(आलेख : राजेन्द्र शर्मा)

बाहरी बनाम अंदरूनी के संघ-भाजपा के इस द्वैध में छेद ही छेद हैं। पहली बात तो यही कि देश की सीमाओं के हिसाब से बाहरी और अंदरूनी को, दो विरोधी अटल ध्रुव बनाने की कोशिश वही संघ-भाजपा का सत्ताधारी गठजोड़ करता है, जो न सिर्फ मोदी राज के अनुमोदन के लिए खुद ही हमेशा पश्चिम की ओर देखता है।

हैरानी की बात नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी को विकसित पश्चिमी दुनिया की हाल की अपनी दो यात्राओं में अगर शर्मिंदगी का नहीं भी कहा जाए, तब भी, बदमजगी की स्थिति का सामना जरूर करना पड़ा है। पिछले महीने अमेरिका की यात्रा में प्रधानमंत्री मोदी को विभिन्न अधिकार समूहों तथा जनतंत्र व धर्मनिरपेक्षता के हिमायती ग्रुपों के व्यापक विरोध प्रदर्शनों का सामना तो करना ही पड़ा था, इसके ऊपर से प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका की अपनी छ: यात्राओं में से पहली बार, व्हाइट हाउस में भारत में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे भेदभाव तथा विरोध की आवाजों के दमन के मुद्दों पर, एक सीधे सवाल का भी सामना करना पड़ा था। बेशक, प्रधानमंत्री मोदी ने इस पहले से ”आउट” हो चुके प्रश्न का, टेलीप्राम्प्टर में पहले से भरा जा चुका जवाब दे तो दिया, लेकिन यह जवाब इतना ज्यादा सामान्यीकृृत तथा आम दावों से भरा हुआ था कि उसे शायद ही किसी ने खास गंभीरता से लिया होगा। शायद ही कोई भारत में अल्पसंख्यकों व जनतंत्र के मामले में ”सब ठीक-ठाक है” के मोदी जी के दावों में निहित आश्वासन से, वाकई आश्वस्त हुआ होगा।

इसी अनाश्वस्ति का संकेतक था कि न सिर्फ अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रताओं से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय आयोग ने एक बार फिर अपनी रिपोर्ट के जरिए तथा अमेरिका के छ: दर्जन से ज्यादा या 20 फीसद के करीब सांसदों ने भी, अमरीकी सरकार से प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान, भारत में बढ़ते बहुसंख्यकवादी बोलबाले तथा अल्पसंख्यकों के दमन के मुद्दे उठाने का आग्रह तो किया ही था, इसके अलावा कई सांसदों ने अमरीकी संसद में प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन का बाकायदा बहिष्कार भी किया था। याद रहे कि यह प्रधानमंत्री की हैसियत से नरेंद्र मोदी का, अमरीकी संसद के दोनों सदनों के सामने यह दूसरा संबोधन था और यह धार्मिक स्वतंत्रताओं के मुद्दे पर मोदी राज के 9 साल में आई गिरावट का ही संकेतक है कि, अमरीकी संसद में सात साल पहले के अपने संबोधन के समय, प्रधानमंत्री मोदी को इस बार जैसे किसी बहिष्कार का सामना नहीं करना पड़ा था। यही नहीं, अमेरिका के पूर्व-राष्ट्रपति, बराक ओबामा ने भी मोदी की अमेरिका यात्रा के मौके पर ही, एक साक्षात्कार में उन्हें आगाह करने की इच्छा जताई थी कि अगर भारत में विभिन्न समूहों व समुदायों के बीच भेदभाव चलने दिया जाता है, तो यह अंतत: देश की एकता के लिए ही खतरा पैदा कर सकता है।

और पिछले ही हफ्ते प्रधानमंत्री मोदी को अपनी फ्रांस की यात्रा में प्रेस के मुश्किल सवालों का सामना तो नहीं करना पड़ा क्योंकि द्वारा गढ़े गए नये नॉर्मल की वापसी कराते हुए, इस यात्रा के दौरान मोदी ने प्रेस का सामना करना मंजूर ही नहीं किया। बहरहाल, इस यात्रा के दौरान फ्रांस के सभी प्रमुख दैनिकों समेत, आम तौर पर मीडिया में अल्पंख्यकों पर, धर्मनिरपेक्षता पर, जनतंत्र पर तथा विरोधियों पर बढ़ते हमलों के लिए, मोदी निजाम को तीखी आलोचनाओं का निशाना बनाया गया। प्रसिद्घ दैनिक लॉ मांद ने इन तमाम मामलों में भारत में जो कुछ आज हो रहा है, उसे 2002 के गुजरात के नरसंहार की पृष्ठभूमि में रखकर दिखाया।

उधर ठीक इसी मौके पर, पेरिस के ही दूसरे छोर पर बैठी यूरोपीय संसद ने, कई विशेष प्रस्तावों के माध्यम से ”मणिपुर के हालात” की चर्चा की और इस मामले में भारतीय सत्ता तंत्र के रुख व आचरण की आलोचना ही नहीं की, प्रचंड बहुमत से एक प्रस्ताव स्वीकार कर उसने भारत को इसकी चेतावनी भी दी कि यूरोपीय संघ के साथ आर्थिक संबंधों पर भी, मणिपुर के जैसे घटनाक्रम का असर पड़ सकता है। इस चेतावनी का सांकेतिक महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी की हाल की पश्चिमी राजधानियों की यात्राओं को, इन देशों के आम तौर पर भारत के साथ आर्थिक संबंधों के तकाजों और खासतौर पर सैन्य-असैनिक क्षेत्रों के लिए इन यात्राओं में स्वीकृत हुई खरीदारियों में, इन राजधानियों के स्वार्थों के साथ जोड़कर देखा जा रहा था। वास्तव में पेरिस की प्रधानमंत्री की यात्रा के सिलसिले में यह जुमला बार-बार उद्यृत हुआ है कि रफाल सौदे की दूसरी किस्त ने ही, जिसमें 38 रफाल लड़ाकू विमानों की पहली किस्त के बाद, अब 26 विमान और खरीदे जाने थे, प्रधानमंत्री मोदी को बास्तील दिवस परेड के मुख्य अतिथि का टिकट दिलाया था। याद रहे कि 14 जुलाई को हर साल बास्तील दिवस को फ्रांसीसी अपने राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाते हैं।

लेकिन, वास्तव में यह दिन 1879 में इसी रोज शुरू हुई फ्रांसीसी क्रांति की सालगिरह के रूप में मनाया जाता है, जिसकी शुरूआत तब इस कुख्यात जेल में बंद क्रांतिकारियों को जेल से छुड़ाने के लिए, हमला कर जेल तोड़े जाने के साथ हुई थी। जाहिर है कि भारत से भी बढ़कर फ्रांस में, मानवता को ”स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारा” के लक्ष्य देने वाली, इस फ्रांसीसी क्रांति की सालगिरह की परेड में मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री मोदी जैसे भाईचारा-विरोधी नेता को बनाए जाने की, काफी आलोचना हुई है।

बहरहाल, जैसाकि आसानी से अनुमान लगाया जा सकता था, मोदी सरकार ने आम तौर पर इस तरह की सभी आलोचनाओं को और खासतौर पर मणिपुर के संबंध में यूरोपीय संसद के प्रस्ताव को यह कहकर खारिज कर दिया है कि मणिपुर में जो कुछ हुआ है, भारत का अंदरूनी मामला है और यूरोपीय संसद को या किसी भी अन्य बाहर वाले को, हमारे अंदरूनी मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। याद रहे कि यह घरेलू मामलों में ”विदेशी हस्तक्षेप आमंत्रित करने” के उन आरोपों के सिक्के का ही दूसरा पहलू है, जिन आरोपों के जरिए संसद के पिछले सत्र के दौरान सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के शीर्ष नेता, राहुल गांधी को सत्ताधारी पार्टी ने निशाना बनाने की कोशिश की थी और इसके बहाने से संसद को ही नहीं चलने दिया था।

यह दूसरी बात है कि बाद में राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता खत्म करने का बहाना, सत्ताधारी पार्टी के गुजरात के एक विधायक की मानहानि सरासर झूठी शिकायत बनी, जिस तरह की शिकायतें सत्ताधारी पार्टी के नेताओं ने और भी कई राज्यों दर्ज कराई थीं। पर संसद के पिछले सत्र में, अडानी के महाघोटाले के आरोपों पर बहस को रोकने के लिए तो इसी बहाने को हथियार बनाया गया था कि सांसद रहते हुए, राहुल गांधी ने ”बाहरवालों” के बीच देश की अंदरूनी चीजों की आलोचना कर, वास्तव में ‘भारत के अंदरूनी मामलों में बाहरी हस्तक्षेप’ को आमंत्रित किया था! यहां यह जोड़ना अप्रासंगिक नहीं होगा कि संघ-भाजपा के मौजूदा राज ने, कथित रूप से ‘घरेलू मामलों में बाहरी हस्तक्षेप’ के विरोध की अपनी लाठी को बढ़ाकर इतना लंबा कर दिया है कि, हम आए दिन इस तर्क को पलटे जाते हुए ही देखते हैं, जहां पहुंचकर तमाम अंदरूनी आलोचनाओं को भी यह आरोप लगाकर खारिज कर दिया जाता है कि इन आलोचनाओं से दुनिया मेें या बाहर, देश की बदनामी होती है। ऐसी आलोचनाओं को राष्ट्रविरोधी ही घोषित कर देना, वह घातक हथियार है, जिसके इस्तेमाल को मौजूदा संघ-भाजपा निजाम ने एकदम आम-फहम बना दिया है। इस तरह, बाहरी बनाम अंदरूनी का यह द्वैध, सत्ताधारी संघ-भाजपा के हाथों में ऐसी दुधारी तलवार बन जाता है, जिसके जरिए वे बाहरी और भीतरी, मौजूदा निजाम की सभी तरह की आलोचनाओं को काट डालना चाहते हैं।

लेकिन, बाहरी बनाम अंदरूनी के संघ-भाजपा के इस द्वैध में छेद ही छेद हैं। पहली बात तो यही कि देश की सीमाओं के हिसाब से बाहरी और अंदरूनी को, दो विरोधी अटल ध्रुव बनाने की कोशिश वही संघ-भाजपा का सत्ताधारी गठजोड़ करता है, जो न सिर्फ मोदी राज के अनुमोदन के लिए खुद ही हमेशा पश्चिम की ओर देखता है बल्कि जिनकी भारत के विकास की पूरी की पूरी संकल्पना भी, विकसित दुनिया के पूंजीवादी मॉडल का आंख मूंदकर अनुकरण करने पर टिकी है, जिसमें विदेशी पूंजी से लेकर विज्ञान-प्रौद्योगिकी तक के आयात शामिल हैं। याद रहे कि संघ-भाजपा की प्रगति की संकल्पना, सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक रूप से चाहे कितनी ही पश्चगामी हो, अपने आर्थिक पक्ष में पूरी तरह से पश्चिमी सामराजी मॉडल पर आधारित है। इसीलिए, जिन बाहरी ताकतों को आर्थिक पहलू से खुश करने के हिसाब से देश की सारी नीतियां तय की जा रही हैं, उन्हें ही जब-तब एक आधुनिक समाज के न्यूनतम सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक तकाजों पर आधारित उनकी आलोचनाओं के लिए, बाहरी दखलंदाजी मंजूर नहीं किए जाने की झिड़की दे दी जाती है।

बहरहाल, आर्थिक पहलू से खुलापन, वैश्विकता आदि और सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक पहलुओं से पुरातनता, बंद कपाटता का यह द्वैध, न सिर्फ झूठा है, बल्कि आज की दुनिया में यह एक कदम भी नहीं चल सकता है। इसकी वजह यह है कि इससे सामराजी व्यवस्था में निहित असमानता से वास्तविक राष्ट्रीय हितों की हिफाजत करने में तो कोई मदद नहीं मिलती है, उल्टे इस रास्ते से मानव विकास के इतिहास की दिशा को ही पलटने की कोशिश की जा रही होती है। पूंजीवाद के आने के बाद से मानव सभ्यता बढ़ते वैश्वीकरण के रास्ते पर चलती रही है। अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद, जो सबसे बढ़कर असमानता पर टिकी पूंजीवादी व्यवस्था से निकलती हैं, भांति-भांति के वैश्विक आदर्शों व लक्ष्यों और वैश्विक संस्थाओं की स्थापना व उनका विकास, उसी के हिस्से हैं। ऐसे में ‘बाहर वालो हमारे अंदरूनी मामलों से दूर रहो’ का शोर, बाहर की दुनिया से और खासतौर पर ताकतवर शक्तियों से एक ही तरह के रिश्ते की ओर ले जा सकता है, जहां भारतीय जनता के वास्तविक हितों की कीमत पर उनके क्षुद्र स्वार्थ ही साधे जाएंगे और बदले में वे हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक प्रतिगामिता और नाबराबरी पर चुप लगा जाएंगे। लेकिन, साम्राज्यवाद तो हमेशा से ही ऐसे द्वैध को पसंद करता है। राजनीतिक रूप से तानाशाही, धार्मिक रूप से बहुसंख्यकवाद, उनके हितों को खूब रास आते हैं। लेकिन, भारत की जनता अब और इस छद्म राष्ट्रवाद के झांसे में आने वाली नहीं है।

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