(व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

भाई कोई कुछ भी कहे, हमें तो मोदी जी का सिस्टम बहुत पसंद आ रहा है। हर रोज नहीं, तो कम-से-कम महीने-दो-महीने पर तो देशभक्ति की परीक्षा करा ही देते हैं। बीबीसी की डॉक्यूमेंटरी वाली देशभक्ति की परीक्षा निकली नहीं थी कि भारत माता के सबसे कमाऊ पूत के विदेशी रिपोर्टों के हमलों से बचाव वाली देशभक्ति की परीक्षा आ गयी। रिपोर्टों के हमलों से बचाव वाली परीक्षा का नतीजा भी नहीं आया था कि विदेशी धन्नासेठ, जॉर्ज सोरोस के हमलों से नये इंडिया की हिफाजत वाली परीक्षा आ गयी। बाकी, अयोध्या में मंदिर से लेकर, एक हजार से ऊपर के रसोई गैस के सिलेंडर तक की, देशभक्ति परीक्षा तो खैर मोदी जी के राज में परमानेंटली होती ही रही है।

और यह इसके बावजूद है कि बाकी परीक्षाओं के लिए अब भी लोगों को साल-साल भर इंतजार करना पड़ता है। अगर परीक्षा भर्ती-वर्ती की हुई, तब तो खैर इंतजार का कहना ही क्या? पांच-सात साल तो आराम से गुजर जाते हैं। बल्कि अब तो नौकरी की भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक का फैशन ही चल पड़ा है। अव्वल तो परीक्षा ही नहीं होती है और परीक्षा हो भी तो, परीक्षा बाद में होती है, पेपर पहले लीक हो जाता है। फिर भी अगर बारह साल में घूरे के दिन फिरने के लॉजिक से कभी परीक्षा हो भी जाती है और नतीजा आ भी जाता है, तो नौकरी मिलने से पहले नतीजा ही कैंसल हो जाता है।

और ममता दी के बंगाल में तो सुनते हैं कि नौकरी लगने के बाद भी, नतीजा फर्जी निकल रहा है। पर देशभक्ति की परीक्षा में मोदी जी ने ऐसी किसी गड़बड़ी, किसी व्यवधान की रत्तीभर गुंजाइश ही नहीं छोड़ी है। उल्टे मोदी जी ने नागपुर स्कूल के साथ मिलकर यह पक्का किया है कि इस परीक्षा के लिए, किसी को ज्यादा इंतजार करना ही नहीं पड़े। मैट्रो की तरह, एक गाड़ी निकली नहीं, कि अगली गाड़ी यात्री को उठाने को तैयार। परीक्षाओं का इतना अच्छा सिस्टम और वह भी मुफ्त — कोई परीक्षा फीस भी नहीं। घड़ी-घड़ी पर देशभक्ति की परीक्षा करने की अचूक व्यवस्था के लिए, मोदी जी का एक बड़ा सा थैंक यू तो बनता ही है — क्यों भाइयो!

और विरोधी जो यह प्रचार कर रहे हैं कि मोदी जी की देशभक्ति की परीक्षाएं मुश्किल हैं, इन परीक्षाओं के पर्चे टफ होते हैं और ये परीक्षाएं मुश्किल-से-मुश्किल होती जा रही हैं, सब झूठ है। मोदी जी की देशभक्ति की परीक्षाएं मुश्किल जरा भी नहीं हैं। लाखों-करोड़ों भक्त इन परीक्षाओं में हंसते-खेलते बैठ रहे हैं और बहुत अच्छे नंबरों के साथ पास भी हो रहे हैं। हां! कमजोर दिल वालों के पास होने की गारंटी मोदी जी नहीं दे सकते हैं। वैसे भी वह परीक्षा भी क्या, जिसमें कोई फेल ही नहीं हो। कम से कम देशभक्ति की परीक्षा में फेल नहीं होने वालों के बिना काम नहीं चल सकता। परीक्षा का पूरा सिस्टम ही बैठ जाएगा। देशभक्ति की परीक्षा में कोई फेल ही नहीं होगा, तो सर्टिफाइड देशभक्त बनने वाले, टार्गेट प्रैक्टिस किस पर करेंगे? देशभक्ति के टैस्ट में फेल होने वालों की गर्दनों की सान पर चढक़र तेज होती है, देशभक्ति की तलवार!

और बीबीसी वाले मामले में तो देशभक्ति टैस्ट एकदम ही सिंपल है। बीबीसी तो नाम से ही साफ है कि विदेशी है। और मोदी जी, नाम से ही साफ है कि देशी हैं। अब सोचने की बात है कि किसी देशी का किसी विदेशी से झगड़ा हो जाए, तो कोई देशभक्त किस का साथ देगा? जाहिर है कि देशी का। बाकी सब बाद में। विदेशी क्या करता है, देशी क्या करने की कोशिश कर रहा है, वह बाद में देखा जाएगा। पहली जरूरत यह है कि विदेशी के खिलाफ झगड़े में हमें देशी के साथ खड़े होना है, उसका साथ देना है। मोदी जी, उनका संघ परिवार, सब हमसे सिर्फ इतनी सी देशभक्ति ही तो मांग रहे हैं। देशी है, उसका साथ दो, विदेशी के खिलाफ लड़ो। अब किसी को इसमें भी प्राब्लम है तो, मोदी जी के राज में देशभक्ति के टैस्ट में कैसे पास हो जाएगा?

कई लोग मीडिया-मीडिया कहकर विदेशी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। मोदी जी के बहुत से विरोधी मीडिया की स्वतंत्रता, मीडिया की स्वतंत्रता का हल्ला मचा रहे हैं। कुछ दाढ़ी-टोपी वाले 2002 के गुजरात के सच की दुहाई दे रहे हैं। लेकिन, हैं ये सब अपनी एंटीनेशनलता को छुपाने के ही बहाने। वर्ना मान लो कि गुजरात में वही हुआ था, जो बीबीसी की पहली डॉक्यूमेंटरी दिखाने की कोशिश करती है। मान लिया कि 2014 के बाद पूरे देश में वही हुआ है, जो बीबीसी की दूसरी डॉक्यूमेंटरी दिखाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, 2002 का गुजरात हो या 2014 के बाद का देश, क्या यह हमारा अंदरूनी मामला ही नहीं है? हमारा अंदरूनी मामला, हम देखेंगे — विदेशियों को उसमें टांग अड़ाने की क्या जरूरत है। बेशक, विदेशी हमारे मेहमान हैं। हमारी तो संस्कृति में ही अतिथि देवो भव: लिखा हुआ और वसुधैव कुटुम्बकम भी। अतिथि मालदार हो, तब तो हम उसे देवों का देव भी मान लें। पर हम अतिथियों को घरेलू मामलों में टांग नहीं अड़ाने दे सकते। और हमारे देवों के देव, नरेंद्र देव की प्रशंसा के सिवा और कोई शब्द, हम किसी अतिथि को अपनी जुबान पर लाने नहीं दे सकते। फिर इसके लिए भले ही हमें, आंशिक स्वतंत्र से परतंत्र हो जाने का ताना परदेसियों से ही क्यों न सुनना पड़े।

इतनी सिंपल सी बात जिन मोदी विरोधियों की समझ में नहीं आ रही है, वो किस मुंह से मोदी जी के नये इंडिया के अमृतकाल में एंट्री पाना चाहते हैं। आखिर, अमृतकाल आज़ादी के 75 साल बाद आया है। आज़ादी, अंगरेजों से लडक़र आयी थी। कहां तो मोदी जी का कुनबा, उस टैम पर मिस हो गयी आज़ादी की लड़ाई में, आज भी ज्वाइन करने की कोशिश कर रहा है, उन्हीं अंगरेजों की बीबीसी से आज लड़ रहा है और कहां उसे तब अंगरेजों से न लडऩे के ताने देने वाले, उसके आज अंगरेजों से लडऩे का विरोध कर रहे हैं। पर विरोधी कितनी भी कोशिश कर लें, मोदी जी का कुनबा इस बार आज़ादी की लड़ाई को हाथ से जाने नहीं देगा; नये इतिहास में आज़ादी की असली लड़ाई अपने नाम लिखवा कर रहेगा।

और हां! देशभक्ति की परीक्षा में फिर भी किसी को कठिनाई हो, तो मोदी जी समय-समय पर परीक्षा पर चर्चा भी तो करते ही हैं। पीएम होकर बंदा परीक्षा में कामयाबी के गुर तक बता रहा है, फिर भी किसी को देशभक्ति की परीक्षा मुश्किल लगती है, तो चला जाए इंग्लेंड/अमरीका, क्या पता ऋषि सुनाक/कमला हैरिस की तरह उसका भी नंबर लग जाए।

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