इंदौर। अंकुल प्रताप सिंह। इंदौर में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के द्वारा पत्रकारों के साथ किए गए दुर्व्यवहार से पत्रकार साथी आहत है।

मीडिया विवाद पर कमलनाथ का कथन


कमलनाथ आप यह ना भूले की जब लॉकडाउन का समय था और मंत्री द्वारा भोपाल में प्रेस वार्ता रखी गई और समय रखा गया 1:00 बजे और उपस्थित हुई 2:00 बजे सभी मीडिया कर्मियों ने एक-एक करके अपनी आईडी उठा कर चले गए।

कमलनाथ ने क्या कहा पत्रकारों को लेकर.... पत्रकारों को बुलाकर किया दुर्व्यवहार कमलनाथ अपनी वाणी पर विराम लगाइए। धक्के मारो निकालो इन्हें यहाँ से… आना मत वापस….”.

पूर्व सीएम से प्रेस ने खुले मंच से माफी मांगने की मांग की गई है नही तो होगा बहिष्कार। गोविंद मालो ने भी ट्वीट किया
https://youtu.be/GLwFQCcIuUo?si=pUhAI5HVTz0bYAyu


क्योंकि पत्रकार साथी हमारे “समय और सम्मान” दोनों एक नजर से देखते हैं। और आपके द्वारा इस प्रकार का अपमान घोर निंदनीय है इसलिए आपको पत्रकार साथियों से भरी सभा में माफी मांगनी चाहिए। नही तो पत्रकार साथी माफी नहीं देंगे।
चौथा स्तंभ का इस प्रकार से अपमान सहन नहीं किया जाएगा।

आपका राजनीतिक मनमुटाव है तो उसे दूर कीजिए लेकिन पत्रकारों पर इस प्रकार से भड़ास मत निकालिए और इस प्रकार की भाषा का उपयोग मत कीजिए। क्योंकि पत्रकार देश का चौथा स्तंभ है आम जनता का भरोसा है।

यह है पूरा मामला….

इंदौर में मातंग समाज के कार्यक्रम में पहुंचे कमल नाथ ने दी पत्रकारों को धमकी। खुले मंच से कहा धक्का देकर भगाओ पत्रकारों को। समाज के लोगो को उकसाने का काम किया कमलनाथ ने।समाज के लोगो से कहा, पत्रकार समाज का कार्यक्रम बिगड़ने आए है। कमल नाथ के अंगरक्षकों ने पत्रकारों को धक्का देकर भगाया है।मीडिया ने किया पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के कार्यक्रमों का बहिष्कार।

गोविंद मालो का ट्वीट

#जनप्रतिनिधियों का असंयमित व्यवहार और #मीडिया_कर्तव्य!

आज मीडिया हलकों में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के मीडिया के प्रति बर्ताव पर खासी प्रतिक्रिया है, जाहिर है अलग-अलग कारण से प्रतिक्रिया होना भी चाहिए लेकिन आज इस तरह के व्यवहार के वास्तविक कारणों पर भी विचार किया जाना दोनों ही पक्ष के लिए जरूरी है, यहां प्रश्न यह भी उठता है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी होती है कि मीडिया के कैमरामैन अथवा फोटोग्राफरों को मुख्य कार्यक्रम के बीच में ही ठीक मंच और श्रोताओं के बीच खड़े होकर कार्यक्रम को कवर करना अथवा फोटो लेना जरूरी होता है जो एक तरफ हटकर दोनों पक्षों के सामंजस्य से भी हो सकता है? दरअसल इस स्थिति में जिन आयोजकों ने लाखों रुपए खर्च करने के बाद अपने तमाम प्रयासों को झोंक कर अतिथियों को बुलाया होता है और कार्यक्रम की पहले दूसरी और तीसरी पंक्तियों में जो आमंत्रित विशिष्ट जन होते हैं वह ठीक अपने आगे मीडिया कर्मियों के खड़े रहने या रिकॉर्ड करने अथवा फोटो लेने की स्थिति में परेशान होने की स्थिति में रहते हैं, यहां एक और पहलू यह है कि अधिकांश मीडिया साथी कार्यक्रम का पहले पूरा संबोधन रिकॉर्ड करते हैं उसके बाद फिर चलते कार्यक्रम में ही बाईट रिकॉर्ड करने के लिए मंच पर चढ़ जाते हैं ऐसी स्थिति में अतिथियों के सामने भी बड़ी पशोपेश की स्थिति होती है, फोटोग्राफर साथियों को लेकर भी बार-बार स्थिति यही रहती है एक कार्यक्रम के पूरे कार्यक्रम के दौरान दर्जनों फोटो कुछ अलग एंगल से लेने के लिए प्रयासरत रहते हैं कार्यक्रम के दौरान भी उन्हें श्रोताओं के सामने पूरे कार्यक्रम के दौरान खड़े रहकर यह बीच कार्यक्रम में चलते फिरते फोटो लेना होता है इस दौरान श्रोता जब कार्यक्रम के बीच से उन्हें बाजू में या एक तरफ होकर खबर रिकॉर्ड करने या फोटो लेने का अनुरोध होता है तो मीडिया साथियों को नागबर गुजरता है अमूमन यह स्थिति हर सामाजिक राजनीतिक या अन्य प्रकार के कार्यक्रमों में नजर आती है जिसके नियंत्रण के लिए कहीं ना कहीं सत्ताधारी दल और विपक्ष के सामने मीडिया साथियों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं को भी आगे आकर आज कोई ना कोई दिशा निर्देश तय करने की जरूरत है, दूसरी तरफ जिन कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों द्वारा लिखित या मौखिक तौर पर मीडिया कर्मी या फोटोग्राफर साथी अपेक्षित या आमंत्रित नहीं होते उनमें भी मीडिया संस्थाओं और खबरों की प्रतिस्पर्धा के चलते कवरेज के लिए मीडिया कर्मी मौजूद रहते हैं इस स्थिति के चलते भी मीडिया की महत्ता घटी है, वही जनप्रतिनिधियों के हर छोटे-मोटे आयोजनों में मीडिया की सुलभता ने मीडिया प्रतिनिधियों के प्रति सम्मान और गरिमा को भी प्रभावित किया है वही जन प्रतिनिधियों के बीच मीडिया को लेकर यूज एंड थ्रो की परिपाटी को भी मीडिया के जागरूक सहयोगियों को समझनी होगी, वर्तमान दौर में मीडिया की गिरती साख के लिए कहीं ना कहीं मीडिया संस्थाओं के कथित सत्ता समर्थित हित भी जिम्मेदार है जिसके फल स्वरुप विपक्ष को कवरेज में भी उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है संभवत: इससे उपजे नैराश्य का प्रभाव पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के व्यवहार में झलकना स्वाभाविक है हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ या संबंधित समाज के आयोजकों को इस स्थिति से गुजरना पड़ा हो, हाल ही में पित्र पर्वत पर आयोजित श्री श्री रविशंकरजी के भव्य आयोजन में भी खुद कैलाश विजयवर्गीय के समक्ष भी ऐसी ही स्थिति के चलते मीडिया कर्मियों को अतिथियों के मंच से नीचे उतरना पड़ा था, और भी ऐसे कई उदाहरण हैं लेकिन जाहिर तौर पर आज जो मीडिया संगठन और मीडिया के सहयोगी इस स्थिति पर जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं उन्हें एक बार अपने स्तर पर भी जरूर चिंतन कर अपने साथियों के लिए नए सिरे से कवरेज की आचार संहिता भी तय लेना चाहिए क्योंकि कार्यक्रम राजनीतिक हो या सामाजिक उसकी सफलता और असफलता में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर मीडिया की भागीदारी होती है अतः यहां यह स्वीकारना भी उचित होगा कि इंदौर में जिस तरह मीडिया और राजनीतिक दलों के अलावा शहर भर के तमाम प्रतिनिधि और गणमान्य नागरिकों के बीच जो आत्मीयता और परस्पर सहयोग की भावना है वह मीडिया कर्मी हो या राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि किसी के भी असंयमित व्यवहार के कारण परस्पर सहयोग और स्नेह की परंपरा कभी भी बाधित नहीं होना चाहिए।

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