“केवल जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर देना, उचित धाराओं में FIR दर्ज न करने का विकल्प नहीं”

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा में 2021 में एक मुस्लिम मौलवी पर हुए कथित हमले के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस को फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि केवल जांच अधिकारी (IO) के खिलाफ विभागीय जांच या कार्रवाई शुरू कर देना, उचित कानूनी धाराओं के तहत FIR दर्ज न करने का विकल्प नहीं हो सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान पूछा कि जब FIR में दर्ज तथ्यों से धार्मिक घृणा (religious hatred) का संकेत मिलता है, तो IPC की संबंधित धाराएं जैसे धारा 153B (राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक imputations) और धारा 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले कृत्य) को क्यों नहीं जोड़ा गया या हटाया गया? कोर्ट ने साफ कहा, “केवल जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर देना, उचित कानूनी धाराओं में FIR दर्ज न करने का विकल्प नहीं हो सकता।”

यह मामला 62 वर्षीय काजिम अहमद शेरवानी से जुड़ा है, जो दिल्ली के रहने वाले हैं और खुद को मौलवी बताते हैं। जुलाई 2021 में नोएडा में उन पर कथित तौर पर एक गिरोह ने हमला किया था, जिसे वे धार्मिक आधार पर ‘हेट क्राइम’ बता रहे हैं। पीड़ित ने आरोप लगाया कि हमलावरों ने उनकी मुस्लिम पहचान के कारण पेचकश (screwdriver) से हमला किया।

मामले में शुरू में FIR दर्ज हुई थी, लेकिन उसमें केवल शरीर के खिलाफ अपराध, चोरी आदि से जुड़ी धाराएं लगाई गईं, जबकि धार्मिक घृणा फैलाने वाली धाराएं नहीं जोड़ी गईं। पीड़ित ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर उचित जांच, आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई और पुलिस अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की मांग की थी।

सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि जांच अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू कर दी गई है। लेकिन बेंच ने इसे अपर्याप्त बताते हुए कहा कि इससे समस्या का समाधान नहीं होता। कोर्ट ने जोर दिया कि यदि अपराध की प्रथम दृष्टया धार्मिक आधार पर घृणा फैलाने वाले लगते हैं, तो FIR में उचित धाराएं जोड़ना पुलिस की वैधानिक ड्यूटी है। धारा 196 CrPC के तहत कुछ अपराधों के लिए सरकार की मंजूरी जरूरी है, लेकिन FIR दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पूछा, “आप मंजूरी देने से इनकार कर सकते हैं, लेकिन FIR दर्ज करने से इनकार कैसे कर सकते हैं?”

यह मामला भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक आधार पर होने वाले अपराधों (hate crimes) से जुड़ा महत्वपूर्ण है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाया है। मामले की अगली सुनवाई में और निर्देश दिए जा सकते हैं।