सालभर में करीब तीन दर्जन बाघों की मौत का दावा, सरकार से निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग भोपाल। प्रदीप चौधरी। मध्य प्रदेश को देश में बाघों की अच्छी-खासी आबादी वाले राज्यों में गिना जाता है। ऐसे में प्रदेश में लगातार बाघों की मौत की खबरें वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था को लेकर चिंता पैदा करती हैं। बाघों की सुरक्षा, जंगलों की निगरानी और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच कराने की आवश्यकता जताई जा रही है। उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, प्रदेश में एक साल के दौरान करीब तीन दर्जन बाघों की मौत होने की बात सामने आई है। यदि यह आंकड़ा आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होता है, तो यह वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से गंभीर विषय है। हालांकि, बाघों की मौत के वास्तविक कारणों, उनकी संख्या और घटनास्थलों की जानकारी के लिए आधिकारिक आंकड़ों की जांच जरूरी है। खेतों में करंट और जहर से मौत की आशंका बाघों की मौत के संभावित कारणों में जंगलों से लगे खेतों में लगाए जाने वाले बिजली के तार और कथित तौर पर जहर देने जैसी घटनाएं भी चिंता का विषय हैं। बताया जाता है कि कुछ किसान जंगली जानवरों से फसल बचाने के लिए खेतों की बाड़ में करंट प्रवाहित कर देते हैं। ऐसे में यदि कोई बाघ खेत के करीब पहुंचता है, तो करंट लगने से उसकी जान जा सकती है। इसके अलावा, बाघों को जहर देकर मारने की आशंकाओं की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। हालांकि, प्रत्येक घटना में मौत का कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक जांच और अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही निर्धारित किया जाना चाहिए। यदि किसी मामले में अवैध करंट या जहर के इस्तेमाल की पुष्टि होती है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। करोड़ों के खर्च के बाद भी सुरक्षा पर सवाल बाघों के संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर विभिन्न योजनाओं के माध्यम से संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके बावजूद यदि बाघों की मौतें लगातार सामने आती हैं, तो संरक्षण व्यवस्था की प्रभावशीलता की समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है। वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, मैदानी कर्मचारियों और वनरक्षकों की भूमिका की भी तथ्यों के आधार पर जांच होनी चाहिए। सवाल यह है कि जंगलों और बाघों की निगरानी के लिए तैनात अमला कितनी प्रभावी ढंग से काम कर रहा है? क्या संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित गश्त हो रही है? जंगलों से सटे खेतों में अवैध विद्युत तारों की निगरानी की क्या व्यवस्था है? और बाघों की मौत के मामलों में आरोपियों की पहचान तथा कार्रवाई की स्थिति क्या है? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। पर्यटन के साथ संरक्षण भी जरूरी मध्य प्रदेश में वन्यजीव पर्यटन को बढ़ावा देना राज्य की अर्थव्यवस्था और स्थानीय रोजगार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन पर्यटन के विकास के साथ बाघों की सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। केवल पर्यटन स्थलों के प्रचार-प्रसार से वन्यजीव संरक्षण का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए जंगलों में प्रभावी निगरानी, पर्याप्त मैदानी अमला, आधुनिक तकनीक और समयबद्ध कार्रवाई आवश्यक है। राज्य सरकार और वन विभाग को बाघों की मौत से जुड़े मामलों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष समीक्षा करानी चाहिए। प्रत्येक घटना में मौत का कारण, जांच की प्रगति, जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध की गई कार्रवाई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपायों की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। बाघों का संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का साझा दायित्व है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और वन विभाग इन घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं और प्रदेश में बाघों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेही किस तरह तय की जाती है। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन शिवराज के बेटे कार्तिकेय की खेल प्रशासन में एंट्री, वॉलीबॉल संघ के अध्यक्ष बने; कोसमी मामले में भी सक्रिय इंदौर में व्यापार के नाम पर 25 लाख रुपये की ठगी, होटल में बैग बदलकर फरार हुए आरोपी