भोपाल, मप्र । मुस्ताअली बोहरा,अधिवक्ता एवं लेखक जा पर कृपा राम की होई, ता पर कृपा करहिं सब कोई। जिनके कपट, दम्भ नहिं माया, तिनके ह्रदय बसहु रघुराया।।रामायण की इस चैपाई का अर्थ है कि जो कपट, दम्भ और माया से परे है, वो ही भगवान् श्री राम के कृपा पात्र है और जिन पर राम की कृपा है उन्हें कई सांसारिक दुःख छू तक नहीं सकता।…… यहां प्रसंग है अयोध्या (फैजाबाद लोस सीट) और देश के सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश के चुनावी परिणाम का। जिस तरह से अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण, फिर प्राण-प्रतिष्ठा और सूर्य तिलक तक का आयोजन किया गया था उसके बाद अयोध्या में ही भाजपा की पराजय अपेक्षित तो नहीं थी। जिस अयोध्या के दम पर भाजपा और खासकर पीएम नरेन्द्र मोदी ने देश भर में वोट बटोरे, जिस अयोध्या और यूपी के दम पर मोदी ने इससे पहले के दो आम चुनाव में सत्ता हासिल की, जिस राम जन्मभूमि के दम पर इस बार के आम चुनाव में भी वोट मांगे उसी अयोध्या (फैजाबाद लोस सीट) से मिली पराजय ने भाजपा की जीत को फीका कर दिया है। जिन गैरभाजपाई दलों के नेताओं ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह से दूरी बनाई या आमंत्रण स्वीकार नहीं किया उन्हें रामद्रोही तक कह दिया गया था। इलेक्शन कैंपनिंग के दौरान यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी कई मर्तबा कहा कि यह लड़ाई रामभक्तों और रामद्रोहियों के बीच है। अब रिजल्ट आने के बाद स्पष्ट हो गया कि वास्तव में रामभक्त कौन है और रामद्रोही कौन। अयोध्यावासियों की भाजपा की कथित उपेक्षा का दंश सदियों तक भाजपा को सालता रहेगा। चुनावी परिणाम आने के बाद से लेकर अब तक सोशल मीडिया पर अयोध्यावासियों की खूब लानत-मलामत की जा रही है। तो क्या राम मंदिर के नाम पर वोट नहीं मांगे और डाले गए, क्या हिंदुत्व के नाम पर वोट नहीं डाले गए। लेकिन, बात सिर्फ अयोध्या की नहीं है काउंटिंग के दौरान शुरूआती रूझान में तो पीएम मोदी भी बनारस से पीछे चल रहे थे, हालांकि बाद में उन्होंने बढ़त हासिल कर ली थी। बावजूद इसके पीएम मोदी भी महज डेढ़ लाख वोटों के अंतर से जीत पाए। 2019 के आम चुनाव में मोदी को बनारस के करीब 4 लाख 80 हजार वोटों से जीत मिली थी। तब उन्हें लगभग 63 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि इस बार 54 फीसदी ही वोट मिले।जहां तक यूपी में समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन का सवाल है तो सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की रणनीति को तो दिग्गज रणनीतिकार भी समझ नहीं पाए। अखिलेश ने टिकट वितरण में कमाल की सोशल इंजीनियरिंग दिखाई। मुसलमानों और यादवों को कम टिकट दी गई बल्कि जिन सीटों पर जिस समाज या मजहब की ज्यादा आबादी थी वहां उस समाज के व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया गया। यही वजह रही कि दलित और पिछड़ी जातियों का वोट भी सपा को मिला। इसके अलावा जिस तरह से हिंदुत्व के नाम पर मंहगाई, बेरोजगारी और अन्य स्थानीय समस्याओं को नजरअंदाज किया गया वह भी भाजपा के खिलाफ गया। भले ही अयोध्या में भव्य और दिव्य मंदिर बनाया जा रहा हो लेकिन वहां के लोगों को न तो रोजगार मिला और ना जमीन का मुआवजा और ना विस्थापितों के पुर्नवास का माकूल इंतेजाम ही हो पाया। चुनाव प्रचार के दौरान हिन्दु-मुसलमान भी किया गया लेकिन इसके पीछे की नियत भी मतदाताओं ने भांप ली थी। तत्कालीन सांसद और भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह ‘चार सौ पार’ के प्रधानमंत्री के नारे की सफलता को संविधान बदलने के लिए जरूरी बताकर इस सीट पर भी जीत जरूरी बताने लगे थे, संविधान बदलने का बयान भी भारी पड़ गया।यूपी के चुनावी नतीजों ने समाजवादी पार्टी पर लगे यादव और मुसलमानों की पार्टी होने के ठप्पे को उतार फेंका हैं। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की राजनीतिक समझ और टिकट वितरण के तरीके ने भी ये बता और जता दिया कि उन्हें राजनीति में बच्चा समझना भूल थी। सामान्य सीट से दलित प्रत्याशी खड़े करके उन्होंने जो प्रयोग किया वो कामयाब रहा। सपा ने भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या की फैजाबाद सामान्य सीट पर तो दलित प्रत्याशी उतारा, मेरठ में ‘टीवी के राम’ कहलाने वाले भाजपा के अरुण गोविल के खिलाफ भी दलित महिला प्रत्याशी उतारा। फैजाबाद में अवधेश प्रसाद प्रचार अभियान में कहते रहे कि बसपा के संस्थापक कांशीराम ने कभी दलितों के लिए आरक्षित लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ा और सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने उन्हें इटावा सीट से लोकसभा पहुंचाया था। अवधेश प्रसाद चुपचाप चुनाव प्रचार करते रहे और उन्होंने भाजपा के किले सेंध लगा दी। खैर, अयोध्या-फैजाबाद की बात की जाए तो भाजपा प्रत्याशी को करीब पांच लाख वोट मिले हैं, ये वोट भी मतदाताओं के ही हैं। वैसे सीएम योगी आदित्यनाथ भी यादव समाज के व्यक्ति को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में थे। जो भी इस सीट से भाजपा के कोर वोटर ने तो वोट दिया ही है। अब यदि भाजपा की पराजय के लिए अयोध्यावासियों को कोसा जा रहा है तो इसे सहीं नहीं ठहराया जा सकता। महज राजनीति के लिए किसी को धर्मद्रोही या देशद्रोही कहना भी उचित नहीं है। चुनावी नतीजों से उन लोगों को नसीहत लेने की जरूरत है जो ये कह रहे थे कि हम राम को लाए हैं….अरे भई रामजी तो कण-कण में हैं, हर घर-आंगन में हैं, लोगों के मन में हैं इसलिए ये गलतफहमी निकाल दीजिए कि हम राम को लाए हैं। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन थाना प्रभारी अमिलिया, पिता के निधन पर राष्ट्रीय मीडिया संघ व एजेंसी ने शोक संवेदना व्यक्त किए। “नया सवेरा-एक नई शुरूआत” नशे के खिलाफ़ पुलिस ने छेड़ा अभियान .