भोपाल। एमपीमुस्ताअली बोहरा, अधिवक्ता एवं लेखक
 वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पहली फरवरी को वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए अंतरिम बजट पेश कर दिया। लोकसभा चुनाव नजदीक ही हैं, इसलिए यह अंतरिम बजट है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का ये रिकॉर्ड छठा बजट है। अंतरिम बजट में मोदी सरकार की उपलब्धियों का बखान किया गया और अर्थव्यवस्था, विकास की सुनहरी तस्वीर पेश की गई। अंतरिम बजट से स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को आम चुनाव जीतने की कोई चिंता नहीं है, लिहाजा वित्त मंत्री ने दावा किया है कि जुलाई के पूर्ण और आम बजट में विकसित भारत के व्यापक विकास का रोड-मैप पेश किया जाएगा। अंतरिम बजट में किसी महत्त्वपूर्ण और नई परियोजना की घोषणा नहीं की गई है और न ही आयकर व्यवस्था में कोई बदलाव किया गया है। सरकार ने किसी भी तरह की कोई महत्वकांक्षी योजना की घोषणाा नहीं की है। नौकरीपेशा लोगों को उम्मीद थी कि करों में कुछ राहत मिल सकती है मगर इस तरह की कोई घोषणा ना करते हुए पुरानी दरों को ही यथावत रखा गया है। उत्पाद या सीमा शुल्क पर कुछ नहीं कहा गया है इसलिए आम चीजों की कीमतों में ना तो कमी होगी और इजाफा। विकास दर उंची रखने के दावे किए जा रहे हैं जिससे मंहगाई, बेरोजगारी, व्यापार घाटा पाटने सहित राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण रखने के लिए ठोस कदम उठाने की भी जरूरत है। अंतरिम बजट से पहले सरकार की ओर से जारी की गई इंडियन इकॉनमी-अ रिव्यू में यह उम्मीद जताई गई है कि भारत 2027 तक 5 ट्रिलियन डॉलर और 2030 तक 7 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बन जाएगा। सरकार ने मुख्य नीतिगत प्रस्तावों और कर बदलावों को जुलाई तक के लिए स्थगित कर दिया है। अंतरिम बजट में पिछले साल का लेखा-जोखा था तो आगामी वर्ष के लिए आबंटन का जिक्र किया गया। किसी भी बड़ी रियायत, कर रियायत और लोकलुभावन योजना में व्यय के जरिए आमजन को रिझाने का प्रयास नहीं किया गया। इससे जाहिर है कि मोदी सरकार आसन्न लोकसभा चुनाव में भी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है। वित्त वर्ष 24 के लिए राजकोषीय घाटे के 5.9 फीसदी के लक्ष्य को घटाकर 5.8 फीसदी कर दिया गया है और वित्त वर्ष 25 के लिए 5.1 फीसदी का राजकोषीय घाटा लक्ष्य तय किया गया है। राजस्व में इजाफा इसलिए हुआ कि आय कर में 23 फीसदी की बढ़ोतरी हुई रिजर्व बैंक तथा सरकारी बैंकों से गैर कर प्राप्तियों के लाभांश के रूप में 63,500 करोड़ रुपये की राशि मिली। करीब 1.50 लाख करोड़ रुपये के इस संयुक्त राजस्व में आधी राशि राज्यों को बढ़ी हिस्सेदारी के रूप में दी गई जबकि शेष केंद्र सरकार द्वारा व्यय की गई। वित्त वर्ष 24 में व्यय बजट के अनुरूप 45 लाख करोड़ रुपये के करीब रहा, हालांकि पूंजीगत व्यय में 50,000 करोड़ रुपये की कमी रही। वित्त वर्ष 24 में उन्होंने बजट में किए गए उल्लेख की तुलना में कम नॉमिनल जीडीपी वृद्धि के बावजूद बजट घाटे का लक्ष्य हासिल किया है। वित्त मंत्री ने घाटे के लक्ष्य को वित्त वर्ष 26 तक कम करके 4.5 फीसदी करने का लक्ष्य भी रखा है। बजट के आंकड़ों की ही बात की जाए तो वित्त वर्ष 24 में करीब 9 फीसदी की नॉमिनल जीडीपी वृद्धि के साथ केंद्र सरकार का सकल कर राजस्व 12.5 फीसदी बढ़ा है। कुल कर राजस्व 34.37 लाख करोड़ रुपये रहा जो शुरुआती लक्ष्य से 76,500 करोड़ रुपये अधिक था। गैर कर राजस्व भी अनुमान से 74,000 करोड़ रुपये अधिक था जबकि विनिवेश एक बार फिर केवल 30,000 करोड़ रुपये रहा जबकि इसके लिए 61,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य तय किया गया था।
हालांकि बजट में कुछ ऐसी चीजें भी नजर आईं जिन पर गौर किया जाना जरूरी है। मसलन, यूरिया सब्सिडी में 2023-24 के संशोधित अनुमानों की तुलना  रक्षा के लिए आवंटन में काफी कमी की गई है। रक्षा क्षेत्र का पूंजीगत व्यय भले ही मामूली रूप से बढ़े लेकिन वेतन और पेंशन को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। ये माना जा सकता है कि अंतरिम बजट में भविष्य की योजनाओं का तो ध्यान रखा है लेकिन सरकार आने वाले महीनों में पूर्ण बजट पेश करने को सुनिश्चित मान रही है। भारत साल 2027 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की इकाॅनामी वाला देश बन जाएगा लेकिन तेज विकास दर के साथ ही रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराने होंगे। देश में बेरोजगार युवाओं की तादाद बढ़ रही है। आज भी युवा बेरोजगारी का स्तर 45 फीसदी तक बताया जाता है। यह स्थिति गंभीर है। रोजगारोन्मुख योजनाओं की आवश्यकता है।
उत्पादन की तुलना में खपत कम है। प्राइवेट फाइनल कंजंप्शन एक्सपेंडिचर चालू वित्तीय वर्ष में 5.2 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में यह वृद्धि 7.5 फीसदी थी। देश की अर्थव्यवस्था में खपत का योगदान 60 प्रतिशत है। लेकिन बढ़ती मंहगाई की वजह से आधी आबादी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को भी बमुश्किल पूरी कर पा रही है। निम्न और मध्यमवर्गीय आबादी के पास पैसा बचेगा तो वह अन्य सुविधाओं पर खर्च करेगी जिससे विकास का पहिया तेजी से घूमेगा। इसके अलावा निजी पूंजी निवेश में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन में गिरावट लगातार चिंता की बात बनी ही हुई है। पिछली तिमाही (जुलाई-सितंबर) में कृषि क्षेत्र की ग्रोथ घटकर 1.2 फीसदी पर आ गई, जो उससे पहले की तिमाही (अप्रैल-जून) में 3.5 फीसदी थी। कृषि विकास दर वर्ष 2014 में 4.6 फीसदी थी। पीएम-किसान भुगतान में भी इजाफा नहीं किया गया। शिक्षा पर खर्च जो 2014 में कुल बजट का 4.55 प्रतिशत था वह 3.2 प्रतिशत पर आ गया है। महिला श्रम शक्ति भागीदारी जो 2005 में 30 प्रतिशत थी गिरकर 24 प्रतिशत हो गई है। महिला श्रमशक्ति भागीदारी में कमी आर्थिक ही नहीं सामाजिक और अन्य नजरिए से भी चिंताजनक है। इस मामले में हम पड़ोस के बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी पीछे हैं। देश की औसत जीडीपी विकास दर यूपीए सरकार के दौरान करीब 8 प्रतिशत थी वह घटकर 5.6 प्रतिशत रह गई है। सरकार ने अगले 5 साल में 2 करोड़ पक्के घर बनाने की घोषणा की है, जबकि 3 करोड़ घर बनाने का दावा किया गया है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 70 फीसदी मकानों का स्वामित्व महिला के नाम है। अंतरिम बजट में बताया है कि एक करोड़ महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बना दिया गया है और आगे 3 करोड़ को ‘लखपति’ बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। सरकार के 10 साल में 25 करोड़ लोगों को गरीबी-मुक्त किया गया है। इसके मायने हैं कि देश में गरीबी-रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या नगण्य हो गई है! हालांकि यह वास्तविकता नहीं है। 43 करोड़ को ‘मुद्रा ऋण’ के तहत 22.57 लाख करोड़ रुपए के कर्ज मुहैया कराए गए हैं। स्वरोजगार के लिए 34 लाख करोड़ रुपए के कर्ज भी दिए गए। ‘मुद्रा लोन’ का जो आंकड़ा घोषित किया गया है उस पर भी सवाल है, क्योंकि पूरे देश में करीब 26-27 करोड़ परिवार बसते हैं तो 43 करोड़ को यह ऋण कैसे दिया जा सकता है? आंगनबाड़ी बहनों की घोषणा भी सवालिया है। एक तरफ उन सेविकाओं को सम्मानजनक मानदेय नहीं दिया जाता। वे मानदेय के नियमित भुगतान को लेकर अक्सर सडकों पर प्रदर्शन करने को बाध्य हैं, लेकिन दूसरी ओर उन सभी बहनों को ‘आयुष्मान कार्ड’ देने की घोषणा की गई है। कोई अहम नीतिगत घोषणा नहीं की गई। वे चुनाव के बाद पूर्ण बजट में की जाएंगी। इधर, सत्ता पक्ष के लोगों का कहना है कि अंतरिम बजट होने के बाद भी इसमें दिशा और दशा दिख रही है। हर वर्ग को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया गया है। जबकि विपक्ष का आरोप है कि इसमें आम आदमी के लिए कुछ भी नहीं है। मध्यम वर्ग और खास तौर पर वेतनभोगी लोगों के लिए कुछ नहीं है। कुल मिलाकर, न कुछ सस्ता हुआ और ना मंहगा और ना ही कुछ बदला।

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