भोपाल । मुस्ताअली बोहरा,अधिवक्ता एवं लेखक एक बार फिर से देश का अन्नदाता अपनी मांगों को लेकर आंदोलन पर है। ये पहली मर्तबा नहीं है जब किसान बर्बाद हुई फसलों के मुआवजे, फसलों की वाजिब कीमत, कर्ज माफी सहित अन्य मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन में महिलाएं भी शामिल हो गई हैं और यह सब तब हो रहा है जब ड्रोन से आंसू गैस के गोले गिराए जा रहे हैं, रबड़ की गोलियां चलाई जा रही हैं। इसके साथ ही वाटर कैनन का इस्तेमाल किया जा रहा है। अंबाला के शंभू बॉर्डर पर डटे हुए किसानों के साथ मौजूद महिलाओं का कहना है कि यह पंजाब-हरियाणा का बॉर्डर है कि भारत-पाकिस्तान का ? अपने ही देश में जाने के लिए इस प्रकार यह सब कुछ हो रहा हो। किसान नेताओं का साफ कहना है कि वह हर हाल में दिल्ली जाएंगे, उसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े। सरकार दिल्ली जाने से नहीं रोक सकती। मालूम हो कि किसानों के दो बड़े संगठनों, संयुक्त किसान मोर्चा (गैर राजनैतिक) और किसान मजदूर मोर्चा ने पहले ही घोषणा की हुई थी कि वो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन करेंगे। किसान एमएसपी पर कानून बनाने, स्वामीनाथन आयोग की सभी सिफारिशों को लागू करने, सभी फसलों के लिए एमएसपी घोषित करने और उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में कथित तौर पर किसानों को कुचलकर मारने के दोषियों पर कार्रवाई समेत अन्य मांगों को लेकर दिल्ली की ओर रवाना हुए हैं। किसान संगठनों के नेताओं और केन्द्र सरकार के बीच मांगों को लेकर बात भी हुई लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है। केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, कृषि मंत्री अर्जुन मुडा, केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर तक बातचीत से हल निकाले जाने की बात कह चुके हैं। इधर, किसान नेता राकेश टिकैत ने आरोप लगाया है कि सरकार बातचीत को तैयार ही नहीं है बल्कि किसानों पर जुल्म ढाया जा रहा है। इससे पहले भी 2020 के आखिर में एमएसपी और तीन नए कृषि कानून को लेकर देश भर के किसानों ने आंदोलन किया था जो एक साल तक चला था। 2023 में भी चंडीगढ़, दिल्ली, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों ने आंदोलन किया था। केन्द्र की कृषि नीतियों की मुखालफत और अपनी मांगों को लेकर किसानों ने कभी चंडीगढ़-दिल्ली नेशनल हाईवे को जाम किया तो कभी रेल रोको आंदोलन किया, तो कभी मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में किसानों ने सैकड़ों बैलगाड़ियों से जाम लगाकर अपनी मांगों की ओर ध्यान दिलाया। नए कृषि कानून को लेकर जब दिसंबर 2021 में किसान आंदोलन समाप्त हुआ तो इसके बाद संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्यों के भीतर मतभेद उभर आए, जिसके कारण एसकेएम (गैर-राजनीतिक) का निर्माण हुआ, जो बाद में किसान मजदूर मोर्चा में बदल गया। केएमएम और एसकेएम दोनों ही अपने अपने स्तर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। एसकेएम (गैर-राजनीतिक) ने दावा किया है कि उसे राष्ट्रीय स्तर पर कम से कम दो सैकड़ा संगठनों का समर्थन प्राप्त है, जिनमें से डेढ़ दर्जन तो अकेले पंजाब से हैं। पंजाब-हरियाणा से हुए इस आंदोलन की आंच तमिलनाडु तक जा पहुंची हैं। यहां के किसानों ने भी प्रदर्शन शुरू कर दिया है। अपनी मांगों को लेकर किसान दोबारा सड़कों पर हैं। इस बार किसान अपनी अलग-अलग मांगों को लेकर अड़े हुए हैं। इस आंदोलन को भी साल 2021 के आंदोलन से ही जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन इस बार के आंदोलन को सभी किसान संगठनों का समर्थन हासिल नहीं है। इस बार का किसान आंदोलन संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले नहीं हो रहा बल्कि इसे पंजाब-हरियाणा और कई राज्य के अलग-अलग किसान संगठन मिलकर आयोजित कर रहे हैं। इस बार का किसान आंदोलन पिछली बार साल 2020-21 में हुए आंदोलन की तुलना में कई मायनों में अलग है। इस बार किसानों की मांग भी अलग है और नेतृत्व भी। पिछली बार किसानों का आंदोलन कृषि कानूनों के खिलाफ था और वो इसमें सफल भी हुए थे क्योंकि सरकार ने इन कानूनों को वापस ले लिया था और एमएसपी पर गारंटी देने का वादा किया था लेकिन किसानों का कहना है कि सरकार ने एमएसपी को लेकर जो वादे किए थे वो पूरे नहीं किए। इस बार किसानों की प्रमुख मांग है कि फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी वाला कानून बनाया जाए, सभी फसलों का मूल्य डॉक्टर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर तय हो और गन्ना भी इसमें शामिल हो, किसानों को 60 वर्ष की उम्र के बाद 10,000 रुपए प्रति महीना पेंशन दी जाए और अक्टूबर 2021 में लखीमपुर खीरी मामले के अपराधियों को सजा दी जाए। पंढेर और डल्लेवाल कर रहे आंदोलन को लीड किसान नेता राकेश टिकैत ने ही कृषि कानूनों के विरोध में 2020 में हुए किसान आंदोलन को लीड किया था। इस बार आंदोलन का नेतृत्व राकेश टिकैत नहीं बल्कि दो नए चेहरे कर रहे हैं। इसमें एक पंजाब के किसान नेता सरवन सिंह पंढेर और दूसरे जगजीत सिंह डल्लेवाल है। सरवन सिंह पंढेर पंजाब के अमृतसर जिले के गांव पंधेर के रहने वाले हैं। 45 साल के सरवन सिंह अकाली दल के नेता विक्रम मजीठिया के करीबी माने जाते हैं। माझा के किसान संगठन किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के महासचिव पंढेर पर साल 2020 में हुए किसान आंदोलन के दौरान दिल्ली में हिंसा भड़काने का आरोप भी लगा था। वो सरकार से बातचीत में शामिल किसानों की कमेटी भी भी शामिल रहे हैं। इसी तरह जगजीत सिंह डल्लेवाल पहले संयुक्त किसान मोर्चा का हिस्सा रहे हैं। बाद में उन्होंने बलबीर सिंह राजेवाल के साथ मिलकर चार अलग संगठन बना लिए। जगजीत सिंह डल्लेवाल के नेतृत्व में कृषि संगठन बीकेयू (एकता सिद्धूपुर) ने छोटे समूहों को साथ लिया और एक समानांतर संगठन एसकेएम (गैर-राजनीतिक) का गठन किया। इसमें हरियाणा, राजस्थान, एमपी के किसान समूह भी शामिल हैं। इसने किसान मजदूर मोर्चा के साथ हाथ मिलाया और दिल्ली चलो आह्वान के साथ अमृतसर और बरनाला में रैलियां कीं। टिकैत ने दिया समर्थन भारतीय किसान मोर्चा (टिकैत) के अध्यक्ष नरेश टिकैत और राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत का कहना है कि किसानों की अपनी समस्याएं हैं। यदि दिल्ली जा रहे किसानों पर अत्याचार हुआ, तो वह भी दिल्ली पहुंच जाएंगे। अलग-अलग राज्य में किसानों की अपनी समस्याएं हैं। देश में बहुत संगठन हैं, सब अपने तरीके से कार्य कर रहे हैं। सरकार गलत कर रही है, दीवार बना रही है, सड़कों पर कील ठोक रही है। पाकिस्तान बार्डर पर भी तार और कील ठुकी है क्या? उन्होंने कहा कि किसान और दिल्ली हमसे दूर नहीं है। इसी तरह राष्ट्रीय अध्यक्ष गुरनाम चढ़ूनी द्वारा भाकियू(चढ़ूनी) का कहना है कि जल्द ही वे भी रणनीति बनाएंगे। भाकियू(चढ़ूनी) के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष कर्म सिंह मथाना ने आंदोलनरत किसानो की माँगो का समर्थन किया है और सरकार द्वारा आंदोलन को कुचलने के लिए अपनाए जा रहे अमानवीय व असविधानिक तरीको की निंदा की है। हाईकोर्ट में पहुंचा मामलापंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में प्रदर्शन को लेकर दो याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इनमें से एक याचिका में दिल्ली जाने के लिए बॉर्डर सील करने के खिलाफ थी जबकि दूसरी याचिका प्रदर्शनकारियों के खिलाफ। इस दौरान हाई कोर्ट के कार्यकारी चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और जस्टिस लपिता बैनर्जी की डिविजन बेंच ने मैत्रीपूर्ण तरीके से मुद्दा सुलझाने के लिए कहा है। कोर्ट ने केंद्र, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शनकारी भारत के नागरिक हैं और उनके पास देश में मुक्त रूप से आने-जाने का अधिकार है। दुनिया भर में गूंजा था किसान आंदोलन गौरतलब है कि कृषि अध्यादेश 5 जून 2020 को आए थे, जिसके विरोध में किसान दिल्ली की सीमाओं पर 26 नवंबर 2020 से बैठ गए थे। असम, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, ओडिशा आदि में भी किसानों ने रैली निकालकर नए कानूनों के विरोध में अपना आक्रोश जाहिर किया। तीन दर्जन से ज्यादा किसान संगठन और इससे जुड़े हजारों किसानों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया था। अपनी मांगों को लेकर किसानों ने भारत बंद भी आहूत किया। इस बंद को दो दर्जन से ज्यादा राजनीतिक दलों ने समर्थन दिया था। इतना ही नहीं गणतंत्र दिवस पर भी किसानों ने देश की राजधानी दिल्ली में टेªक्टर परेड निकालकर प्रदर्शन किया था। किसान संगठनों ने लंबी लड़ाई लड़ी और आखिरकार सरकार को किसानों की सभी शर्तें माननी पड़ी। किसानों के इस आंदोलन को देखते हुए तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसानों से एमएसपी बरकरार रखने की बात कहकर आंदोलन खत्म करने की अपील की थी। 9 दिसंबर 2021 को किसानों के संगठन संयुक्त किसान मोर्चा ने किसान आंदोलन वापस लेने का ऐलान किया था। किसान नेताओं ने कहा ये एतिहासिक जीत है, जो आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले शहीदों को समर्पित है। तीनों कृषि कानूनों के अध्यादेश के रुप में वजूद में आने, संसद में उनके पास होने से लेकर वापसी तक जोरदार हंगामा रहा। तब जिन तीन नए कृषि कानूनों का विरोध किया गया था उनमें कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन व सरलीकरण) कानून-2020, कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून-2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून-2020 शामिल है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पद्म विभूषण सम्मान लौटाने की घोषणा की थी वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री एसएस ढींढसा ने पद्म श्री लौटाने का एलान किया था। ओलंपिक पदक विजेता बॉक्सर विजेंदर सिंह ने कहा था कि अगर किसानों की बात नहीं मानी गई तो वे अपना खेल रत्न पुरस्कार लौटा देंगे। पंजाब से शुरू हुए इस आंदोलन की गूंज कनाडा और अमेरिका तक में सुनाई दी थी। कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने किसानों के समर्थन में बयान दिया था। ब्रिटेन में कई सांसदों ने किसानों के प्रदर्शन को लेकर चिंताएं व्यक्त थी। मशहूर पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग, सिंगर रिहाना सहित कई सेलिब्रिटिज ने बयान जारी किए थे। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि नए कानूनों को लेकर गतिरोध कब और कैसे खत्म होता है। एमएसपी की जरूरत क्योंदरअसल, किसानों को उनकी उपज का न्यनूतम मूल्य मिल सकें इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था लागू की गई थी। यदि बाजार में कीमतें गिरने लगती हैं तो भी सरकार उपज एमएसपी पर खरीदती है। इससे किसानों को घाटा नहीं होगा। यहां ये बताना लाजमी होगा कि कृषि मंत्रालय कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के आंकड़ों के हिसाब से एमएसपी निर्धारित करता है। वर्तमान में करीब दो दर्जन फसलों की खरीद एमएसपी के हिसाब से होती है। वैसे, किसानों को कहना है कि गेहूं और धान का भंडारण बड़े पैमाने पर किया जाता है और इसलिए सरकार इन दोनों उपज को एमएसपी पर खरीदती है बाकी फसलों को तो किसान एमएसपी पर बेच ही नहीं पाते। यही वजह है कि किसान चाहते हैं कि एमएसपी की गारंटी हो अन्यथा निजी कंपनियां किसानों को कीमतें कम करने के लिए मजबूर सकती हैं। यहां ये बताना लाजमी होगा कि एमएसपी पर कानून बनते ही सरकारी खजाने पर बोझ भी बढ़ेगा। 2022-23 में एमएसपी पर सरकार ने 2.28 लाख करोड़ रुपए खर्च किए अगर एमएसपी पर कानून आ गया तो ये खर्चा बढ़कर 17 लाख करोड़ रुपए हो जाएगा। किसानों की प्रमुख मांगें हैं…– न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाया जाए।– दिल्ली मोर्चा के दौरान केंद्र सरकार की ओर से जिन मांगों को पूरा करने का भरोसा दिया गया था उन्हें तुरंत पूरा किया जाए।– साल 2021-22 के किसान आंदोलन में जिन किसानों पर मुकदमें दर्ज किए गए थे, उन्हें रद्द किया जाए।– पिछले आंदोलन में जिन किसानों की मौत हुई थी, उनके परिवार को मुआवजा तथा एक सदस्य को नौकरी दी जाए।– लखीमपुर खीरी हिंसा के पीड़ितों को केंद्र सरकार न्याय दे और परिवार के एक सदस्य को नौकरी दें।– सरकार सभी किसानों का सरकारी और गैर सरकारी कर्ज माफ करें।– 60 साल से ऊपर के किसानों को 10 हजार रुपये पेंशन दी जाए।– कृषि व दुग्ध उत्पादों, फलों, सब्जियों और मांस पर आयात शुल्क कम करने के लिए भत्ता बढ़ाया जाए।– स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू की जाए।– किसानों को प्रदूषण कानून से मुक्त रखा जाए।– विद्युत संशोधन विधेयक 2020 को रद्द किया जाए।– कीटनाशक, बीज और उर्वरक अधिनियम में संशोधन करके कपास सहित सभी फसलों के बीजों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन इंदौर लोकायुक्त संभाग टीम की बड़ी ट्रैप कार्यवाही. लाइनमैन को बीस हजार रिश्वत के साथ ट्रैप किया… इंदौर जिले के पूर्व कमिश्नर मकरन्द देऊस्कर को भावभीनी विदाई दी गई पुलिस विभाग द्वारा.