भोपाल, मप्र  –मुस्ताअली बोहरा, अधिवक्ता एवं लेखक

आपके अंदर मेरे लिए नफरत है, आपके अंदर मेरे लिए गुस्सा है, आपके लिए मै पप्पू हूं। आप मुझे अलग-अलग गाली दे सकते हैं मगर मेरे अंदर आपके खिलाफ इतना सा भी गुस्सा, इतनी सी भी नफरत, इतना सा भी क्रोध नहीं है क्योंकि मै कांग्रेस हूं, ये सब कांग्रेस है और कांग्रेस ने और इस भावना ने इस देश को बनाया है।
… ये बात राहुल गांधी ने सदन में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान कही थी। अपनी बात खत्म कर राहुल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीट तक गए और उनके गले भी लगे थे। इस पूरे वाकये को राहुल की सादगी के तौर पर देखा जा सकता है। कांग्रेस के ही भीतरखाने और कांग्रेस के भीतर भले ही कुछ लोग राहुल को पीएम मटेरियल ना मानें लेकिन राहुल समर्थक और युवाओं का एक वर्ग उनमें पीएम की झलक देखता है। राहुल में अपार क्षमताओं को उनकी दादी इंदिरा गांधी ने तब ही पहचान लिया था जब वो महज चौदह साल के थे। इंदिरा गांधी तब राहुल से उन विषयों पर चर्चा करती थीं जो वो राजीव या सोनिया से भी नहीं कर पातीं थीं। मोदी की तुलना में राहुल पीएम बनने लायक है या नहीं ये बहस का विषय हो सकता है लेकिन ऐसा नहीं है कि राहुल में खूबियां है ही नहीं
राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 को नई दिल्ली में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री गांधी और पूर्व काँग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के यहां हुआ था। वह अपने माता-पिता की दो संतानों में बड़े हैं और प्रियंका गांधी वढेरा (वाड्रा)  के बड़े भाई हैं। राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी भारत की पूर्व प्रधानमंत्री थी
राहुल गांधी की प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल से हालिस की। इसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध दून विद्यालय में दाखिला लिया, यहां से राहुल के पिता राजीव गांधी ने भी शिक्षा हासिल की थी। सन 1981-83 तक सुरक्षा कारणों के चलते राहुल गांधी को अपनी पढ़ाई घर पर ही करनी पड़ी। इसके बाद सन 1994 में राहुल ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ्लोरिडा से कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद सन 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की है। वर्ष 2003 से ये कयास लगाए जाने लगे कि राहुल गांधी राजनीति में आ सकते हैं। सन 2004 में अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ने के ऐलान के साथ वो राजनीति में आ गए थे। उन्होंने दो लाख नब्बे हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। इसके बाद राहुल पार्टी की बड़ी बैठकों और अहम फैसलों में शामिल होने लगे। 2013 में उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद 2014 और 2019 के आम चुनाव में भी राहुल सक्रिय भूमिका में रहे लेकिन पार्टी का इन चुनावों में आशातीत कामयाबी नहीं मिली।

2024 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अधिकांश चुनावी भाषण कांग्रेस, राहुल, मुसलमान, पाकिस्तान के ईर्द-गिर्द ही घूम रहे हैं। मोदी और उनकी पार्टी के दूसरे नेता कांग्रेस और खास तौर पर राहुल गाँधी पर लगातार हमले करते हुए उन्हें घेरने की कोशिश करते रहे हैं। यदि मोदी, राहुल को लगातार निशाने पर ले रहें हैं तो कोई खास वजह होगी ही। राजनीतिज्ञों का मानना है कि भाजपा के बाद कांग्रेस ही बड़ा दल है और राहुल ही ऐसे नेता हैं जो मोदी और मोदी नीतियों को लेकर शुरू से ही मुखर रहे हैं। चाहे मंहगाई हो, या फिर रोजगार अथवा औद्योगिक तरक्की की बात अथवा विदेश नीति की, राहुल बेबाक तरीके से आवाज उठाते रहे हैं।

राहुल के भाषणों में उनकी दूरदृष्टि और सोच इन मामलों को लेकर साफ नजर आती है। राहुल जो भी बोलते हैं वो साहस के साथ बोलते हैं और फिर उसके राजनीतिक परिणाम की चिंता नहीं करते। भारतीय लोकतंत्र के ताजा हालात को लेकर बोलते हैं तो पेगासस विवाद, चीन के खतरे, चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को लेकर मुखरता से बोलते हैं। इसके अलावा लगातार सेंधमारी, कांग्रेसियों के भाजपा में जाने के सिलसिले के बीच यदि कांग्रेस आज भी चुनावी समर में डटी है तो इसके पीछे राहुल गांधी की ही मशक्कत है। राहुल चुनाव से पहले से लेकर अब तक लगातार लोगों के बीच सम्पर्क बनाए हुए हैं। उन्होंने कभी मोहब्बत की दुकान के जरिए तो कभी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के जरिए लोगों तक ये संदेश पहुंचाने की कोशिश की कि ये लड़ाई सत्ता की नहीं है अलबत्ता विचारधारा की लड़ाई है। राहुल, आम मतदाता के बीच अपनी पार्टी की ऐसी छबि गढ़ रहे हैं जो जन समस्याओं से सरोकार रखती है, जो मजहब के नाम लोगों को बांटने की बजाए जोड़ने का काम करती है, जो नफरत की बजाए मोहब्बत फैलाने का काम करती है।

वे कई बार कह चुके हैं कि नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोल रहा हूं। आप मुझसे नफरत करो, आप मुझे गाली दो, ये आपके दिल की बात है। आपका बाजार नफरत का, मेरी दुकान मोहब्बत की।
जहां तक कांग्रेस से इस्तीफा देने और कांग्रेस छोड़ भाजपा में जाने वालों का सवाल है तो ये जाहिर हो गया है ऐसे लोग जिन्हें किसी पद की लालसा थी, या किसी तरह के दबाव या खौफ में थे, वो लोग साथ छोड़कर चले गए। ये लोग किसी विचारधारा से प्रभावित होकर दूसरे दलों में नहीं गए थे। जाने वालों में राहुल के करीबी भी थे मसलन मिलिंद देवड़ा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अशोक चव्हाण सहित कई ऐसे नेता हैं जो लंबे समय तक राहुल के करीबी रहे। राजनीतिज्ञों का मानना है कि युवाओं या नए चेहरों को पार्टी में जगह नहीं दी गई। हालांकि ऐसा नहीं है, संगठन और जहां कांग्रेस सत्ता में थी वहां भी युवा चेहरों को बुजुर्गों पर तरजीह दी गई।

राहुल को घमंडी बोला गया, पप्पू बोला गया, नामदार पुकारा गया तो कभी शहजादा लेकिन ये तो तय है कि भले ही राहुल को बेहतर राजनेता ना माना जाता हो लेकिन अच्छा इंसान जरूर माना जाता है। ऐसा नहीं है कि राहुल में कमियां नहीं हैं। वो कभी धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं तो कभी खुद को कश्मीरी ब्राम्हण बताते हैं जिसका गोत्र दत्तात्रेय है। कभी औद्योगिक घरानों का विरोध करते हैं तो कभी किसानों और आदिवासियों के हक का मसला उठाते हैं। कभी जातिगत जनगणना की बात करते हैं तो कभी महिलाओं की बात करने लगते हैं। मुददों को पकड़कर उसे अंजाम तक ले जाने में वे कामयाब होते नहीं दिखते। राहुल को अहंकारी बताते हुए कहा गया कि उनकी न्याय यात्रा में उमड़ी भीड़ से ही उनमें अहंकार का भाव पैदा हुआ। राहुल की इमेज एक अपरिपक्व राजनेता की सी नजर आती है। इसकी बानगी कांग्रेसनीत इंडिया गठबंधन में सीटों के बटवारे में दिखी। राहुल पर गठबंधन धर्म ना निभाने का आरोप लगाते हुए कहा गया कि कांग्रेस ने सहयोगी दलों की कई सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए लेकिन उनके लिए सीटें नहीं छोड़ीं। हालांकि, इस मामले में कांग्रेसी खेमे के अपने तर्क हैं। वहीं, राहुल समर्थकों का ये भी मानना है कि मीडिया ने मोदी की इमेज गढ़ी और इसके विपरीत राहुल की इमेज को कमतर बनाया गया। जिस तरह से राहुल की निगेटिव इमेज बनाई गई उससे भी ये माना जा सकता है कि राहुल एक ऐसा ब्रांड है जिससे भाजपा को खतरा दिखता है। बहरहाल, बहुत से लोगों को राहुल को राजनेता मानने में भले ही वक्त लगे लेकिन सादगीपूर्ण और साफ दिल वाला इंसान तो माना ही सकता है। ये भी हो सकता है कि यही गुण उन्हें एक दिन सफल राजनेता भी बना दे और इसकी गवाही खुद राजनीतिक परिदृश्य दे।

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