिए वोट मांगे थे। दिल्ली के साथ ही बिहार विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी के चुनावी प्रचार की मुहिम चलाई थी।कुल मिलाकर, सबका साथ – सबका विकास……….. यानि बीजेपी को वोट लेने के लिए बलात्कार और हत्या के दोषी का भी सहारा लेना पड़ा कोई गुरेज नहीं। मालूम हो कि गुरमीत राम रहीम सिंह इन्साँ हरियाणा के सिरसा में स्थित संस्था डेरा सच्चा सौदा का प्रमुख था। डेरा सच्चा सौदा की स्थापना 1968 में शाह मस्ताना जी द्वारा की गई थी। गुरमीत इस संस्था के तीसरे प्रमुख थे। इनके कार्यकाल में डेरा का अच्छा खासा प्रचार प्रसार हुआ और इनके अनुयायियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई लेकिन गुरमीत राम रहीम सिंह हमेशा विवादों में भी बने रहे। 25 अगस्त 2017 को एक यौन शोषण मामले में अदालत ने राम रहीम को दोषी करार दिया। इस मामले में राम रहीम को 20 साल के सश्रम कारावास व 65 लाख रूपये जुर्माने की सजा हुई। इसके अलावा राम रहीम को पत्रकार राम चन्द्र छत्रपति हत्या काँड में 11 जनवरी 2019 को दोषी करार दिया गया और दिनांक 17 जनवरी 2019 को सीबीआई की विशेष आदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन पुलिस के द्वारा नाबालिग बच्ची को आठ घंटे में उज्जैन से बरामद किया. मोहित यादव बने समाजवादी पार्टी के युवजन जिलाध्यक्ष,पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का आभार किये व्यक्त।