भोपाल, मप्र। मुस्ताअली बोहरा , अधिवक्ता एवं लेखक होइहि सोइ जो राम रचि राखा. को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ रामचरित मानस की इस चैपाई का तात्पर्य है कि जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा या चिंता को बढ़ाए। …..जिस तरह से श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई उससे यही लगता है कि सब श्रीराम ने रच रखा था। कब और किसकी अगुआई में मंदिर निर्माण होगा, कौन पहली आरती करेगा, किन धर्माचार्यों और संतों की प्रमुख मौजूदगी होगी, किस विधि विधान से कार्यक्रम होगा, कौन-कौन आएगा और कौन नहीं, ये सब रामजी की मर्जी से तय था। ताला खुला कांग्रेस के कार्यकाल में, उसी दौरान शिलान्यास भी हुआ लेकिन बाद में फिर पीएम नरेन्द्र मोदी ने मंदिर का शिलान्यास किया और उन्हीं के कार्यकाल में मंदिर का निर्माण जारी है। मंदिर का निचला तल बन जाने के बाद उसमें रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा भी हो गई। तंबू से निकलकर भव्य महल में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा समारोहपूर्वक हो गई। किसी ने आपत्ति जताई तो कोई असहमत था, हजारों लोगों ने मन से शिरकत की तो कुछ ने मजबूरी में। उत्साह इतना था कि देश भर में सनातनियों के साथ ही दिगर मजहब के लोगों ने भी दिए जलाए तो कई लोगों के दिल जल गए। इस समारोह में 3 हजार वीवीआईपी सहित 7 हजार लोगों को आमंत्रित किया गया था। इनमें से कई लोगों ने आयोजन में जाने से परहेज किया तो कुछ लोग निजी कारणों से इस एतिहासिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बन पाए। कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिाकुर्जन खड़गे, राहुल गांधी, लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चैधरी, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, तृणमूल कांग्रेस नेत्री और पश्चिम बंगाल की मुख्यमत्री ममता बनर्जी, आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, सीपीआई-एम के महासचिव सीताराम येचुरी, एनसीपी प्रमुख शरद पवार, पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे समारोह में शामिल नहीं हुए। भाजपा के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होने को लेकर भी विरोधाभास रहा। गैरभाजपाई नेताओं ने इस आयोजन को भाजपा का इवेंट बताया। तो दूसरी तरफ, समारोह में ना शामिल होने के निर्णय को लेकर कांग्रेस के तो कुछ नेताओं ने ही अपनी पार्टी की मुखालफत की। गुजरात कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अर्जुन मोढवाडिया ने कहा कांग्रेस को ऐसा नहीं करना चाहिए। कार्यक्रम में न जाने का फैसला सही नहीं है। महज, विपक्षी राजनेताओं ने ही किनारा नहीं किया बल्कि कुछेक धर्माचार्यों ने भी अपनी आपत्ति जाहिर की। कुछेक लोगों की आपत्ति और असहमति के बावजूद प्राण-प्रतिष्ठा हुई यानि होइहि सोइ जो राम रचि राखा…। प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का मुहूर्त घोषित होते ही शंकराचार्यो के बयान मीडिया में आने लगे। किसी ने इसे प्रोपेगंडा की राजनीति बताया तो किसी ने एक आदमी का निमंत्रण। पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि वह इस कार्यक्रम में ताली बजाने थोड़े ना जाएंगे। उन्हें अपने पद का अभिमान नहीं, अपने पद की गरिमा का ज्ञान है। उन्होंने कहा कि वह भगवती सीता को पहले अपनी बड़ी बहन मानते थे, लेकिन वह खुद छोटी बहन बनना पसंद करती है। उनके इस रिश्ते को कोई तोड़ नहीं सकता। ऐसे में उन्हें अयोध्या से कोई परहेज हो ही नहीं सकता। दूसरी ओर, हिन्दू महासभा उत्तर प्रदेश ने श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य जगतगुरु स्वामी भारती तीर्थ के हवाले से एक वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया। इस वीडियो में कहा गया कि हिन्दू समाज को मूर्ख बनाने और लोकसभा चुनाव से पहले प्रोपेगंडा खड़ा करने के लिए यह भाजपा का प्रयोजित कार्यक्रम है। वहीं, शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती का कहना था कि पौष के अशुभ माह में प्राण प्रतिष्ठा का कोई कारण नहीं है। यह सीधे तौर पर बीजेपी के राजनीतिक हित साधने वाला है। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी ने अपने बयान में कहा कि शंकराचार्य केवल धर्म व्यवस्था देते हैं, उन्होंने कहा कि चंपत राय को यह जानना चाहिए कि शंकराचार्य व रामानंद संप्रदाय के धर्मशास्त्र भिन्न नहीं होते। रामानंद संप्रदाय का अगर ये मंदिर है तो चंपत राय और दूसरे लोग वहां क्यों हैं ? वहां से हट वे लोग जाएं। यह मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के पहले ही रामानंद संप्रदाय को सौंप दें,वहां प्राण प्रतिष्ठा रामानंद संप्रदाय के लोग ही करेंगे। कुछेक लोगों का ये भी कहना था कि आधे-अधूरे मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा कर ली गई। बावजूद इसके भव्य तौर पर और देश भर में उत्साह के साथ रामजी तंबू से निकलकर महल में विराजे यानि होइहि सोइ जो राम रचि राखा…..। वहीं, प्राण प्रतिष्ठा समारोह में कांग्रेस के शामिल न होने पर पार्टी नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि राम किसी पार्टी के नहीं है। हमारी लड़ाई राम या अयोध्या से नहीं, बीजेपी से है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और शिवसेना (उद्धव गुट) सहित कुछ और पार्टियों के दिग्गजों ने समारोह से दूरी बनाए रखी। 22 जनवरी 2024 को रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने की वजह से ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के चीफ इमाम डॉ. इमाम उमेर अहमद इलियासी के खिलाफ फतवा जारी कर दिया गया। इसको लेकर डाॅ अहमद इलियासी ने दो टूक जवाब देते हुए कहा कि जो लोग मुझसे नफरत करते हैं वो पाकिस्तान चले जाएं। मैने प्यार का पैगाम दिया है, कोई गुनाह नहीं किया। विश्व हिन्दु परिषद ने उनके खिलाफ जारी फतवे को दुर्भाग्यपूर्ण बताया था। आठ बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार, पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार,. पद्म श्री और पद्म भूषण से नवाजे जा चुके मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने कहा था कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, जब सुप्रीम कोर्ट ने ही फैसला दिया है कि अयोध्या में मंदिर बनना चाहिए, फिर इस पर हंगामा करने का मतलब ही नहीं बनता। मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे द्वारा आयोजित दीपोत्सव कार्यक्रम में बोलते हुए गीतकार जावेद अख्तर ने कहा था कि भगवान राम और देवी सीता न केवल हिंदू देवी-देवता हैं बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत है। खैर, राम तो तर्क-वितर्क से परे हैं, यानि होइहि सोइ जो राम रचि राखा……। कांग्रेस के ही एक खेमे का मानना था कि आखिरकार रामजन्मभूमि के ताले तो राजीव गांधी ने ही खुलवाए थे। उसी दरमियान शिलान्यास भी किया गया था। पार्टी आलाकमान के पास एक अच्छा मौका था लोगों को ये बताने का कि राम मंदिर में उसकी क्या भूमिका रही है लेकिन पार्टी ने ये मौका भी गंवा दिया। यदि राजीव गांधी असमय काल कवलित नहीं होते तो राम मंदिर का निर्माण उन्हीं के कार्यकाल मे होता। राजीव गांधी ने पूरे सोच-विचार और रणनीति के बाद ताले खुलवाए थे। जिस तरह से भाजपा ने ये बात प्रमोट की कि मंदिर उसके कार्यकाल में बना है उसी तरह कांग्रेस भी राम मंदिर के ताले खुलवाने की बात लोगों तक पहुंचाकर भाजपा की काट कर सकती थी। लोगों को ये बता सकती थी कि यदि राजीव गांधी की असमय मौत नहीं होती तो मंदिर कब का बन गया होता। लेकिन, समारोह से दूरी बनाकर कांग्रेस ने उल्टा भाजपा को ही वार करने का मौका दे दिया। ज्यादा परेशानी कार्यकर्ताओं को हो रही है। वे लोगों को राम विरोधी होने के आरोपों का जवाब भी नहीं दे पा रहे हैं। इतना ही नहीं कांग्रेस इस मामले में अलग-थलग पड़ गई। सपा प्रमुख अखिलेश यादव भले ही समारोह में न गए हो लेकिन उन्होंने बाद में सपरिवार अयोध्या जाने की बात कही। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता के काली मंदिर में पूजन किया। आप के मुखिया और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सुंदरकांड आयोजन करवा दिया। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती ने पत्रकार वार्ता बुलाकर आयोजन का स्वागत किया। यानि, कांग्रेस से ज्यादा समझदार तो छोटे दल निकले। अब, कई लोगों को ये लग रहा है कि जो कुछ हो रहा है वह सब प्रभु के हिसाब से ही हो रहा है यानि होइहि सोइ जो राम रचि राखा….। दरअसल, अयोध्या मामले में हिन्दुओं के पक्ष में फैसला आने के बाद राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट की देखरेख में अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को भी पृथक स्थान पर भूमि आबंटित करते हए उन्हें भी मस्जिद बनाने की अनुमति दे दी है। मंदिर बन तो रहा है सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लेकिन सेहरा सज रहा है भाजपा के सिर। समारोह के लिए मिले न्यौते को ठुकराकर विपक्ष ने भाजपा की राह और आसान कर दी है। राम मंदिर के अलावा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल कॉरिडोर और कामाख्या दिव्यलोक काॅरिडोर निर्माण आदि के कदमों से भाजपा अपने अजेंडे पर आगे बढ़ रही है। जहां तक रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण का मसला है तो इस मामले में कई राजनीतिज्ञयों का मानना है कि चूंकि केन्द्र और संबंधित राज्य में भाजपा की सरकार है लिहाजा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने की जिम्मेदारी भी उसी की होती। अब, इसे भाजपा की उपलब्धि मानना सहीं नहीं होगा। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि लगातार बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी सहित अन्य मसलों से ध्यान हटाने के लिए राम मंदिर को इवेंट के रूप में परोसने का काम भाजपा ने किया है। लोगों के ये बताने और जताने की कोशिश की जा रही है कि राम मंदिर का निर्माण भाजपा ने ही किया है। जिन नेताओं ने राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से दूरी बनाई थी उनका तर्क था कि भगवान और भक्त के बीच आने वाली भाजपा कौन होती है। जब भाजपा का अस्तित्व नहीं था तब भी उसके पहले के कई सालों से भगवान राम की पूजा होती आ रही है और होती रहेगी। इन नेताओ का कहना था कि वह अयोध्या जरूर जाएंगे और रामलला के दर्शन भी करेंगे इसके लिए भाजपा के बुलावे की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि भाजपा भले ही रामजी के नाम पर वोट मांगे लेकिन वह बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी, अत्याचार आदि को लेकर प्रदर्शन करते रहेंगे और भाजपा से सवाल भी। तो, सवाल और जवाब दोनों का दौर जारी है, यानि होइहि सोइ जो राम रचि राखा……। सदियों के इंतेजार के बाद रामलला अपने भव्य भवन में विराजमान हो गए हैं। एक बड़े तबके को लग रहा है कि अब राम राज ज्यादा दूर नहीं है। रामचरित मानस में भी तुलसीदास जी ने श्रीराम को राजा राम के रूप में संबोधित करते हुए कई स्थानों पर उनके राजधर्म का बखान किया है। इसी तरह महात्मा गांधी ने राम राज की कल्पना की थी। सनातनियों के ज़हन में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के बाद जो अक्स उभरा वह राम राज के दिवास्वपन के मूर्तरूप होने जैसा ही है। जहां तक पीएम नरेन्द्र मोदी और भाजपा का सवाल है तो भाजपा ने इस आयोजन को इतना बड़ा स्वरूप दे दिया कि देश ही नहीं विदेशों तक में इसकी चर्चा हुई। रहा सवाल मोदी का तो, मोदी वो हैं जिन्होंने अपने विरोधियों के माथे पर भी तिलक लगवा दिया, रामजी के जयकारे लगवा दिए, कमांडोज तक को धोती पहना दी, उन्होंने मंदिर ही नहीं कई दरगाह और मस्जिद तक में दिए जलवा दिए। इससे पहले रामजी का नाम उत्साह के साथ उन्माद से लिया जाता था और जय-जय श्रीराम का नारा देश भर में गूंज रहा था लेकिन मोदीजी ने राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के बाद संबोधन की शुंरूआत राम-राम और समापन जय सियाराम से कर के बता दिया कि राम तो सबके हैं। उन्होंने संदेश दिया कि राम.. मर्यादा पुरूषोत्तम हैं, राम राजा है, राम आदर्श हैं, राम संयम हैं, राम ही सत्य हैं। बहरहाल, गैरभाजपाई राजनीतिक दल और मोदी विरोधी भले ही राम मंदिर को इवेंट बता रहे हो और इसे आने वाले लोकसभा चुनाव से जोड़कर देख रहे हो लेकिन भाजपा को राजनीतिक प्रसाद मिलेगा या नहीं ये तो रामजी ही जाने, होगा वहीं……….होइहि सोइ जो राम रचि राखा……। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन छत्तीसगढ़ : अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर और जनता ‘राम नाम सत’ 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