(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

लाल किले से स्वतंत्रता दिवस के अपने दसवें और वर्तमान कार्यकाल के आखिरी संबोधन में, प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह अपने लिए असाधारण ऐतिहासिक भूमिका का सबसे ऊंचा आसन गढऩे की कोशिश की है, उसके अलग-अलग तत्वों पर तो लोगों का फिर भी ध्यान गया है, लेकिन उसकी समग्रता पर काफी कम लोगों ने ही ध्यान दिया है। इसे देखते हुए, पी चिंदबरम का ‘इंडियन एक्सप्रैस’ के अपने रविवारीय स्तंंभ में यह ध्यान दिलाना दोहराए जाने का हकदार है कि प्रधानमंत्री मोदी, जब भारत के हजार साल की ‘‘गुलामी’’ पार कर के अमृतकाल के आरंभ के वर्तमान मुकाम पर पहुंचने की बात कर रहे थे, जहां उनके दावे के अनुसार अगले हजार साल की नींव रखी जा रही है, तो वह सिर्फ तात्कालिक तथा यहां तक कि मध्यमकालिक चिंताओं तक से ध्यान हटाने का पैंतरा ही नहीं आजमा रहे थे। इसके साथ ही वह खुद को हजार-हजार वर्ष के दो युगों की संधि पर, भारत का नेतृत्व कर रहे, असाधारण ‘‘युग पुरुष’’ के पैडस्टल पर खड़ा करने की बहुत सचेत कोशिश भी कर रहे थे। यह दूसरी बात है कि उनके पौने दो घंटे लंबे, बिखरे-बिखरे, शोर भरे किंतु निष्प्राण, धुरीहीन भाषण ने, इस सायास गढ़ी जाने वाली अभूतपूर्व ‘‘महत्ता’’ के संदेश के प्रसार को, बहुत हद तक खुद ही बाधित कर दिया।

‘‘एक हजार साल’’ के आगे के कालखंड पर प्रधानमंत्री मोदी के जोर देने की, नाजी जर्मनी के सुप्रीमो एडोल्फ हिटलर की ऐसी ही भविष्य प्रस्तुति से समानता ने बेशक, कई टिप्पणीकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। ऐसे बड़े भविष्य फलक की उपयोगिता जाहिर है कि सर्वोच्च नेता का कद बढ़ाकर उसका सिर बादलों तक पहुंचा देने के लिए भी है और उसकी तात्कालिक प्रकट विफलताओं को महत्वहीन या तुच्छ बनाकर गायब कर देने के लिए भी। लेकिन, उनके अनुसार एक हजार काल के जिस कालखंड को पार कर भारत मौजूदा मुकाम पर पहुंचा है, उसकी प्रधानमंत्री मोदी की प्रस्तुति और खासतौर पर इस पूरे कालखंड के ‘‘गुलामी’’ का दौर होने के उनके दावे के निहितार्थों पर, शायद उतना ध्यान नहीं दिया गया है, जितना उनमें छुपे खतरनाक संदेशों को देखते हुए दिए जाने की जरूरत है।

बेशक यह पहली बार नहीं है, जब प्रधानमंत्री मोदी ने ‘‘एक हजार साल की गुलामी’’ की बात की है। चंद हफ्ते पहले, अमरीका की अपनी सरकारी यात्रा के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में यही राग अलाप कर, इससे भी ज्यादा चौंकाया था। बेशक, उस समय भी लोगों के चौंकने की वजह यह हर्गिज नहीं थी कि नरेंद्र मोदी पहली बार ऐसा दावा कर रहे थे। एक जुम्ले की तरह ‘‘एक हजार साल की गुलामी’’ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले से जब-तब इस्तेमाल करते आ रहे थे। और ऐसा होना स्वाभाविक ही था, क्योंकि संघ-भाजपा के इतिहास बोध में, ‘‘एक हजार साल की गुलामी’’ की धारणा हमेशा से ही, केंद्रीय धारणा की तरह बनी रही है। हां, यह दूसरी बात है कि मोदीशाही के नौ साल से ज्यादा के दौरान, आधिकारिक इतिहास लेखन व शोध से लेकर, इतिहास की पाठ्य पुस्तकों तक और जाहिर है कि खासतौर पर सोशल मीडिया समेत जन-संवाद में, बढ़ते जोर के साथ तथा ऊंची आवाज में इसका दावा किया जाने लगा है। फिर भी, प्रधानमंत्री के अमरीका के संबोधन तक इस दावे का पहुंंचना, इसलिए चौंकाता था कि अब तक विदेश में ज्यादा सख्त छानबीन की आशंका से, औपचारिक रूप से ऐसे बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक संकेत देने से बचा जाता रहा था। बहरहाल, अब मोदी ने उस संंकोच को भी त्याग दिया है। और अब लाल किले के संबोधन के साथ तो इस धारणा को, एक तरह से मोदीराज का आधिकारिक सिद्घांत ही घोषित कर दिया गया है।

प्रधानमंत्री मोदी को शायद इसकी जानकारी नहीं हो, भारत की ‘‘एक हजार साल की गुलामी’’ की अवधारणा, सीधे-सीधे ब्रिटिश औपनिवेशिक राज की उतरन है, जो संघ ने शुरू से पहनी हुई है। ब्रिटिश राज के हिस्से के तौर पर, भारत पर एक इतिहास-काल बोध भी थोपा गया था। इसकी रूपरेखा जेेम्स मिल ने पेश की गयी थी और ब्रिटिश राज के पूरे दौर में थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ इसी नजरिए का बोलबाला बना रहा था। इस नजरिए के हिसाब से भारत का ब्रिटिश-पूर्व इतिहास, दो हिस्सों मेें बांटा जा सकता था। ग्यारहवीं शताब्दी से शुरू हुआ मुस्लिम काल और उससे पहले का हिंदू काल। लेकिन, बात सिर्फ इस तरह के काल विभाजन के ऐतिहासिक रूप से गलत होने की नहीं थी। इस कथित मुस्लिम काल में ही चोल, गजपति, अहोम, काकतीय, विजयनगर राज, मेवाड़ और आगे चलकर मराठा जैसे प्रभावशाली राज भी रहे थे, हालांकि पहले सल्तनत तथा बाद में मुगल शासन के अंतर्गत उत्तरी भारत का बड़ा हिस्सा आता था। इस काल विभाजन की असली बात यह थी कि यह इतिहास को सिर्फ शासक के धर्म के नजरिए से देखकर, भारत के संदर्भ में देशी-विदेशी तय करने की कोशिश करता था। और हिंदू प्रजा, मुसलमान राजा के एक स्थायी टकराव की अपनी संकल्पना के जरिए, ब्रिटिश राज को वास्तव में हिंदुओं के उद्धारक के रूप में पेश करने की कोशिश करता था। ब्रिटिश सामराजी हुकूमत में यह खेल कितने सचेत रूप से खेला जा रहा था, इसका अंदाजा इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1842-44 के दौरान भारत के गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड एलनबरो ने 1842 में इसका एलान किया था कि कथित ‘सोमनाथ के दरवाजे’ अफगानिस्तान से ईस्ट इंडिया कंपनी नियंत्रित इलाके में लाकर, ब्रिटिश सेनाओं ने भारतीयों के ‘आठ सौ साल के अपमान’ का ‘बदला’ ले लिया था!

हैरानी की बात नहीं है कि एक ओर आरएसएस-परिवार और दूसरी ओर उसके मुस्लिम समकक्षों ने, भारत के इतिहास की इस सामराजी प्रस्तुति को ज्यों-का-त्यों हजम कर लिया था। जैसाकि ब्रिटिश हुकूमत चाहती थी, उनकी लड़ाई एक-दूसरे के खिलाफ और ब्रिटिश हुकूमत के संरक्षण के लिए थी। यह दूसरी बात है कि भारतीय इतिहास की वास्तविक धारा की दिशा कुछ और ही थी, जिसका परिचय 1857 के विद्रोह से मिल गया था, जिसे प्रसिद्घ इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब, साम्राज्यवाद के खिलाफ तब तक का सबसे बड़ा विद्रोह मानते हैं। आगेे चलकर इसी वास्तविक इतिहास का प्रतिनिधित्व, ब्रिटिशविरोधी राष्ट्रीय आंदोलन करता था। हैरानी की बात नहीं है कि संघ समूह और उसके मुस्लिम समकक्ष, सचेत रूप से इस राष्ट्रीय आंदोलन से न सिर्फ बाहर ही रहे थे, बल्कि वास्तव में उसके खिलाफ ही रहे थे। यह दूसरी बात है कि संघ-परिवार की इस भूमिका पर पर्दा डालने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में इस झूठ का सहारा लेने की कोशिश की थी कि ‘कोई नहीं था, जिसने तब स्वतंत्रता के लिए त्याग नहीं किया होगा।’ जमींदार, राजे-रजवाड़े, महंत-मठाधीश, व्यापारी, संप्रदायवादी; ब्रिटिश राज के फर्माबरदार भी अंत-अंत तक बहुत थोड़े नहीं थे!
स्वाभाविक रूप से राष्ट्रवादी आंदोलन ने, उसके इतिहास लेखन ने, ब्रिटिश उपनिवेशिवादियों द्वारा प्रचारित इतिहास को भी चुनौती दी। उसने खासतौर पर भारत में कथित मुस्लिम काल को, योरपीय इतिहास के मध्ययुग की तरह, अवरुद्ध विकास का काल बनाकर पेश किए जाने की कोशिशों को चुनौती दी। इस क्रम में राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने 1857 तथा उसके बाद के इतिहास को ही ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रवाद की नजर से नहीं देखा, मध्यकालीन शासनों को भी एक समावेशी राष्ट्रवादी नजर से देखा। लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी इससे ठीक उल्टे चलते हुए, संघ के बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक नजरिए से ही संचालित होकर, इन शासनों को मात्र ‘विदेशी’ तथा इनके विरुद्घ जो कुछ भी रहा हो, उसे ‘राष्ट्रीय’ बनाने की कोशिश करते हैं। दुर्भाग्य से संघ की यह सांप्रदायिक इतिहास दृष्टि, राष्ट्रवादी इतिहास लेखन की एक कमजोरी का बहुत फायदा उठाती है। ब्रिटिश श्रेष्ठतावाद के मुकाबले के लिए, राष्ट्रवादी इतिहास दृष्टि ने, मुस्लिम-पूर्व भारत के हिंदू भारत के रूप में योरपीय महिमामंडन को, जिसके पीछे स्पष्ट सामराजी कार्यनीति थी, कमोबेश अनालोचनात्मक तरीके से हजम कर लिया था। इस तरह, ‘हिंदू भारत’ के एक प्रकार के ‘स्वर्ण युग’ माने जाने की सामराजी विरासत सुरक्षित बनी रही, जिसने एक स्वतंत्र, समानतापूर्ण, जनतांत्रिक भविष्य गढऩे के तकाजों के मुकाबले, बीते हुए ‘स्वर्ण युग की वापसी’ की पुकारों के लिए जगह मुहैया करायी। इसे हम आज कथित सनातन पर वापसी की पुकारों में देख रहे हैं। दूसरी ओर, खासतौर पर मुस्लिम को ‘विदेशी’ का पर्याय बनाया जा रहा है।
बहरहाल, प्रधानमंत्री ने लाल किले के अपने भाषण में ‘हजार साल की गुलामी’ के मुकाबले की ‘परंपरा’ और शक्तियों की दुहाई ने यह साफ कर दिया है कि वह आने वाले दिनों में और जाहिर है कि विधानसभा चुनाव के अगले चक्र के लिए और फिर आम चुनाव के लिए, बहुसंख्यक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ज्यादा से ज्यादा खुलकर इस्तेमाल करेंगे। वास्तव में इसका एक और संकेत तो तभी मिल गया था, जब कर्नाटक के चुनाव में भारी हार के फौरन बाद, प्रधानमंत्री ने समान नागरिक संहिता की मांग उछाल दी थी, जिसके संबंध में उन्होंने यह भी स्पष्ट करने में कोई कमी नहीं रहने दी थी कि यह सिर्फ मुस्लिम पर्सनल लॉ के खिलाफ मुहिम का मामला है।
प्रधानमंत्री ने लाल किले से अपने भाषण में इसी का एक और संकेत देते हुए, राष्ट्र को ‘‘बर्बाद’’ कर रही बुराइयों में, पिछले साल के अपने भाषण में गिनाई परिवारवाद तथा भ्रष्टाचार की बुराइयों के साथ, इस बार ‘‘तुष्टीकरण’’ की राजनीति को भी शामिल कर लिया है। सभी जानते हैं कि संघ-भाजपा की शब्दावली में ‘‘तुष्टीकरण’’ का एक ही अर्थ है — अल्पसंख्यकों की चिंता। प्रधानमंत्री ने जिस तरह इसे ‘‘बर्बाद’’ करने वाला बताया है और खासतौर पर सामाजिक न्याय को बर्बाद करने वाला बताया है; उसका संकेत स्पष्ट है कि अब अल्पसंख्यकों के जिक्र को भी एक प्रकार से अपराध बनाकर हमले का निशाना बनाया जाएगा और यह हमला किया जाएगा इसके नाम पर कि इससे, दलित आदि अन्य वंचितों के हक मारे जा रहे हैं।

NEWS NATIONAL WORLD's avatar

By NEWS NATIONAL WORLD

NNW NEWS NATIONAL WORLD MP/CG NEWS, समाचार, क्राइम, जन समस्या, पॉलिटिक्स, बॉलीवुड, सामाजिक,इत्यादि। मीडिया समूह का ऑनलाइन हिंदी समाचार पोर्टल है, जो की राजनीति, खेल, मनोरंजन, व्यवसाय, जीवन शैली, कला संस्कृति, पर्यटन से जुड़ी खबरों को हिंदी भाषा में एक ही स्थान पर लेटेस्ट ब्रेकिंग न्यूज के साथ प्रदान करता है। अंकुल प्रताप सिंह,बघेल +91 8516870370 सब एडिटर गौरव जैन इंदौर +91 98276 74717 सह संपादक आमिर खान इंदौर +91 9009911100, प्रदीप चौधरी, संभाग ब्यूरो चीफ इंदौर +919522447447, रीवा जिला ब्यूरो चीफ कुशमेन्द्र सिंह +91 94247 01399.

प्रातिक्रिया दे

You missed

Translate »

Discover more from NNWORLD

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading